उस वक्त मेरी उम्र करीब 35 साल थी और जिंदगी में पहली बार मुझे ऐसा लगा था कि शायद एक अच्छी जगह मिल गई रहने के लिए। बदलापुर रोड पर एक नई तीन मंजिला सोसाइटी थी। नाम था “शांतिनगर अपार्टमेंट।” मैंने वहाँ तीसरी मंजिल पर फ्लैट नंबर 301 लिया था।
बिल्डिंग नई थी। छह-सात महीने पहले ही निर्माण पूरा हुआ था। धीरे-धीरे लोग आ रहे थे। जगह सस्ती थी क्योंकि बिल्डिंग एक तरफ थी — शहर से थोड़ी दूर। और उसके पीछे सीधा जंगल शुरू हो जाता था। माथेरान की तरफ जाने वाला घना, अंधेरा जंगल।
रात को 8 बजे के बाद जंगल की तरफ से ऐसा सन्नाटा छा जाता था कि दिल थाम लो।
उस रात — वो 11 नवंबर की रात थी — किसी के घर पूजा थी। नीचे कैंपस में बाँस-त्रिपाल का छोटा स्टेज बना था। कोई 20-25 लोग जमा थे। कुर्सियाँ बिछी थीं। ऊपर एक हैलोजन लाइट जल रही थी जो पूरे कैंपस को पीली रोशनी में नहला रही थी। लेकिन एक कोना था — कुर्सियों की आखिरी लाइन के पीछे — जहाँ घना अंधेरा था।
रात के करीब 11 बजे, जब सब आपस में बातें कर रहे थे, तभी हैलोजन की लाइट बुझ गई। एक पल के लिए पूरा कैंपस अँधेरे में डूब गया। सब सकपका गए। फिर धीरे-धीरे मोबाइल टॉर्च जली, हँसी-मजाक शुरू हुई।
और तभी — एक औरत चीखती हुई भागकर आई।
उसका नाम था माया देशमुख। वो उस अँधेरे कोने में अकेली बैठी थी। उसके पति अरुण देशमुख कुछ देर पहले आगे बातों में लग गए थे। माया थकी हुई थी तो आखिरी कुर्सी पर बैठ गई। बगल की कुर्सियाँ खाली थीं।
माया ने आँखें बंद कीं।
तभी उन्हें महसूस हुआ — कुर्सी के पास कोई हलचल है। आँखें खोलीं तो दाईं तरफ, चार कुर्सियाँ छोड़कर, कोई बैठा था। एक औरत। घूँघट था। पुरानी साड़ी। गर्दन झुकी हुई। बिल्कुल पुतले की तरह — हिल नहीं रही थी, साँस का नामोनिशान नहीं।
माया ने नजर घुमाई। फिर वापस देखा।
और तब वो हाथ हिला।
आर्म रेस्ट पर रखा हाथ — धीरे-धीरे सरक रहा था। एक कुर्सी… दो कुर्सी… तीन… चौथी।
माया समझ नहीं पाई कि वो हाथ इतना लंबा कैसे हो सकता है।
और तभी — बर्फ जैसी ठंडक।
उस हाथ ने माया की कलाई पकड़ ली।
माया ने नीचे देखा। हाथ था — असली था, ठंडा था। लेकिन वो औरत तो चार कुर्सियाँ दूर बैठी थी। वहाँ से हाथ का पहुँचना नामुमकिन था।
माया ने ऊपर देखा।
वो चेहरा।
पूरा काला। आँखों में सफेद रंग भरा हुआ। गर्दन नीचे झुकी हुई थी — लेकिन चेहरा माया की तरफ था। पूरी तरह।
उसी पल लाइट चली गई।
माया चीखती हुई दौड़ पड़ी। कुर्सियाँ पलटती हुई, अँधेरे में लड़खड़ाती हुई। उसकी आवाज पूरे कैंपस में गूँज उठी —
“वो औरत नहीं है! वो कोई और है!”
