खेतगढ़ गाँव में तीन महीने से आसमान रूठा हुआ था। पीले धूल भरे बादल मंडराते, पर बरसते नहीं। जमीन फट चुकी थी — दरारें इतनी गहरी कि घास भी उगने से डरती थी। खेतों में खड़ी फसलें धूप में झुलसकर राख हो चुकी थीं। कुएँ सूख गए थे। पशु पानी के लिए तड़पते थे। बच्चे प्यास से रोते और माँएँ आँसू पीकर चुप रहतीं।
रातें और भी डरावनी थीं। हवा नीम के पत्तों में उलझकर किसी सिसकती हुई आत्मा जैसी आवाज़ निकालती। दूर कहीं कुत्ता भौंकता तो पूरा गाँव सहम जाता। छत पर सोए लोग करवटें बदलते रहते — नींद आती ही नहीं थी। आसमान जैसे पत्थर बन गया था।
धीरे-धीरे लोगों के दिलों में अंधविश्वास ने जड़ें जमा लीं। किसी ने कहा — देवी रुष्ट हो गई हैं। किसी ने कहा — गाँव पर किसी का श्राप है। किसी बुजुर्ग ने बताया कि पिछली बार जब ऐसा हुआ था, तब गाँव में कोई पाप हुआ था। हर शाम चौपाल पर वही बातें दोहराई जातीं। लोग एक-दूसरे की आँखों में डर ढूँढते और डर पाते भी थे।
उसी गाँव के सिरे पर, जहाँ कच्ची पगडंडी खत्म होकर जंगल की झाड़ियों में समा जाती थी, रहती थी कमला वैद्य। झुर्रियों भरा चेहरा, सफेद बालों का जूड़ा, आँखों में एक ऐसा गहरा सन्नाटा — जैसे जीवन का हर रंग देख चुकी हो, हर दर्द जी चुकी हो। उसकी झोपड़ी के बाहर जड़ी-बूटियाँ सूखती रहतीं। भीतर हमेशा एक दीया जलता।
कभी लोग उसे आदर से बुलाते थे। बुखार में उसकी जड़ी-बूटियाँ काम आतीं। साँप काटे में उसका लेप जान बचाता। प्रसव में वही माँ और बच्चे की जान बचाती। उसके हाथों से जो बच्चे इस दुनिया में आए थे, उनकी गिनती करना मुश्किल था। लोग कहते थे — कमला के हाथों में देवी का आशीर्वाद है।
उस रात तीसरा पहर था।
झोपड़ी के बाहर हवा नीम में फँसकर कराह रही थी। अंदर दीया काँप रहा था। सुमन की चीखें मिट्टी की दीवारों से टकराकर गूँज रही थीं। उसका प्रसव बहुत कठिन था। बच्चा उल्टा था। कमला घंटों से लड़ रही थी — अपने अनुभव से, अपनी दवाओं से, अपनी प्रार्थनाओं से।
“थोड़ा और दम रख, बेटी। देवी तेरे साथ हैं।”
बाहर खड़े लोग दीवारों के आरपार बस आवाज़ें सुन पा रहे थे। मुखिया रघुनाथ अपनी बहू के दर्द को सुनकर बेचैन था। उसके साथ गाँव के दस-बारह लोग खड़े थे — मशालें हाथ में, चेहरों पर चिंता।
फिर एक पल — सब कुछ शांत। एक पल की खामोशी। फिर एक नवजात की रोने की आवाज़ गूँजी — कच्ची, पतली, ज़िंदगी से भरी। दरवाज़ा खुला। कमला बाहर आई, गोद में बच्चा था, चेहरे पर थकान थी लेकिन आँखों में एक कोमल सुकून।
लेकिन उसी पल किसी ने झोपड़ी के भीतर झाँका।
सुमन निष्प्राण पड़ी थी। होठ नीले पड़ चुके थे। आँखें आधी खुली। बिस्तर पर खून सूख चुका था। उसके चेहरे पर न दर्द था, न राहत — बस एक अटकी हुई शांति।
“सुमन मर गई! भगवान, सुमन मर गई!”
भीड़ में चीख उठी। फिर दूसरी आवाज़ें —
“देवी नाराज़ हो गई हैं! कमला ने ही कुछ किया है!”
“चुड़ैल है ये! इसने मंत्र पढ़े थे!”
रघुनाथ आगे बढ़ा, चेहरा गुस्से और दर्द से तमतमाया हुआ।
“तू ही थी वहाँ! हमने तुझ पर भरोसा किया था और तूने मेरी बहू को मार डाला!”
