बहुत समय पहले एक घने जंगल में एक खरगोश रहता था। यह खरगोश बहुत ही अजीब स्वभाव का था। उसकी एक बुरी आदत थी – वह हमेशा दूसरे जानवरों की नकल करने की कोशिश करता रहता था। कभी वह बंदर की तरह पेड़ों पर चढ़ने की कोशिश करता, कभी हाथी की तरह अपनी आवाज़ को मोटा करके चिल्लाता, और कभी शेर की तरह दहाड़ने का प्रयास करता।
जंगल के सभी जानवर उसकी इस मूर्खतापूर्ण आदत से परेशान थे। वे उसे समझाने की कोशिश करते थे कि हर जानवर की अपनी खूबियां होती हैं और उन्हें अपने प्राकृतिक गुणों पर गर्व करना चाहिए। लेकिन खरगोश किसी की बात नहीं सुनता था।
एक दिन सुबह के समय खरगोश अपने बिल से बाहर निकला। मौसम बहुत सुहावना था। हल्की-हल्की हवा चल रही थी और सूरज की किरणें पेड़ों के पत्तों के बीच से छनकर आ रही थीं। खरगोश इधर-उधर घूमता हुआ एक बड़े पेड़ के नीचे पहुंचा।
वहां उसने देखा कि एक काला कौवा पेड़ की एक मजबूत डाली पर बैठा हुआ था। कौवा बिल्कुल शांत था और कुछ भी नहीं कर रहा था। वह न तो कांव-कांव कर रहा था, न ही इधर-उधर उड़ रहा था। बस चुपचाप बैठा हुआ था, जैसे ध्यान लगा रहा हो।
खरगोश ने सोचा, “अरे वाह! यह तो बहुत आसान काम लग रहा है। कौवा तो बस बैठा हुआ है और कुछ भी नहीं कर रहा। मैं भी यही करूंगा।” उसे लगा कि यह सबसे आसान काम है जिसकी वह नकल कर सकता है।
बिना किसी और सोच-विचार के खरगोश ने जमीन पर बैठने का फैसला किया। वह पेड़ के नीचे जमीन पर बैठ गया और कौवे की तरह बिल्कुल शांत हो गया। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं और सोचा कि वह भी कौवे की तरह आराम से बैठेगा और कुछ नहीं करेगा।
समय बीतता गया। खरगोश वहीं जमीन पर बैठा रहा। उसे लग रहा था कि वह बहुत चतुर है क्योंकि उसने कौवे की नकल करने का इतना आसान तरीका खोज लिया है। वह मन ही मन खुश हो रहा था।
लेकिन उसे पता नहीं था कि जंगल में एक चालाक लोमड़ी घूम रही थी। यह लोमड़ी कई दिनों से भूखी थी और खाने की तलाश में इधर-उधर भटक रही थी। अचानक उसकी नजर जमीन पर बैठे हुए खरगोश पर पड़ी।
लोमड़ी के मुंह में पानी आ गया। उसने सोचा, “अरे यह तो मेरा नाश्ता है! यह मूर्ख खरगोश यहां बैठकर क्या कर रहा है? इससे अच्छा मौका मुझे कभी नहीं मिलेगा।”
लोमड़ी धीरे-धीरे खरगोश के पास आई। खरगोश अभी भी आंखें बंद करके बैठा हुआ था। जब लोमड़ी बिल्कुल पास आ गई, तब खरगोश की आंख खुली। लेकिन अब तक बहुत देर हो चुकी थी। लोमड़ी ने झपट्टा मारा और बेचारे खरगोश को पकड़ लिया।
खरगोश को अब समझ आई कि उसने कितनी बड़ी गलती की है। कौवा पेड़ पर सुरक्षित बैठा था, लेकिन वह जमीन पर खतरे में था। बिना सोचे-समझे दूसरों की नकल करना खतरनाक हो सकता है। हर काम के लिए उचित परिस्थिति और योग्यता की जरूरत होती है।

