गाँव की गलियाँ सो चुकी थीं। कुत्तों का रोना भी थम गया था। पर उस पुराने हवेलीनुमा घर में नयना की आँखें अचानक खुल गईं — जैसे किसी ने भीतर से झकझोर दिया हो।
खट… खट… खट…
वो आवाज़ें दीवारों से नहीं, हवा से आ रही थीं। नयना की साँसें तेज़ हो गईं। वो रज़ाई में और गहरी घुस गई, पर उसका दिल बाहर निकला जा रहा था।
“राम-राम… चंपा की भूतिया कहानियाँ सुन-सुन के पगला गई हूँ मैं।” — उसने खुद से कहा।
पर सच यह था कि कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो सिर्फ कानों तक नहीं, आत्मा तक पहुँचती हैं। नयना उस रात सो नहीं पाई।
सुबह का झगड़ा
सूरज निकला तो सावित्री ने नयना को बुलाया।
“तेरी मौसी कमला का फोन आया था। कह रही है — नयना की शादी कब होगी?”
नयना का माथा ठनका। “मौसी के लिए अपनी जिंदगी बर्बाद कर लूँ? मुझे शहर में पढ़ना है। मैं टॉपर रही हूँ गाँव में — क्या इसीलिए कि किसी के घर चाय बनाऊँ?”
सावित्री की आँखें सख्त हो गईं। “इस गाँव में तू अकेली कुँवारी बची है। तेरी सहेलियों के बच्चे हो गए। अब मुझे मुँह दिखाने लायक छोड़ेगी या नहीं?”
नयना ने खाना छोड़ा, घर छोड़ा — और नदी किनारे जा बैठी।
नदी का पानी साफ था। पर जैसे ही उसने झाँका — पानी में एक परछाईं दिखी। किसी की। उसकी अपनी नहीं।
नयना उछलकर पीछे हट गई। पसीना माथे पर आ गया।
तभी एक बूढ़ा किसान पास आया — “डरो मत बेटी। यह आँखों का धोखा है। बस बिना पीछे मुड़े सीधे घर चली जाओ।”
नयना गई। पर वो लड़की जो थी — वो पीछे मुड़ी भी। देखा कि कुछ नहीं था। पर भीतर कुछ था जो हिल गया था।
तस्वीरों वाला दिन
सावित्री ने शाम को कुछ लड़कों की तस्वीरें मेज़ पर रख दीं।
“यह नीली शर्ट वाला। शहर में रहता है। कमाता भी है। तू पढ़ना चाहती है ना — शहर में पढ़ लेना।”
नयना ने एक नज़र डाली और कमरे में बंद हो गई।
उसका मन दो टुकड़ों में था — एक टुकड़ा जो उड़ना चाहता था, और एक जो माँ की थकी आँखें देख चुका था।
छाया की पहली झलक
कुछ दिन बाद रामदास शहर से लौटे। लड़के वाले आए। नयना को देखकर सभी खुश हो गए। शादी तय हो गई।
नयना के मन में एक ही विचार था — “शादी के दिन भाग जाऊँगी।”
पर उसी दिन शाम को जंगल के रास्ते लौटते वक्त उसे लगा — किसी ने पीछे से उसके कंधे को छुआ। पर पीछे मुड़ी तो कोई नहीं था।
जंगल की हवा ठहरी हुई थी।
“यह क्या है?” — नयना ने खुद से पूछा, पर जवाब नहीं था।
मुल्तानी मिट्टी और बंद आँखें
घर आकर नयना ने मुँह धोया। मुल्तानी मिट्टी लगाई। आँखें बंद कीं।
और तभी — वही हवा।
भीतर। कमरे में। बंद कमरे में।
नयना ने माँ को सब बताया।
सावित्री ने मिर्ची-राई से नज़र उतारी, साथ सुलाई। पर रात को ठीक दो बजे — सावित्री खुद डंडा लेकर उठ खड़ी हुई।
चोर? या कुछ और?
