हिमाचल की वादियों में एक छोटा-सा गाँव था — और उस गाँव में सिंह परिवार का नाम था। रमेश सिंह और उनकी पत्नी सुमित्रा देवी के दो बेटे थे — बड़ा विक्रम और छोटा आर्यन। सेब के बाग़, मेन रोड पर फर्नीचर की दुकान, किराए की तीन दुकानें — खुशहाली का कोई अंत नहीं था।
लेकिन जब विक्रम की शादी की बात चली… तो पहली ही मुलाकात में एक लड़की ने उसका दिल चुरा लिया।
उसका नाम था — माया देवी।
साधारण घर की लड़की। सादा पहनावा। शांत मुस्कान। लेकिन उस मुस्कान के पीछे क्या था — यह किसी को नहीं पता था।
शादी धूमधाम से हुई। माया इस घर की बहू बन आई। एक साल में बेटा हुआ। घर में किलकारियाँ गूँजीं।
लेकिन खुशियाँ ज़्यादा दिन टिकती कहाँ हैं…
धीरे-धीरे विक्रम और माया के बीच दरारें पड़ने लगीं। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े। तू मुझे नज़रअंदाज़ करता है… तू मेरी परवाह नहीं करता… फिर एक रात — विक्रम को अचानक सीने में दर्द हुआ। अस्पताल पहुँचने से पहले ही… वो चला गया।
घर में मातम छा गया।
एक साल बाद जब आर्यन की शादी की बात चली — तो माया के चेहरे पर अजीब सी बेचैनी आ गई। क्यों?
रमेश सिंह को एक रात देर से माया चुपके से घर में घुसती दिखी। आर्यन की रातों की नींद उड़ गई। अनजाने में वो बार-बार माया के कमरे की तरफ खिंचता। जैसे कोई धागा उसे खींच रहा हो — काला धागा।
जब परिवार पंडित जी के पास पहुँचा और फिर तांत्रिक के सामने सारी बात रखी — तो तांत्रिक की आँखें गंभीर हो गईं।
“इस पर घर की ही एक विधवा का वशीकरण है। उसे कुछ खिलाया-पिलाया गया है। हर रात 12 बजे के बाद वो पूजा करती है… और आर्यन उसके वश में आता जा रहा है। नहीं चाहती कि इसकी शादी किसी और से हो।”
“और… विक्रम की मौत के पीछे भी — उसी का हाथ हो सकता है।”
पूरे परिवार के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
आर्यन को फौरन दुबई भेज दिया गया। संपत्ति माया के नाम कर दी गई। और आर्यन ने जब लौटा — तो उसने माया से हर रिश्ता पूरी तरह खत्म कर दिया।
काला धागा टूट चुका था।
लेकिन उस रात की यादें… कभी नहीं टूटतीं।

