दुर्गापुर गाँव में गोपाल और मोहन जंगल से लौट रहे थे। तभी गोपाल डर के मारे काँपते हुए बोला, “जल्दी चल, वो तालाब आने वाला है जहाँ काला हंस रहता है।” मोहन हँसा, “अरे, ये सब बकवास है। कोई हंस इंसान की तरह बात नहीं कर सकता।”
तभी तालाब से रंगीन रोशनी निकली और एक काला हंस प्रकट हुआ। “मेरे सवाल का जवाब दो – सच क्या है, जो दिखे या जो न दिखे?” हंस ने पूछा। गोपाल घबराकर बोला, “जो दिखे वही सच है।” हंस की आँखों से किरणें निकलीं और दोनों तालाब में गिरकर गायब हो गए।
अगले दिन गाँव में हड़कंप मच गया। सरपंच ने सबको चेताया, “उस रास्ते से मत जाना, नहीं तो तुम भी गायब हो जाओगे।” धनपति व्यापारी का बेटा राजन वहाँ आया और सबका मज़ाक उड़ाने लगा, “तुम सब डरपोक हो। मैं उस हंस के दो टुकड़े कर दूँगा।”
उसी गाँव में प्रिया नाम की लड़की अपने बूढ़े पिता रामदास के साथ रहती थी। वह जंगल से लकड़ियाँ काटकर बेचती थी। एक दिन राजन ने उसका रास्ता रोका, “मुझसे शादी कर लो, रानी बनाकर रखूँगा।” प्रिया ने गुस्से से कहा, “तू निकम्मा और आवारा है। मुझे तुझमें कोई दिलचस्पी नहीं।”
अगले दिन रामदास टहलते-टहलते तालाब के पास पहुँच गए। काला हंस प्रकट हुआ और सवाल पूछा। रामदास जवाब न दे सके और गायब हो गए। एक गाँव वाले ने यह देख लिया और प्रिया को बताया।
प्रिया फूट-फूटकर रोई। राजन फिर आया, “अब तू अकेली है, मुझसे शादी कर ले।” प्रिया ने उसे भगा दिया। उसने फैसला किया, “मैं पिताजी को ज़रूर वापस लाऊँगी।”
प्रिया राजा सुरेंद्र के दरबार गई। “महाराज, काला हंस ने मेरे पिता सहित कई लोगों को गायब कर दिया। कृपया मदद करें।” राजा ने गुस्से से कहा, “हम इस मामले में कुछ नहीं कर सकते। निकल जाओ यहाँ से।”
निराश होकर प्रिया ने सोचा, “कोई मदद नहीं करेगा तो मैं खुद जाऊँगी।” वह तालाब के पास पहुँची और चिल्लाई, “काले हंस, सामने आ!”
रंगीन रोशनी के साथ हंस प्रकट हुआ। “तुम बहादुर हो। मेरा सवाल सुनो – सच क्या है, जिसे देखना आसान हो या मुश्किल हो?” प्रिया ने सोचकर कहा, “सच वो है जिसे देखना मुश्किल हो, क्योंकि असली सच दिल की गहराई में छुपा होता है।”
हंस खुश हो गया। “तुमने सही जवाब दिया! तुम मुझे श्राप से मुक्त कर सकती हो। मेरे पीछे आओ।” वह तालाब में कूद गया। प्रिया भी कूद गई और एक जादुई महल में पहुँची। वहाँ पिंजरे में सभी गायब लोग कैद थे।
हंस बोला, “तुम्हें एक जादुई तलवार लानी होगी जो जंगल की गुफा में है। उससे मेरी हत्या करो तभी मैं मुक्त होऊँगा।”
प्रिया गुफा पहुँची। तलवार ने पूछा, “शक्ति किसे मिलनी चाहिए – जिसे लालसा हो या जरूरत हो?” प्रिया बोली, “जिसे लालसा नहीं बल्कि जरूरत हो।” तलवार ने कहा, “सही जवाब! पर पहले लाल वृक्ष से अनुमति लो।”
लाल वृक्ष ने एक पत्ता गिराया। “इसे छुओ। अगर तुम्हारा मन शुद्ध है तो कुछ नहीं होगा।” प्रिया ने पत्ता छुआ और कुछ नहीं हुआ। वृक्ष बोला, “तुम्हारा विवाह एक राजकुमार से होगा। तलवार केवल तुम और तुम्हारा पति छू सकते हो।”
प्रिया तलवार लेकर महल लौटी और हंस पर वार किया। हंस की मृत्यु हुई और वह एक सुंदर राजकुमार आदित्य में बदल गया। उसने बताया, “मेरे मंत्री सुरेंद्र ने मुझे धोखे से श्रापित करवाया और राज्य छीन लिया। मैंने लालच में तलवार छू ली थी और गलत जवाब दिया था।”
राजकुमार ने प्रिया की माँग भरी, “अब तुम मेरी पत्नी हो।” उसने तलवार ली और सबको आज़ाद किया। सब तालाब से बाहर आए।
राजकुमार और प्रिया राजदरबार पहुँचे। जैसे ही तलवार राजा सुरेंद्र के पास गई, बिजली निकली और वह जलकर राख हो गया। आदित्य ने राज्य वापस ले लिया।
कुछ दिन बाद राजकुमार प्रिया के साथ दुर्गापुर आया। राजन को बुलवाया गया। प्रिया बोली, “तुमने कहा था कोई मुझसे शादी नहीं करेगा, लेकिन आज मैं राजकुमारी हूँ। आइंदा किसी को तंग किया तो सज़ा मिलेगी।” राजन काँपता हुआ भाग गया।
प्रिया अपने पिता को लेकर महल गई। राजकुमार और राजकुमारी ने राज्य में शांति और न्याय फैलाया। सब खुशहाल हो गए। साहस, सच्चाई और शुद्ध मन से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है। शक्ति उसी को मिलनी चाहिए जिसे लालच नहीं बल्कि जरूरत हो।