पूरे घर में डंडा बजाया। कोई नहीं मिला। पर एहसास रहा।
आईने में वो चेहरा
शादी से तीन दिन पहले। नयना ने लाल साड़ी पहनी, गजरा लगाया, आईने के सामने खड़ी हुई।
“क्या लग रही है तू! आज तो ऐश्वर्या भी फेल है।” — उसने मुस्कुराते हुए कहा।
और तभी — आईने में उसके पीछे एक छाया। एक लड़के की। वो उसे ही देख रहा था। चुपचाप। बिना हिले।
नयना के हाथ से लिपस्टिक गिर गई।
वो भागी।
सावित्री ने सब सुना। चुप रही। फिर धीरे से बोली — “तू दरवाज़ा खोलकर बैठ। मैं दो मिनट में आई।”
और सावित्री दौड़ी — जंगल की उस गुफा की तरफ जहाँ महामाई रहती थीं।
महामाई की शक्ति
गुफा में दीपक जल रहे थे। महामाई की आँखें बंद थीं।
सावित्री ने पाँव पकड़े — “माई, मेरी बेटी की शादी नहीं होने देगा वो छाया। अब तू ही कुछ कर।”
महामाई ने पानी में मंत्र पढ़े। पीली सरसों और गूगल फूँककर दिए।
“यह पानी घर में छिड़कना। पीली सरसों हर कोने में बिखेरना। गाय के कंडे पर कपूर जलाकर धूप देना। और सुनो — यह साया साधारण नहीं है। उसके लिए तीन दिन श्मशान में पूजा होगी। मेरी योगिनी उसे ले जाएगी।”
मेहंदी, हल्दी और उस रात का सन्नाटा
सावित्री ने घर में सब कुछ किया। पीली सरसों, धूप, पवित्र जल।
छाया चिरमिराया। और घर के एक बंद कमरे में जाकर छुप गया।
इधर गाँव की औरतें आईं। चूड़े पहने। मेहंदी लगी। चंपा ने नाचना शुरू किया और नयना को भी खींच लिया।
उस एक रात के लिए — नयना भूल गई। सब भूल गई।
हल्दी का दिन आया। घर में चहल-पहल। रिश्तेदार, हँसी, गाने।
पर सावित्री जानती थी — अभी खेल खत्म नहीं हुआ।
शादी का दिन — सबसे बड़ा दाँव
सुबह-सुबह जल्दबाजी में सावित्री पूजा करना भूल गई।
नयना तैयार होने लगी — और तभी उसे फिर से वही एहसास हुआ।
आईने में देखा।
वो छाया था। मुस्कुरा रहा था।
नयना ने खुद को सँभाला। माँ को बताया। पर अब महामाई साधना में थीं — बात नहीं हो सकती थी।
डर-डर कर शाम हो गई। बारात आई।
सावित्री ने दूल्हे की आरती उठाई — और दूल्हा बेहोश हो गया।
और सावित्री की नज़र गई — दूल्हे के ठीक पीछे, वो छाया खड़ा था। मुस्कुराता हुआ।
सावित्री घुटनों पर आ गई। हाथ जोड़े। आँखें बंद कीं।
“माई… अपनी योगिनी को भेज दे। मेरी बेटी की जिंदगी बचा ले।”
योगिनी का आगमन
हवा थमी।
फिर — एक झोंका आया। पर यह झोंका ठंडा नहीं, गर्म था। जैसे किसी शक्ति का स्पर्श।
योगिनी आई — हवा के रूप में। उस छाये को लपेटा। जकड़ा। और ले गई।
महामाई ने उसे श्मशान में गाड़ दिया — हमेशा के लिए।
घर में फिर से साँस आई।
दूल्हा होश में आया।
और नयना — जो भागने की सोच रही थी — वो सज-धजकर मंडप में बैठी।
शादी हुई। धूमधाम से। गाजे-बाजे के साथ।
महामाई भी आईं — किसी बूढ़ी औरत के रूप में। नयना के सिर पर हाथ रखा। मुस्कुराईं। और चली गईं।
नयना की आँखें भर आईं — पर इस बार डर से नहीं, कृतज्ञता से।

