रामपुर गाँव में शिक्षा का नाम-निशान तक नहीं था। गाँव के लोग केवल खाना-पीना और सोना जानते थे। अंग्रेजी तो दूर, उन्हें हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी। खुद कभी पढ़े नहीं थे, तो अपने बच्चों को पढ़ाने की बात कैसे सोचते।
एक दिन रामकिशन नाम का एक व्यक्ति गाँव में सामान बेचने आया। उसकी आवाज गूंज रही थी – “सौ-सौ के सामान, हज़ारों-हज़ार के सामान, लाखों के सामान, सब कुछ सिर्फ सौ में!”
गाँव का एक आदमी मोहन पूछता है, “अरे भाई, सौ का मतलब कितना होता है?”
दूसरा आदमी शंकर बोलता है, “अरे बुद्धू, तुम्हें यह भी नहीं पता कि सौ का मतलब एक हज़ार रुपये होता है?”
तीसरा आदमी रामू चिल्लाता है, “अरे पागल, तुम्हें नहीं पता सौ का मतलब दस हज़ार रुपये होता है!”
मोहन खुशी से कहता है, “इसका मतलब हमें इतना महंगा सामान सिर्फ सौ रुपये में मिल रहा है। चलो लेते हैं… आज तो हमारा ही फायदा है!”
गाँव के सभी लोग रामकिशन के पास इकट्ठा हो जाते हैं। एक-एक करके सभी उस व्यक्ति का सामान खरीद लेते हैं। यह सिलसिला गाँव में लगातार चलता रहता है।
एक दिन आकाश नाम का एक लड़का उसी गाँव से गुज़र रहा था। रामकिशन की आवाज़ सुनकर वह पूरा मामला देखने लगा। दुकानदार के जाने के बाद उसने पूछा, “अरे आप लोगों ने इतना सामान क्यों ले लिया?”
एक बूढ़ी औरत काकी बोली, “अरे बेटा, तुमने नहीं देखा वह आदमी कितना अच्छा है! सारा सामान कितना सस्ता दे गया। तुम जानते हो पूरे सौ का सामान सौ रुपये में दे गया!”
आकाश हँसते हुए बोला, “मैं भी जानता हूँ सौ कितना होता है, पूरे दस हज़ार!”
काकी गुस्से से बोली, “अरे काकी, सौ का मतलब सिर्फ सौ रुपये होता है। क्या आप सब गाँव में अनपढ़ हैं? यह आदमी आप लोगों को मूर्ख बना रहा है।”
औरत चिढ़कर बोली, “अरे जा जा, तुम क्या जानो! आजकल के बच्चे…”
आकाश मन ही मन सोचता है – “इस गाँव में तो पूरी तरह से अनपढ़ लोग हैं। चलो आगे बढ़ता हूँ।”
कुछ दिन बाद गाँव में के.डी. नाम का एक शख्स आता है। वह जोर-जोर से चिल्लाता है, “आओ-आओ, सिर्फ एक महीने में अंग्रेजी सीखो! हम अंग्रेजी का घोल पिलाते हैं… आओ और बिना मेहनत के सीखो, सिर्फ 200 रुपये में! एक महीने में धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलो… महिलाओं के लिए विशेष ऑफर, सिर्फ 100 रुपये में सीखें और धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलें!”
वहाँ खड़ा रामू बोलता है, “अरे हरिया, देख रहा है कितना कमाल से अंग्रेजी सिखाते हैं! हमें पढ़ने की भी जरूरत नहीं, घोल मिलाकर पीना है!”
हरिया जवाब देता है, “हाँ रामू, तू बिल्कुल सही कह रहा है। फिर तो हम भी उन फिल्मों के हीरो की तरह टर्र-टर्र अंग्रेजी बोलेंगे! चल उनसे बात करते हैं।”
दोनों के.डी. के पास जाते हैं। रामू पूछता है, “क्या सच में आप हमें अंग्रेजी का घोल पिलाओगे?”
के.डी. मुस्कुराते हुए कहता है, “हाँ हाँ, हम तुम्हें अंग्रेजी का घोल पिलाएंगे… हम बहुत अच्छे से अंग्रेजी बोलना जानते हैं।”
हरिया शक से पूछता है, “भाई, पहले यह तो बताओ कि तुम्हें अंग्रेजी आती है कि नहीं?”
के.डी. आत्मविश्वास से बोलता है, “हाँ हाँ, मुझे अंग्रेजी आती है… I SPEAK ENGLISH… I EAT ENGLISH… I CAN TALK ENGLISH… I CAN WALK ENGLISH… BECAUSE ENGLISH IS MY FAVORITE LANGUAGE!”
रामू और हरिया ताली बजाते हुए कहते हैं, “वाह वाह! तुम्हें तो कमाल की अंग्रेजी आती है! तुम बहुत अच्छे हो! हमें भी सिखाओ!”
के.डी. बोलता है, “हमने इतने रिक्शा वालों को अंग्रेजी सिखाई है। अब वे लोग बड़े इंसान बन गए हैं। तो तुम्हें भी सिखाएंगे। ठीक है, 200 रुपये जमा करो और कल आ जाओ… तुम लोग बहुत जल्दी सीख जाओगे… BECAUSE ENGLISH IS VERY FUNNY LANGUAGE!”
