गाँव के किनारे एक छोटे से घर में विनम्र देवी अपने बेटे अर्जुन के साथ रहती थी। उम्र ढल चुकी थी, आँखों में थकान थी, पर दिल में बेटे के लिए अटूट उम्मीद। अर्जुन पच्चीस साल का मेहनती नौजवान था। पिता का साया सिर से उठ चुका था। वह दिन में खेतों पर मजदूरी करता और शाम को माँ को दिलासा देता।
एक दिन विनम्र देवी बोली, “बेटा, इस पुराने चूल्हे में अब आग भी जलना नहीं चाहती। तू रोज खटता है, पर रोटी के दो टुकड़े जुटाना पहाड़ चढ़ने जैसा हो गया है।”
अर्जुन ने हौसला दिया, “माँ, किस्मत नाराज नहीं है, बस हमें आजमाया जा रहा है। मैं गाँव के सेठ जयप्रकाश के पास जाने की सोच रहा हूँ। अगर वहाँ काम मिल गया तो हमारी जिंदगी बदल जाएगी।”
माँ ने समझाया, “बेटा, तू बचपन से सच्चा और मेहनती रहा है। पर दुनिया में चालाक लोग मिलेंगे। बस अपनी ईमानदारी का साथ मत छोड़ना।”
अगले दिन अर्जुन सेठ जयप्रकाश की हवेली पहुँचा। ऊँची इमारत, रंगीन दीवारें और पहरेदार देख वह चकित रह गया। पहरेदार ने पूछा, “कौन हो भाई?”
“नाम अर्जुन है। काम की तलाश में आया हूँ,” उसने विनम्रता से कहा।
सेठ जयप्रकाश गोरे-मोटे, पर आँखों में गहराई वाले व्यक्ति थे। उन्होंने पूछा, “काम तो बहुत है, पर ईमानदार आदमी कम मिलता है। तू क्या कर लेता है?”
“जो कहा जाएगा कर लूँगा। मेहनत का सम्मान और दो वक्त की रोटी चाहिए। मैंने दसवीं भी पार की है।”
सेठ ने कहा, “गोदाम में जाकर मुंशी कृष्णदास से मिल। अगर वह कहे कि लड़का ठीक है, तो यहीं टिक जाएगा।”
गोदाम में मुंशी कृष्णदास ने काम सौंपा। अर्जुन ने बिना थके हर बोरा संभाला, तोला और साफ रखा। शाम को मुंशी ने सेठ से कहा, “यह लड़का अलग है। एकदम सीधा और ईमानदार।”
कुछ हफ्तों में अर्जुन गोदाम का भरोसेमंद बन गया। लोग कहने लगे कि वह सेठ का खास बन गया है। पर जहाँ मेहनत होती है, वहाँ जलन भी होती है।
सेठ का छोटा भाई धनराज व्यापार में घपला कर रहा था। उसे लगा कि यह गरीब लड़का सेठ का भरोसा जीत रहा है और उसका प्रभाव कम हो रहा है। उसने मुंशी से कहा, “यह अर्जुन बहुत सीधा बनता है। निगाह रखना इस पर।”
एक रात जब सारे मजदूर जा चुके थे, अर्जुन हिसाब की पर्ची लिखकर गोदाम में रख रहा था। तभी धनराज आया और बोला, “अर्जुन, अब घर जा। गोदाम मैं बंद कर दूँगा।”
अगले दिन सेठ ने स्टॉक जाँचा तो गिनती में गड़बड़ी निकली। सेठ ने गुस्से में कहा, “अर्जुन, कल रात यहाँ क्या कर रहा था? गिनती में गड़बड़ी है।”
अर्जुन की आँखें भर आईं, “सेठ जी, मैं हर बोरा बार-बार देखकर रखता हूँ। मेरे हिसाब में कभी गलती नहीं हुई।”
सेठ ने कहा, “जा, आज से काम पर मत आना जब तक सच सामने न आए।”
अर्जुन टूट गया। घर पहुँचकर माँ से बोला, “लोगों ने मेरी सच्चाई पर शक किया। चोरी का इल्जाम लगा।”
विनम्र देवी ने धैर्य बँधाया, “समय सबका चेहरा खोल देता है। मुझे पता है तूने कुछ गलत नहीं किया।”
अर्जुन फिर खेतों में काम करने लगा। एक दिन उसके पुराने मालिक भोलानाथ ने कहा, “तू और चोरी? मैंने तुझे बचपन से देखा है। सेठ को पहचानने में गलती हुई है।”
उधर सेठ जयप्रकाश बेचैन था। उसने गोदाम में जाँच की और धनराज की लिखावट वाले कागज मिले। उसने मुंशी से पूछा, “यह क्या? यह तो मेरे भाई की लिखावट है।”
सेठ ने पुराने मजदूर मोहित को बुलवाया। सबके सामने पूछा, “बोल मोहित, सच बता दे। नहीं तो पुलिस में दे दूँगा।”
डर के मारे मोहित ने कहा, “माफ कर दीजिए। छोटे सेठ ने वर्षों से घपला करवाया। उस रात भी उन्होंने अर्जुन के जाने के बाद अनाज बिकवाया और उसे फँसाने की साजिश की।”
सेठ ने धनराज को डाँटा, “तू साँप निकला! तेरे वजह से मैंने बेचारे अर्जुन को कितना कुछ बोला। निकल जा मेरे सामने से।”
फिर सेठ ने अर्जुन से माफी माँगी, “मुझे माफ कर दे बेटा। मैंने तुझ पर शक किया। तू बहुत ईमानदार है। अब से तू मुंशी जी के साथ सब कारोबार देखेगा।”
अर्जुन खुश होकर घर आया। माँ ने कहा, “तूने अपनी ईमानदारी से नाम ऊँचा कर दिया। ऐसे ही हमेशा सच्चे रहना।”
अर्जुन बोला, “माँ, आज मुझे ईमानदारी का फल मिल गया। अब हमारी गरीबी खत्म होगी। मैं इस घर की सब मुश्किल दूर करूँगा।”
ऐसे अर्जुन की ईमानदारी और सच्चाई की वजह से दोनों माँ-बेटे के जीवन में सुख समृद्धि आ गई।
ईमानदारी और मेहनत का फल देर से लेकिन मीठा जरूर मिलता है। सच्चाई की राह कठिन होती है, पर अंत में जीत उसी की होती है।

