सुंदरपुर गाँव में आशा नाम की एक महिला अपने पति विश्वनाथ और दो बेटों राजू और सुहास के साथ रहती थी। दोनों बच्चे पढ़ाई में बहुत तेज़ थे। यह देखकर आशा हमेशा अपने पति से कहती, “हमारे बच्चे बहुत होनहार हैं। हम इन्हें अच्छी शिक्षा देकर इनके पैरों पर खड़ा करेंगे।”
“हाँ आशा, मैं भी यही चाहता हूँ। हम अपने बच्चों के लिए कड़ी मेहनत करेंगे,” विश्वनाथ ने जवाब दिया।
“बिल्कुल, अगर हम अभी थोड़ी अधिक मेहनत करें तो बच्चों की पढ़ाई में बाद में कोई समस्या नहीं होगी,” आशा ने कहा।
आशा और विश्वनाथ दोनों मजदूरी करके दिन भर कड़ी मेहनत से पैसे कमाते थे। एक दिन सुहास ने पूछा, “माँ, तुम्हारे पैर में क्या हुआ है?”
“बेटा, काम करते समय फिसलकर गिर गई थी, इसलिए थोड़ा सूज गया है,” आशा ने जवाब दिया।
“आओ माँ, मैं तुम्हारे पैर की मालिश कर देता हूँ,” सुहास ने प्यार से कहा।
“नहीं बेटा, तुम अपना काम करो,” आशा ने मना किया।
लेकिन सुहास ने तेल लगाकर माँ के पैर की मालिश की। अगले दिन आशा और विश्वनाथ हमेशा की तरह काम पर गए। दोपहर की तेज़ धूप में विश्वनाथ सीमेंट का बोरा लेकर पाँचवीं मंजिल पर जा रहा था जब अचानक उसे चक्कर आया और वह गिर गया। उसके सिर से खून निकलने लगा।
लोगों ने उसकी मदद की और आशा भी दौड़कर आई। विश्वनाथ को सरकारी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने कहा कि विश्वनाथ की मृत्यु हो गई है। यह सुनकर आशा बेहोश हो गई। उसकी पड़ोसी सुषमा ने उसे सँभाला और घर ले गई।
विश्वनाथ की मृत्यु के दस दिन बाद आशा ने सुषमा से कहा, “अब मैं क्या करूँ? बच्चों की देखभाल कैसे करूँ?”
“तुम्हें अपने बच्चों का सहारा बनना होगा। तुम्हें उनके लिए कमाना होगा,” सुषमा ने समझाया।
“हाँ सुषमा, तुम सही कह रही हो। मुझे अपने बच्चों के लिए मजबूत बनना होगा,” आशा ने आँसू पोंछते हुए कहा।
अगले दिन से आशा दिन-रात काम करने लगी। दिन में मजदूरी और रात में सिलाई-कढ़ाई करके अतिरिक्त पैसे कमाती थी। एक दिन राजू ने पूछा, “माँ, तुम इतना काम क्यों करती हो? तुम बहुत थक जाती हो।”
“बेटा, जब तुम दोनों बड़े हो जाओगे तो मैं यह सब काम छोड़कर आराम से रहूँगी,” आशा ने जवाब दिया।
“हाँ माँ, हम कड़ी मेहनत करेंगे। तुम्हें पापा का सपना पूरा करना है,” राजू ने कहा।
“हाँ माँ, मैं इंजीनियर बनूँगा और इसके लिए बहुत मेहनत करूँगा,” राजू ने वादा किया।
आशा की कड़ी मेहनत रंग लाई। दोनों बेटे अपनी परीक्षाओं में अव्वल आए। राजू ने 12वीं कक्षा में जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया और सुहास ने 10वीं पास की।
“मेरे बच्चों, तुम दोनों ने बहुत मेहनत की है। इसीलिए अच्छे नंबर आए हैं,” आशा की आँखों में खुशी के आँसू थे।
राजू को इंजीनियरिंग में निःशुल्क प्रवेश और छात्रवृत्ति मिल गई। वह शहर चला गया। विश्वनाथ का मित्र शंकर अक्सर शहर जाता था। आशा उससे राजू के लिए पैसे भेजती थी।
लेकिन शंकर लालची था और पैसों में से कुछ हिस्सा रख लेता था। दिवाली की छुट्टियों में राजू को सच्चाई पता चली। उसने माँ से पूछा तो पता चला कि शंकर ने धोखा दिया था।
राजू और आशा ने शंकर से पैसे वापस माँगे, लेकिन वह इनकार कर गया। कुछ समय बाद राजू एक सफल इंजीनियर बना और सुहास पुलिस इंस्पेक्टर।
“तुम दोनों ने मेरा और तुम्हारे पिता का सपना पूरा किया है। मुझे तुम पर बहुत गर्व है,” आशा ने कहा।
सुहास ने शंकर को जेल भिजवा दिया क्योंकि वह गाँव के कई लोगों को धोखा देता था। डरकर शंकर ने सबका पैसा वापस कर दिया।
अब आशा अपने बेटों के साथ खुशी से रहती है। एक गरीब मजदूर माँ भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और जीवन दे सकती है।
माँ का प्यार और त्याग अपने बच्चों को सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है। कड़ी मेहनत और ईमानदारी से हर सपना पूरा हो सकता है।

