विवेक झा की आँखें भारी हो रही थीं। स्क्रीन पर डेटा एंट्री करते-करते रात के पौने दो बज गए थे। पूरे फ्लोर पर सिर्फ दो इंसान थे — विवेक और उसका कलीग राजेश। मुंबई की चमचमाती वर्दान टेक पार्क बिल्डिंग में रात की खामोशी एक अलग ही रंग लेती थी।
वर्दान टेक पार्क — बीस मंज़िलों की शान से खड़ी यह इमारत। शीशे की दीवारें, लग्ज़री कॉफी एरिया, हाई-सिक्योरिटी एक्सेस, और एक लिफ्ट जो सीधा आपके फ्लोर पर पहुँचा देती थी। लेकिन इस बिल्डिंग में एक गहरा राज़ छुपा था — लिफ्ट में 12 के बाद सीधा 14 आता था। फ्लोर 13 का कोई बटन नहीं था। लेकिन वो फ्लोर था ज़रूर। सिर्फ “नाइट्स बैक एंड टीम” के लिए। 12वीं मंज़िल के कोने में एक सर्विस स्टेयरकेस थी — हमेशा बंद दरवाज़े के पीछे छुपी हुई।
विवेक भागलपुर, बिहार का रहने वाला था। मिडिल क्लास परिवार — पिताजी रिटायर्ड स्कूल टीचर, माँ एक सीधी-सादी गृहिणी। दो बहनों की शादी हो चुकी थी और घर की ज़िम्मेदारी अब विवेक के कंधों पर थी। कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा करने के बाद कुछ छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं, फिर वर्दान टेक पार्क में बैक एंड डेटा एग्जीक्यूटिव की नौकरी मिली।
राजेश बरेली, उत्तर प्रदेश का था। विवेक से दो साल सीनियर, तेज़ दिमाग और शांत स्वभाव का। नाइट शिफ्ट के बारे में उसका कहना था — “रात को काम में सुकून मिलता है, कोई शोर नहीं, कोई बखेड़ा नहीं।”
कंपनी ने एक बड़ा क्लाइंट प्रोजेक्ट साइन किया था। नाइट बैक एंड टीम में अचानक लोगों की कमी पड़ गई और एचआर ने विवेक को मेल किया — “रोटेशनल नाइट शिफ्ट, तीन महीने।” विवेक मना नहीं कर सका।
पहले कुछ हफ्ते ठीक-ठाक गुज़रे। लेकिन एक रात चाय पीते हुए राजेश ने धीरे से कहा — “यार, इस फ्लोर के बारे में कुछ अफवाहें हैं। लोग कहते हैं यहाँ रात को अजीब चीज़ें होती हैं।”
विवेक हँस पड़ा। “भाई, ये सब लोगों ने नाइट शिफ्ट से बचने के लिए बना रखा है। कुछ नहीं होता।”
लेकिन उसी रात — रात के ठीक 2 बजकर 15 मिनट पर — प्रिंटर अचानक खुद-ब-खुद चलने लगा।
दोनों चौंक गए। राजेश ने कहा, “किसी ने गलती से फाइल भेज दी होगी।” विवेक प्रिंटर के पास गया और कागज़ उठाया। वो कागज़ बिल्कुल खाली था। एक भी अक्षर नहीं। विवेक के रोंगटे खड़े हो गए।
उसी सिस्टम के बगल में एक सीसीटीवी स्क्रीन हमेशा चलती रहती थी जो सिक्योरिटी रूम से जुड़ी थी। विवेक उस पर ज़्यादा ध्यान नहीं देता था। लेकिन एक रात अचानक उसकी नज़र उस स्क्रीन पर पड़ी — कॉरिडोर में कोई परछाईं चल रही थी। उसने सोचा शायद सिक्योरिटी गार्ड होगा।
फिर एक रात राजेश चिल्लाया — “विवेक! पीछे देख!”