हरिया पूछता है, “भाई, लेकिन एक बात समझ नहीं आई कि तुम औरतों को 100 रुपये की छूट क्यों देते हो?”
के.डी. समझाता है, “इसलिए कि औरतें पहले से ही धाराप्रवाह बोलना जानती हैं। हम महिलाओं को डिस्काउंट देते हैं। तुमने सौ-हज़ार रुपये की बात की, औरतों की बोलने में कोई बराबरी नहीं… अब तुम लोग जल्दी से अपनी फीस जमा करो और अंग्रेजी बोलना सीखो लल्लनटॉप!”
दोनों भागकर घर जाते हैं और सभी गाँववालों को बताते हैं। यह सुनकर सभी गाँववाले के.डी. के दफ्तर के सामने इकट्ठा हो जाते हैं। और सभी गाँववाले पैसे जमा कर देते हैं।
के.डी. कहता है, “चलो सब लोग यहाँ आओ और अंग्रेजी का घोल पीओ।”
के.डी. अंग्रेजी नाम का एक डिब्बा निकालता है और सबको पानी में घोलकर पिलाता है।
सभी खुश होकर बोलते हैं, “वाह, अंग्रेजी पीने में कितना मज़ा आया!”
रामू पूछता है, “के.डी. सर, कितने दिनों में हम अंग्रेजी बोलना सीख जाएंगे?”
के.डी. जवाब देता है, “बस 1 महीने में और तुम लोग उन गोरों से भी बेहतर अंग्रेजी बोलना सीख जाओगे!”
मोहन खुशी से कहता है, “ठीक है सर! अब तो मैं अंग्रेजी बोलकर किसी गोरी मेम से शादी कर लूँगा!”
हरिया हँसता है, “हाँ रामू, अब तो बस मज़े की ज़िंदगी कटेगी! तुम्हारे बच्चे जन्म लेते ही अंग्रेजी बोलेंगे!”
सभी हँसते हैं, “हाँ हाँ, अब बस महीने के अंत का इंतज़ार है!”
एक महीना बीत जाता है। हरिया रामू से कहता है, “अरे हरिया, 1 महीना हो गया लेकिन अभी तक हमें अंग्रेजी नहीं आई।”
रामू जवाब देता है, “हाँ रामू, चलो के.डी. सर के पास चलते हैं और पता लगाते हैं। और गाँववालों को भी साथ लेते चलो।”
हरिया और रामू गाँववालों के साथ के.डी. के दफ्तर पहुँचते हैं।
हरिया पूछता है, “अरे के.डी. सर, 1 महीना हो गया लेकिन हमें अभी भी अंग्रेजी बोलनी नहीं आती!”
सभी गाँववाले एक साथ बोलते हैं, “हाँ सर, हम सब बहुत समय से इंतज़ार कर रहे हैं लेकिन अंग्रेजी बोलनी नहीं आ रही!”
के.डी. सोचकर बोलता है, “ठीक है ठीक है, मुझे लग रहा है तुम दोनों के दिमाग में अभी अंग्रेजी अच्छे से नहीं घुली… तुम्हारा दिमाग कैसे घुलेगा, इसलिए तुम लोग एक बार फिर से अंग्रेजी पीओ।”
रामू डरते हुए पूछता है, “सर, इसके बाद फायदा होगा ना?”
के.डी. आश्वासन देता है, “हाँ हाँ, पक्का होगा!”
सभी गाँववाले फिर से पैसे जमा करते हैं और अंग्रेजी पीकर आते हैं।
एक महीना और बीत जाता है। हरिया निराश होकर कहता है, “दूसरा महीना भी बीत गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ! चलो के.डी. सर के पास चलते हैं।”
रामू सहमति जताता है, “हाँ रामू, गाँववाले भी मुझसे यही कह रहे थे… हम भी गाँववालों को साथ ले चलते हैं।”
सभी फिर से के.डी. के दफ्तर पहुँचते हैं। तो वहाँ एक व्यक्ति उस दफ्तर में ताला लगा रहा है। हरिया बोलता है, “अरे चाचा, यह के.डी. सर कहाँ चले गए और आप यहाँ ताला क्यों लगा रहे हो?”
वह व्यक्ति जवाब देता है, “उसने मुझसे दो महीने के लिए दुकान किराये पर ली थी। अब वह चला गया… लेकिन तुम लोग क्यों पूछ रहे हो?”
हरिया पूरी बात बताता है। तभी वह व्यक्ति हँसता है, “हा हा हा… अरे मूर्खों, अंग्रेजी घोल पीने से नहीं आती! इसके लिए किताबें पढ़नी पड़ती हैं, स्कूल जाना पड़ता है… अगर तुम लोग पढ़े-लिखे होते तो तुम्हें कोई बेवकूफ नहीं बना पाता!”
सभी गाँववाले शर्मिंदा होकर सिर झुका लेते हैं और समझ जाते हैं कि शिक्षा कितनी महत्वपूर्ण है। शिक्षा जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। अनपढ़ रहने से लोग हमें आसानी से धोखा दे सकते हैं। ज्ञान ही वह शक्ति है जो हमें सही और गलत में फर्क समझने में मदद करती है। हमें हमेशा पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए और अपने बच्चों को भी शिक्षित बनाना चाहिए।