“मुखिया जी, मैंने कुछ नहीं किया।” कमला की आवाज़ थरथराई नहीं। “सुमन की साँसें पहले से कमज़ोर थीं। उसका शरीर थक चुका था। मैंने तो बस देवी का नाम लेकर उसका दर्द कम करने की कोशिश की।”
“झूठ! हमने देखा — तूने मंत्र पढ़े।”
“वो मंत्र नहीं, प्रार्थना थी। हर जन्म कठिन होता है। मैंने इस गाँव को हमेशा जिंदगी दी है, मौत नहीं।”
“तो फिर वो मरी क्यों? देवी नाराज़ क्यों हैं?”
“देवी नाराज़ नहीं हैं — तुम अंधे हो गए हो। जिस देवी के नाम से जन्म पवित्र होता है, उसी के नाम पर तुम यह अत्याचार कर रहे हो।”
“बोलना बंद कर! तेरी दवाओं ने मेरे वंश की जोत बुझाई। तू चुड़ैल है!”
“अगर मेरी दवा ज़हर होती, तो तुम्हारे घर के बाकी बच्चे कैसे ज़िंदा हैं? मैंने इस गाँव की दर्जनों औरतों को मौत के मुँह से वापस खींचा है।”
भीड़ में किसी ने चिल्लाया —
“इसे जला दो! देवी का कोप तभी शांत होगा!”
कमला ने नवजात बच्चे को धीरे से ज़मीन पर रखा। माथा चूमा। भीड़ की ओर एक आखिरी बार देखा — और उन आँखों में न डर था, न गिड़गिड़ाहट। सिर्फ एक गहरी, ठंडी बात थी।
“मैंने जन्म दिया है, मौत नहीं। पर अब तुम्हें खुद समझना होगा — कौन सच में ज़िंदा है और कौन मरा हुआ।”
किसी ने नहीं सुना।
उसकी झोपड़ी में आग लगा दी गई। सालों की जड़ी-बूटियाँ, दवाइयाँ, नुस्खे — सब कुछ राख हो गया। औषधियों की खुशबू धुएँ में घुल गई। कमला धीरे-धीरे अंधेरे में चली गई — उसी रास्ते से, जहाँ जंगल शुरू होता था। जहाँ पुराना काली का मंदिर था — सिर्फ धूल, टूटी दीवारें और मकड़ी के जाले।
हवा ठंडी थी। नीम के पत्ते सिसक रहे थे — जैसे वो कमला का दर्द सुन रहे हों।
उसने मंदिर की ज़मीन में गड्ढा खोदा। उँगलियाँ मिट्टी में धँसती रहीं, नाखून टूटते रहे, खून निकलता रहा। और हर खुरचन के साथ उसका दर्द गहरा होता गया। गाँव वालों के ताने, मुखिया का वो गुस्सा भरा चेहरा, “चुड़ैल” का वो जलाने वाला शब्द — सब कुछ उसके कानों में गूँज रहा था।
“मुखिया… तूने मेरा सच जलाया।” उसकी आवाज़ काँप रही थी। “गाँव वालों, तुमने मेरी इज़्ज़त मिट्टी में मिलाई। मैंने जन्म दिए, जानें बचाईं, और तुमने मुझे चुड़ैल कहा। अब देखो — यही मिट्टी तुम्हारा सच निगल लेगी।”
उसने एक छोटा मिट्टी का पुतला बनाया — रघुनाथ की शक्ल जैसा। उसके सिर पर थोड़े बाल चिपकाए जो उसके पास थे। पुतले को उसकी पार्वती के दुपट्टे के एक टुकड़े में लपेटा।
उसकी छाती पर कोयले से लिखा —
“तेरा सुख, मेरी प्यास।”
काला धागा गले में कसकर बाँधा। बीच में एक लाल मोती टाँका — खून के रंग का। और फिर मुट्ठी-मुट्ठी मिट्टी डाली। हर मुट्ठी के साथ वो फुसफुसाती रही —
“जो मेरे साथ किया, वो तुम्हें लौटेगा। ये मिट्टी तुम्हारी साँस चुराएगी। तुम्हारे खेत सड़ेंगे। तुम्हारा घर राख होगा। देवी मेरी साक्षी हैं। और तुम्हारा अंत — मेरा बदला।”
उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। बस एक ठंडी, डरावनी चमक।
उस रात हवा पहले से ज़्यादा तेज़ थी। नीम के पत्ते पहले कभी इतनी ज़ोर से नहीं हिले थे।
अगली सुबह से रघुनाथ मुखिया के घर में हवा ही बदल गई। एक अजीब बदबू फैली रहती — जैसे कोई मरा जानवर भीतर हो। उसके खेत सड़ने लगे। पत्तियाँ काली पड़ गईं। मक्खियाँ भिनभिनाने लगीं। गाय-भैंस की हालत देखते-देखते बिगड़ गई — शरीर पर कीड़े।
