एक समय की बात है, सुंदरपुर नामक एक छोटे से गांव में रामू नाम का एक धोबी रहता था। रामू के पास मोती नाम का एक गधा था, जो उसका वफादार साथी था। रामू हर रोज सुबह-सुबह अपने गधे मोती पर कपड़ों की भारी गठरियां लादकर गांव से पांच किलोमीटर दूर स्थित नीलकंठ तालाब पर कपड़े धोने जाता था।
रामू बहुत ही चालाक और लालची स्वभाव का इंसान था। वह हमेशा अपने फायदे के बारे में सोचता रहता था। बेचारे मोती को हर दिन भारी बोझ ढोना पड़ता था, लेकिन उसका मालिक रामू उसे बहुत ही कम खाना देता था। रामू सोचता था कि अगर वह गधे को ज्यादा खाना देगा, तो उसका खर्चा बढ़ जाएगा। इस लालच के कारण वह मोती को सिर्फ एक मुट्ठी चारा और थोड़ा सा पानी देता था।
धीरे-धीरे मोती कमजोर होता गया। उसकी पसलियां दिखने लगीं और चलना भी मुश्किल हो गया। फिर भी रामू ने उस पर बोझ कम नहीं किया। तालाब जाने के लिए उन्हें घने महुआ जंगल से होकर गुजरना पड़ता था। रामू हमेशा सुबह जल्दी निकलता और शाम होने से पहले घर लौट आता था, क्योंकि जंगल में अंधेरे के बाद जंगली जानवरों का खतरा रहता था।
एक दिन की बात है, जब रामू शाम को कपड़े धोकर घर लौट रहा था, तो उसने जंगल के बीचोंबीच एक बड़े शेर की लाश देखी। शेर की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई थी। रामू के दिमाग में तुरंत एक चालाकी भरा विचार आया। उसने सोचा, “अगर मैं इस शेर की खाल मोती को पहना दूं, तो लोग उसे असली शेर समझेंगे और वह आसानी से किसी के खेत में घुसकर पेट भर खाना खा सकता है।”
रामू ने झट से अपने औजारों से उस मरे हुए शेर की खाल उतार ली और उसे सावधानी से अपने कपड़ों की गठरी में छुपाकर घर ले आया। रात होते ही उसने अपनी योजना पर अमल करना शुरू कर दिया। उसने मोती को बुलाया और उस पर शेर की खाल पहना दी। शेर की खाल पहनकर मोती बिल्कुल असली शेर जैसा दिखने लगा।
रामू ने मोती को पड़ोस के गांव रामपुर के किसान गोपाल के हरे-भरे खेतों में छोड़ दिया। शेर की खाल पहने मोती ने उस रात पेट भरकर खाना खाया। गोपाल का खेत गाजर, मूली, गोभी और अन्य ताजी सब्जियों से भरा हुआ था। मोती ने जी भरकर सब कुछ खाया और सुबह होने से पहले वापस अपने घर पहुंच गया।
यह सिलसिला रोज चलने लगा। रामू रात होते ही मोती को शेर की खाल पहनाकर गोपाल के खेतों में भेज देता और सुबह से पहले वापस बुला लेता। मोती दिन-ब-दिन स्वस्थ और मजबूत होता गया। उसके शरीर पर मांस चढ़ने लगा और वह फिर से तंदुरुस्त दिखने लगा। रामू बहुत खुश था कि उसकी चालाकी कामयाब हो गई थी। अब उसे गधे के लिए चारा खरीदने की जरूरत नहीं थी और मोती भी मजबूत हो गया था।
किसान गोपाल को रोज अपने खेतों में नुकसान दिख रहा था। हर सुबह उसकी फसल उजड़ी मिलती थी। एक रात उसने खेत की रखवाली करने का फैसला किया। जब उसने खेत में एक बड़े शेर को घूमते देखा, तो वह डर से कांप गया। उसे लगा कि यह असली जंगली शेर है, इसलिए वह उस पर हमला करने से डर गया और चुपचाप छुप गया।
दिन बीतते गए और मोती हर रात खेतों में जाकर मजे से खाता रहा। लेकिन एक रात जब वह खेत में खाना खा रहा था, तो दूर से एक गधी की आवाज सुनाई दी। गधी ने “ढेंचू-ढेंचू” की जोर-जोर से आवाज लगाई। मोती यह आवाज सुनकर बहुत उत्तेजित हो गया। आखिरकार वह एक गधा ही था। वह अपने स्वभाव को नहीं रोक सका और उसने भी “ढेंचू-ढेंचू” की जोरदार आवाज लगानी शुरू कर दी। उसकी आवाज पूरे खेत में गूंज उठी।
यह आवाज सुनते ही किसान गोपाल समझ गया कि यह कोई शेर नहीं बल्कि एक गधा है जिसने शेर की खाल पहन रखी है। उसने तुरंत अपने लाठी और मशाल लेकर खेत में पहुंचा और मोती को पकड़ लिया। उसने गुस्से में मोती के शरीर से शेर की खाल उतार दी और उसे अपने घर के आंगन में एक मजबूत रस्सी से बांध दिया।
सुबह होने पर जब रामू अपने गधे को लेने गया, तो उसे मोती नहीं मिला। वह परेशान होकर इधर-उधर ढूंढने लगा। जब उसे पता चला कि गोपाल ने उसके गधे को पकड़ लिया है, तो वह गोपाल के घर गया। गोपाल ने रामू को खूब डांटा और कहा, “तुमने धोखे से मेरी फसल बर्बाद करवाई। अब यह गधा मेरा है। मैं इसे अपने खेत की रखवाली के लिए रखूंगा।”
रामू ने बहुत विनती की, लेकिन गोपाल ने उसकी एक न सुनी। रामू को अपनी लालच और चालाकी का नतीजा भुगतना पड़ा। उसने अपना वफादार साथी मोती खो दिया। वह दुखी मन से खाली हाथ घर लौट आया। उस दिन से रामू को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे समझ आया कि लालच का अंत हमेशा बुरा होता है।
रामू को अब कपड़े धोने के लिए खुद भारी गठरियां उठाकर तालाब तक जाना पड़ता था। वह बहुत थक जाता था। हर दिन उसे अपने किए की सजा मिल रही थी। उसने उस दिन से यह प्रण लिया कि वह फिर कभी लालच नहीं करेगा और किसी के साथ धोखा नहीं करेगा।
इस तरह लालची रामू को अपनी चालाकी और लालच की भारी कीमत चुकानी पड़ी और उसने जीवन का एक महत्वपूर्ण सबक सीखा।
“लालच बुरी बला है। जो लालच करता है, वह अपना सब कुछ खो देता है।”

