एक समय की बात है, एक घने जंगल के पास एक गाँव था। उस गाँव में एक पुराना कुआँ था जो अब उपयोग में नहीं आता था। एक दिन, राजू नाम की एक चालाक लोमड़ी शिकार की तलाश में इधर-उधर घूम रही थी। वह इतना व्यस्त था कि उसने कुएँ को नहीं देखा और सीधे उसमें गिर गया।
राजू ने बाहर निकलने की बहुत कोशिश की। उसने कुएँ की दीवारों पर चढ़ने का प्रयास किया, लेकिन दीवारें बहुत फिसलन भरी थीं। उसके पंजे फिसल जाते और वह नीचे गिर जाता। घंटों बीत गए, लेकिन राजू बाहर नहीं निकल सका। वह थक गया और सोचने लगा कि अब क्या करे। उसकी चालाक दिमाग काम करने लगा और वह किसी के आने का इंतजार करने लगा।
दोपहर का समय था और धूप तेज हो रही थी। तभी मीना नाम की एक प्यासी बकरी उधर से गुजर रही थी। वह बहुत देर से पानी की तलाश में भटक रही थी। जब वह उस कुएँ के पास पहुँची, तो उसने अंदर झाँका। वहाँ उसने राजू लोमड़ी को देखा जो पानी में खड़ा था।
मीना ने आश्चर्य से पूछा, “अरे राजू भाई, तुम वहाँ नीचे क्या कर रहे हो? क्या तुम कुएँ में गिर गए हो?”
चालाक राजू को अपनी योजना सूझ गई। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं-नहीं मीना बहन, मैं गिरा नहीं हूँ। दरअसल, इस कुएँ का पानी बहुत ही मीठा और ठंडा है। मैंने इतना स्वादिष्ट पानी पहले कभी नहीं पिया। इस गर्मी में यहाँ का पानी स्वर्ग के अमृत जैसा लग रहा है। तुम भी कूद जाओ और इस अद्भुत पानी का स्वाद चखो।”
मीना बकरी बहुत प्यासी थी और उसे राजू की बातें बहुत लुभावनी लगीं। उसने बिना सोचे-समझे कुएँ में छलांग लगा दी। वह तेजी से नीचे गिरी और पानी में गिरकर भीग गई। उसने जल्दी-जल्दी पानी पिया और अपनी प्यास बुझाई।
जब मीना की प्यास बुझ गई, तो उसने बाहर निकलने की कोशिश की। लेकिन वह भी राजू की तरह बाहर नहीं निकल पाई। कुएँ की दीवारें बहुत ऊँची और फिसलन भरी थीं। मीना घबरा गई और रोते हुए बोली, “हाय! मैं यहाँ से कैसे निकलूँगी? मुझे तो राजू भाई ने बहका दिया।”
राजू लोमड़ी ने शांति से कहा, “घबराओ मत मीना बहन, मेरे पास एक शानदार योजना है। तुम अपने पिछले पैरों पर खड़ी हो जाओ और अपनी गर्दन सीधी कर लो। फिर मैं तुम्हारी पीठ पर चढ़कर बाहर कूद जाऊँगा। जैसे ही मैं बाहर पहुँचूँगा, मैं तुम्हें बाहर निकालने के लिए रस्सी या मदद लेकर आऊँगा।”
भोली मीना को राजू की बात सही लगी। उसने वैसा ही किया जैसा राजू ने कहा था। राजू चतुराई से मीना की पीठ पर चढ़ा, फिर उसके सिर पर पैर रखा और एक जोरदार छलांग लगाकर कुएँ से बाहर निकल गया।
जैसे ही राजू बाहर पहुँचा, वह वहाँ से चलने लगा। मीना ने चिल्लाकर कहा, “राजू भाई, रुको! तुमने कहा था कि तुम मुझे भी बाहर निकालोगे।”
राजू ने पीछे मुड़कर हँसते हुए कहा, “मीना बहन, अगर तुम्हारी दाढ़ी में थोड़ी अक्ल होती, तो तुम कूदने से पहले सोचतीं। कूदना आसान है, लेकिन बाहर निकलने का रास्ता सोचना जरूरी है। अलविदा!” यह कहकर राजू वहाँ से चला गया, और बेचारी मीना कुएँ में फंसी रह गई।
कोई भी काम करने से पहले उसके परिणामों के बारे में अच्छी तरह सोच लेना चाहिए। जल्दबाजी में लिए गए फैसले अक्सर मुसीबत का कारण बनते हैं।