और पार्वती — मुखिया की पत्नी — धीरे-धीरे बुझने लगी। पहले हल्की थकान, फिर बाल झड़ने लगे। तकिए पर काले धागों का ढेर हर सुबह। उसके हाथों पर गोल-गोल नीले-हरे निशान उभरे — जैसे किसी ने छोटे सिक्के त्वचा में ठोक दिए हों। जो उन्हें छूता, उसके हाथ ठंडे पड़ जाते — मुर्दा धातु-सा ठंडापन।
रातें भयानक हो गईं। हर तीन-चार घंटे पर पार्वती चीखकर उठती। उसकी आवाज़ में इंसानी पड़त टूट जाती — कुछ और ही निकलता। फिर आँखें खाली हो जातीं, जैसे कोई भीतर से बाहर झाँक रहा हो।
मुखिया ने पंडित दीनदयाल को बुलाया।
पंडित ने माला घुमाई, आँखें बंद कीं, और धीरे से खोलीं।
“मुखिया जी… किसी ने काला जादू किया है। एक पुतला दफन है — पुराने काली मंदिर के नीचे। पूर्णिमा से पहले नहीं निकाला, तो मौत निश्चित है। सिर्फ पार्वती की नहीं — तुम्हारी, तुम्हारे बच्चों की, पूरे घर की।”
रात का तीसरा पहर। अधूरा चाँद टँगा था — जैसे वो भी डर से काँप रहा हो। चार लोग जंगल की पगडंडी पर चल रहे थे — रघुनाथ, पंडित दीनदयाल, और दो मशालें थामे गाँव वाले भोला और मंगल। मशालों की लौ हवा में काँपती रही।
पुराना काली मंदिर सामने था। टूटी दीवारें, मकड़ी के जाले, सदियों की उदासी।
“यहीं है। खोदो। जल्दी।”
भोला और मंगल के हाथ काँप रहे थे। हर कुदाल के साथ एक सड़ी-सी गंध उठती। हवा और तेज़ हो गई। नीम के पत्ते सरसराने लगे। तभी कुदाल किसी सख्त चीज़ से टकराई — एक ठनक गूँजी। सबके दिल धक् से रह गए।
मशाल पास की — मिट्टी के बीच एक कपड़े में लिपटा पुतला।
पुतले के सिर पर पार्वती के बाल। शरीर पर उसका पुराना दुपट्टा। गले में काला धागा, बीच में लाल मोती — खून के रंग का। और छाती पर कोयले से लिखा —
“तेरा सुख, मेरी प्यास।”
“इसे जला दो — अभी!”
जैसे ही मशाल की लौ पुतले को छूने वाली थी — हवा अचानक रुक गई। सब कुछ थम गया। मंदिर के भीतर की अँधेरी गहराई से एक आवाज़ गूँजी —
“तुम्हारा अंत… मेरा बदला।”
मशाल बुझ गई। घुप्प अँधेरा छा गया। पंडित की माला ज़मीन पर गिर पड़ी। भोला और मंगल भाग चुके थे। रघुनाथ ने पुतले को ज़मीन पर पटका — काला धागा फट गया। लाल मोती लुढ़कता हुआ मंदिर की सीढ़ियों में गुम हो गया।
अगली सुबह।
पार्वती की लाश पलंग पर पड़ी थी। आँखें खुली, होठ नीले, हाथों पर निशान और गहरे। पलंग पर वही पुतला — लेकिन गला गायब था। जहाँ गला होना चाहिए था — एक गहरा काला दाग, जैसे जलाकर राख किया गया हो।
रघुनाथ कोने में बैठा था। पत्थर-सा चेहरा, खाली आँखें। हाथों में पुतले की मिट्टी चिपकी थी। वो बड़बड़ा रहा था —
“मैंने… सिर्फ अपने घर को बचाना चाहा था। कमला… तूने मेरे साथ यह क्या किया?”
उस दिन के बाद से खेतगढ़ में कोई रात को जंगल की पगडंडी पर नहीं जाता। कोई उस टूटे हुए काली मंदिर के पास नहीं फटकता। जब भी रात को हवा तेज़ चलती है, बच्चे घरों के भीतर सिमट जाते हैं।
बुजुर्ग कहते हैं — जंगल में आज भी एक आत्मा घूमती है। सफेद बालों का जूड़ा, फीकी तेज रंग की साड़ी, और आँखों में वो गहरा सन्नाटा।
वो कमला है। अपना अधूरा बदला पूरा करने की तलाश में।
और मिट्टी… अभी भी साँस लेती है।