अगली सुबह — सूरज अभी-अभी निकला था — मैं अकेले बिल्डिंग के पीछे गया।
वहाँ एक बरगद का विशाल पुराना पेड़ था। उसकी टहनियाँ इतनी फैली थीं कि नीचे जैसे एक अलग दुनिया थी। ठंडी, गीली, दम घोटती छाँव।
पेड़ की जड़ों के पास — मिट्टी में सात छोटे उभार थे।
मैं घुटनों के बल बैठा। हाथ से कुरेदा। पहला उभार खोला।
अंदर से निकला — एक काले पत्थर की मूर्ति। इंसान जैसी शक्ल, लेकिन चेहरा नहीं था। जहाँ चेहरा होना चाहिए था — वहाँ सपाट, चिकनी सतह।
और वो उल्टी गड़ी थी। सिर नीचे, पैर ऊपर। मुँह जमीन की तरफ।
सातों मूर्तियाँ एक जैसी थीं। एक ही साँचे की। एक कतार में, जैसे किसी ने बड़े इत्मीनान से एक-एक करके गाड़ी हों।
सभी बर्फ जैसी ठंडी थीं।
और तब मेरी नजर पेड़ के तने पर गई — एक पुरानी टिन की तख्ती। काली, जंग खाई हुई। उस पर गहराई से कुरेदा हुआ था:
“यहाँ रुकना मत।”
बस इतना। कोई नाम नहीं। कोई तारीख नहीं। कोई वजह नहीं।
कुछ हफ्ते बाद — संतोष कांबले का किस्सा सामने आया।
संतोष हमारी सोसाइटी में रिक्शा चलाता था। एक रात आखिरी सवारी छोड़कर वो घर लौट रहा था। रात के 12 बजे। सड़क खाली थी। रिक्शा खाली था — उसने खुद देखकर चलाया था।
बिल्डिंग के गेट के पास पहुँचा तो —
“हाँ भैया, यहीं रोकिए।”
एक औरत की आवाज। बिल्कुल पास से। कंधे पर हाथ रखकर बोलने जैसी।
संतोष ने पलटकर देखा।
पिछली सीट — खाली।
एकदम खाली।
संतोष उस रात सो नहीं सका। तीन दिन बाद उसे तेज बुखार चढ़ गया। बदन टूटने लगा। उसने अपनी पत्नी सुमन को बताया तो उसने तुरंत खिड़की बंद कर दी जो जंगल की तरफ खुलती थी।
अगले दिन पूरी बिल्डिंग में खबर फैल गई।
और फिर वो रात आई जो मैं कभी नहीं भूल सकता।
मैं देर से घर लौटा था। फाइलें गाड़ी में थीं। गेट पार करते वक्त एक पल के लिए जंगल की तरफ देखा — अँधेरा था, बरगद का पेड़ था। बस।
तीसरी मंजिल पर घंटी बजाई। जवाब नहीं।
चाबी से दरवाजा खोला। हॉल खाली। किचन में अँधेरा। बेडरूम का दरवाजा आधा खुला था — अंदर से रोशनी आ रही थी।
मैंने दरवाजा खोला।
मेरी पत्नी निलोफर खिड़की के सामने खड़ी थी। खिड़की पूरी तरह खुली थी। वो बाहर देख रही थी — नीचे, जंगल की तरफ।
और वो हँस रही थी।
वो हँसी अजीब थी। जान-पहचान वाली, अपनेपन वाली — लेकिन बेजान। जैसे किसी पुराने दोस्त से बात हो रही हो। लेकिन उस हँसी में जिंदगी नहीं थी।
“निलोफर।”
जवाब नहीं।
“निलोफर, किससे बात कर रही हो?”
मैं उसके पास गया। कंधे पर हाथ रखा।
वो रुक गई।
मैंने उसका चेहरा देखा — आँखों की पुतलियाँ ऊपर चढ़ गई थीं। पूरी सफेद नहीं, लेकिन वो नजर… वो नजर जिंदा नहीं थी।
“चुप बैठ।”
उसकी आवाज थी — लेकिन उसमें वो अपनापन नहीं था जो हमेशा होता है।
“यहाँ मुझ पर आवाज मत करना।”
मैं धीरे-धीरे पीछे हटा। पैर लड़खड़ाए। दरवाजा बाहर से बंद किया। हॉल में बैठ गया। हाथ काँप रहे थे।
पड़ोसियों को बुलाया।
जब सब बेडरूम में गए — निलोफर बेड पर चादर ओढ़े सो रही थी। गहरी नींद में। खिड़की बंद थी।
सुबह उसे कुछ याद नहीं था।
आखिरकार मैंने बिल्डर से पूछा।
पता चला — उस जमीन पर कभी बहुत पुराना कब्रिस्तान था। जमीन बंजर थी, कीमत कम थी — इसलिए खरीदी और बिल्डिंग बना दी।
बिल्डर ने कहा था कि पूजा-पाठ हुआ था। शांति करवाई थी।
लेकिन जो हम सबने अनुभव किया — वो कोई झूठ नहीं था।
और सबसे डरावनी बात — जो हमारे नए वॉचमैन भरत ने बताई।
वो रोज रात को उस बरगद के पेड़ के पास एक औरत को देखता था। रात 1 बजे, 2 बजे, 3 बजे।
वो औरत पेड़ के उस पार — जंगल की तरफ मुँह करके खड़ी होती थी।
लेकिन वो उसकी तरफ देखती थी।
और हँसती थी।
भरत ने काँपते हुए बताया —
“साहब, उसका धड़ जंगल की तरफ होता है। लेकिन गर्दन… गर्दन पूरी घूमी होती है। सीधी मेरी तरफ। ऐसे कोई इंसान नहीं देखता। ऐसे कोई देख ही नहीं सकता।”
उस रात के बाद — मुझे नींद नहीं आई।
कुछ महीनों बाद मैंने दूसरी जगह रहने का इंतजाम किया। निलोफर को बिना ज्यादा बताए। फिर साल भर बाद फ्लैट बेच दिया।
उस जगह — शांतिनगर — मैं कभी वापस नहीं गया।
और वो तख्ती आज भी उस बरगद के तने पर होगी।
“यहाँ रुकना मत।”
