सोने का लालच: राजू की कहानी
राजू एक छोटे से गांव में रहने वाला साधारण बुनकर था। वह पूरे साल सर्दियों का इंतजार करता और ऊनी स्वेटर बनाकर अपना गुजारा चलाता था। राजू को बस एक ही काम आता था – ऊन की बुनाई। उसकी जिंदगी सादगी से भरी थी और वह अपनी मेहनत की कमाई से संतुष्ट था।
इस साल राजू ने सोचा कि सर्दी आने से पहले ही सस्ती ऊन खरीद लेगा और फिर मुनाफा कमाएगा। लेकिन जब वह बाजार पहुंचा तो दुकानदार मोहन ने बताया कि इस बार कड़ाके की सर्दी पड़ने वाली है और ऊन के दाम पहले से ही आसमान छू रहे हैं। राजू निराश होकर महंगी ऊन खरीदकर घर लौट आया।
रात को राजू भूखा-प्यासा बैठा स्वेटर बुन रहा था। उसने सोचा कि पहला स्वेटर भगवान को चढ़ाएगा ताकि उसका व्यापार अच्छा चले। जब स्वेटर तैयार हो गया तो वह मंदिर की ओर चल पड़ा।
मंदिर की सीढ़ियों पर राजू को एक वृद्ध भिखारी रामदास मिला। रामदास ठंड से कांप रहा था और उसने राजू से वह स्वेटर मांगा। राजू ने मना कर दिया क्योंकि वह स्वेटर भगवान के लिए था। रामदास उदास होकर वहीं बैठ गया।
मंदिर में राजू ने भगवान से प्रार्थना की – “हे प्रभु, मैं गरीबी से तंग आ गया हूं। मुझे भी अमीर बनना है। मैं सोने के कपड़े पहनना चाहता हूं, सोने के कपड़े बेचना चाहता हूं।” उसने स्वेटर चढ़ाया और घर लौट आया।
घर पहुंचकर राजू फिर से बुनाई करने बैठा। उसने देखा कि सलाइयों में सुनहरे रंग का धागा लगा है। जैसे ही उसने बुनाई शुरू की, वह धागा बढ़ने लगा। राजू की आंखें फटी रह गईं – यह तो सोने का धागा था! जल्दी-जल्दी उसने एक सोने का स्वेटर बुन डाला।
राजू खुशी से पागल हो गया। उसने सोने का स्वेटर फिर से भगवान को चढ़ाया और पहले वाला ऊनी स्वेटर वापस ले आया। फिर उसने कई सोने के स्वेटर बनाकर सुनार सेठ गोपाल को बेचे। सेठ ने अच्छे दाम दिए लेकिन कहा कि इतने महंगे स्वेटर हर कोई नहीं खरीद सकता।
राजू को अब सोने की भूख लग गई थी। उसने सोचा – “जब मेरे पास असीमित सोना है तो मैं हर चीज सोने की क्यों न बनाऊं?” उसने मजदूरों को बुलाया और सोने का घर बनवाने लगा। सोने की खिड़कियां, सोने के दरवाजे, सोने की दीवारें – सब कुछ सोने का!
बगीचे में भी राजू ने मिट्टी की जगह सोने के टुकड़े बिछवाए और सोने के पौधे लगवाए। जब मजदूर ने असली पौधे लगाने की बात की तो राजू गुस्से में बोला – “क्या तुम्हारे असली पौधे मेरे सोने के पौधों से ज्यादा कीमती हैं?”
राजू अब अपनी सोने की दुनिया में खोया हुआ था। उसके बिस्तर, कपड़े, बर्तन – सब कुछ सोने का था। वह खुश था कि उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो गई हैं।
फिर एक रात सर्दी का प्रकोप शुरू हुआ। तेज ठंडी हवाएं चलने लगीं और तापमान बहुत नीचे गिर गया। राजू का सोने का घर बर्फ की तरह ठंडा हो गया। सोने की जालीदार खिड़कियां हवा को रोक नहीं पाईं। सोने के कपड़े और सोने का बिस्तर उसे ठंड से बचा नहीं सके।
राजू ठंड से कांपने लगा। उसकी हालत खराब होती जा रही थी। उसने अलमारी खोली लेकिन वहां सिर्फ सोने के कपड़े थे – एक भी ऊनी स्वेटर नहीं। घबराहट में राजू घर से बाहर निकला और ठंड से बचने के लिए जंगल की ओर भागा।
जंगल में एक पेड़ के नीचे राजू ठंड से सिकुड़कर लेट गया। धीरे-धीरे उसका शरीर सुन्न होने लगा और आंखें बंद हो गईं। मौत करीब आ रही थी।
अगली सुबह जब राजू की आंखें खुलीं तो वह एक मिट्टी के साधारण घर में था। चूल्हे में आग जल रही थी और उसने वही पुराना ऊनी स्वेटर पहना था जो उसने भगवान को चढ़ाया था। ऊपर एक गर्म कंबल था।
राजू ने देखा कि वही भिखारी रामदास चाय बना रहा था। रामदास ने बताया – “कल रात मैंने तुम्हें जंगल में मरते हुए पाया और यहां ले आया। तुम्हारे कीमती सोने के कपड़े तुम्हें ठंड से नहीं बचा सके।”
राजू की आंखों में आंसू आ गए। उसे अपनी गलती समझ आ गई। उसने कहा – “मैं सोने की चमक में अंधा हो गया था। मैं भूल गया कि सोना हर समय काम नहीं आता। प्यास लगे तो पानी चाहिए, भूख लगे तो भोजन चाहिए, सर्दी हो तो ऊनी कपड़े चाहिए। सोना-चांदी से सजावट हो सकती है लेकिन जीवन की असली जरूरतें पूरी नहीं होतीं।”
रामदास मुस्कुराया। राजू ने उससे वादा किया – “अब मैं फिर से ऊनी कपड़े बनाऊंगा। जो पहले दो स्वेटर बनूंगा, एक भगवान को और दूसरा तुम्हें दूंगा। तुमने मेरी जान बचाई और मुझे जीवन का असली पाठ सिखाया।”
राजू ने सीखा कि असली धन जीवन की जरूरतों को पूरा करना है, न कि चमक-दमक में खो जाना। वह फिर से एक साधारण बुनकर बन गया और खुशी-खुशी जीवन जीने लगा।
असली धन वह है जो जीवन की वास्तविक जरूरतों को पूरा करे। सोना-चांदी केवल दिखावा है, लेकिन भोजन, पानी और गर्म कपड़े जीवन की असली जरूरत हैं। लालच में अंधा होकर हम अपनी असली खुशियों को खो देते हैं।

