मुरादाबाद शहर में मीरा नामक महिला लोगों के घरों में काम करके गुजारा करती थी। उसकी पांच साल की बेटी पारुल थी, जो स्कूल जाने की जिद करती रहती। मजबूरन मीरा ने पारुल का दाखिला सरकारी स्कूल में करवा दिया।
“कभी किसी अजनबी से बात मत करना,” मीरा ने पारुल को समझाया। लेकिन एक दिन स्कूल के बाहर एक काले कोट वाला अजनबी आदमी पारुल के पास आया। उसने देखा कि पारुल पुराने थैले में किताबें लाती है।
“तुम्हें नया बैग चाहिए?” अजनबी ने मीठी आवाज में पूछा। पारुल झिझकी, लेकिन नए बैग का लालच उसे दुकान तक ले गया। अजनबी ने उसे रंगीन बैग दिला दिया।
घर पहुंचकर जब मीरा ने बैग देखा, वह गुस्से से भर गई। “मैंने मना किया था!” उसने पारुल को डांटा। अगले दिन वही अजनबी फिर आया और पारुल को आइसक्रीम खिलाई। धीरे-धीरे पारुल उससे घुलने-मिलने लगी।
एक दिन पारुल स्कूल से घर नहीं लौटी। मीरा बेचैन हो गई। शाम को पारुल खिलखिलाती हुई आई, “मम्मी, मैं अम्यूजमेंट पार्क गई थी!” मीरा ने गुस्से में उसे थप्पड़ मार दिया।
उसकी सहेली कमला ने सलाह दी, “उस आदमी का पीछा कर। देख कौन है वो।” मीरा रोज स्कूल के बाहर छिपकर बैठी, पर अजनबी नहीं आया। फिर कमला ने पीछा किया और देखा कि अजनबी पारुल को एक बड़े बंगले में ले गया।
कमला ने मीरा को बुलाया और पुलिस को भी खबर की। जब मीरा उस बंगले के सामने पहुंची, तो उसके पैर थम गए। वह घर उसे पहचाना लगा।
अजनबी बाहर आया और बोला, “यह औरत मेरे घर में काम करती थी।” उसका नाम विक्रम था। उसने सबको असली सच्चाई बताई।
चार साल पहले विक्रम और उसकी पत्नी नीता खुशहाल जीवन जी रहे थे। दोनों को बच्चे का इंतजार था। उसी समय मीरा ने भी बताया कि वह गर्भवती है। एक दिन मीरा सीढ़ियों से गिर गई और अस्पताल में भर्ती हुई। डॉक्टर ने कहा कि उसका गर्भपात हो गया।
मीरा ने विक्रम और नीता को दोषी ठहराया, “तुम लोगों की वजह से मेरा बच्चा मरा!” लेकिन विक्रम ने उसे काम से मना किया था।
कुछ महीनों बाद नीता की बेटी पैदा हुई। मीरा बधाई देने आई और मौका पाकर बच्ची को उठा ले गई। विक्रम और नीता ने पूरा शहर छान मारा, लेकिन मीरा का कोई पता नहीं चला।
चार साल बाद कमला ने विक्रम को सच बताया। पुलिस आई और मीरा को पकड़ लिया। तभी वही डॉक्टर सामने आया जिसने मीरा का इलाज किया था।
“मीरा कभी गर्भवती थी ही नहीं। उसने मुझे पैसे देकर झूठी रिपोर्ट बनवाई थी,” डॉक्टर ने खुलासा किया।
विक्रम चीखा, “तूने मेरी बेटी को क्यों रखा?”
मीरा ने रोते हुए कहा, “मैं एक दिन आकर दावा करती कि यह बच्ची तुम्हारी गलती का नतीजा है। फिर DNA टेस्ट होता और तुम्हारी संपत्ति में हिस्सा लेती।”
पुलिस ने मीरा को गिरफ्तार कर लिया। पारुल रोती रही, “मम्मी!” लेकिन नीता ने उसे गले लगाया, “मैं हूं तुम्हारी असली मम्मी।”
चार साल बाद एक टूटा हुआ रिश्ता फिर से जुड़ गया। पारुल को उसके सच्चे माता-पिता मिल गए, लेकिन स्वार्थ की कीमत मीरा को जेल के रूप में चुकानी पड़ी।
स्वार्थ और बदले की भावना इंसान को बर्बाद कर देती है। सच्चाई और ईमानदारी ही जीवन का असली मार्ग है।