विवेक ने पलटकर देखा — कोई नहीं था। लेकिन सीसीटीवी फुटेज में साफ दिख रहा था कि उसकी कुर्सी के ठीक पीछे कोई खड़ा था। दोनों कुछ देर के लिए एकदम चुप हो गए। विवेक ने हेडफोन लगा लिए — लेकिन गाने सुनते हुए भी दिमाग खामोशी के डर में डूबा था।
फ्लोर के कोने में एक मीटिंग रूम था — नंबर तीन। हमेशा बंद। कभी कोई मीटिंग नहीं हुई वहाँ। एक रात राजेश पेंट्री गया पानी लेने और विवेक अकेला बैठा था। तभी उसके हेडफोन में अचानक आवाज़ें आने लगीं — जैसे कई लोग एक साथ बात कर रहे हों। लेकिन प्लेलिस्ट में कोई ट्रैक नहीं चल रहा था। विवेक घबराकर उठा और आवाज़ बंद हो गई।
उसकी नज़र मीटिंग रूम नंबर तीन के दरवाज़े के नीचे गई — एक हल्की पीली रोशनी थी। जैसे अंदर कोई टॉर्च जला रहा हो। और फिर अचानक वो रोशनी बुझ गई।
विवेक ने एक रात सिक्योरिटी गार्ड से पूछा — “यह मीटिंग रूम हमेशा बंद क्यों रहता है?”
गार्ड पहले टाल-मटोल करता रहा। फिर धीरे से बोला — “साहब, पुराने लोग कहते हैं… इस कमरे में कुछ ठीक नहीं है। पहले मीटिंग होती थीं यहाँ। फिर एक बार कुछ अजीब हुआ। तब से बंद है।”
कुछ दिन बाद राजेश आखिरी वॉशरूम में हाथ धोने गया। जैसे ही अंदर घुसा, ट्यूबलाइट टिमटिमाने लगी। उसने जल्दी-जल्दी हाथ धोए। बटन बंद करते ही पूरे वॉशरूम की लाइट एकदम से गुल हो गई। अँधेरे में नल से टपकते पानी की आवाज़ और किसी के धीमे कदमों की आहट सुनाई दी। राजेश ने मोबाइल की टॉर्च जलाई और भागकर बाहर निकला। दरवाज़ा खुलते ही कॉरिडोर की लाइट जल गई — लेकिन वॉशरूम के अंदर अभी भी घुप्प अँधेरा था।
राजेश सीधे विवेक की डेस्क पर आया। दोनों ने एक-दूसरे को अपने-अपने अनुभव बताए। अब दोनों को यकीन हो चला था — इस फ्लोर पर कुछ था। बहुत कुछ।
धीरे-धीरे ये घटनाएँ बढ़ने लगीं। कभी परछाईं, कभी स्क्रीन पर अजीब टाइपिंग, कभी बिना वजह ठंड का एहसास। विवेक ने गौर किया कि यह सब रात के तीन बजे के आसपास ज़्यादा होता था — और मीटिंग रूम नंबर तीन के पास जाने पर डर और भी गहरा हो जाता था।
एक रात रात के 3 बजकर 10 मिनट पर उस कमरे से आवाज़ें आईं। दोनों पास गए। दरवाज़े के नीचे से रोशनी आ रही थी। विवेक ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। अंदर से दबी-दबी आवाज़ें आ रही थीं — जैसे कोई फुसफुसा रहा हो। उसने राजेश से कहा सिक्योरिटी को बुलाओ — लेकिन फोन नहीं उठा।
दोनों डरे हुए अपनी डेस्क पर लौटे। और वहाँ विवेक के सिस्टम की स्क्रीन पर एक लाइन लिखी थी —
“तुमने दरवाज़ा क्यों नहीं खोला?”
कुछ दिन बाद हाउसकीपिंग स्टाफ से पता चला कि कुछ महीने पहले इसी शिफ्ट में शरद नाम का एक कर्मचारी काम करता था — जो अचानक नौकरी छोड़ गया। ऑफिस के रिकॉर्ड में उसका कोई ज़िक्र नहीं था। विवेक ने मेहनत से उसका नंबर निकाला और फोन किया।
शरद पहले टाल-मटोल करता रहा। लेकिन जब विवेक ने सीसीटीवी और मीटिंग रूम नंबर तीन का ज़िक्र किया, शरद चुप हो गया। फिर धीमे से बोला — “मुझसे मिलो। किसी और को मत बताना।”
अगले दिन शाम को एक छोटी चाय की दुकान पर दोनों मिले। शरद बहुत घबराया हुआ था। हाथ काँप रहे थे, आवाज़ थरथरा रही थी।
शरद ने बताया — उस मीटिंग रूम में कभी एक कर्मचारी की मौत हुई थी। नाइट शिफ्ट के ओवरटाइम के दौरान दिल का दौरा पड़ा था। कंपनी ने यह बात छुपा ली ताकि इमेज खराब न हो। तब से कहते हैं उसकी रूह वहीं है।
“क्या तुमने खुद कुछ देखा?” विवेक ने पूछा।
शरद की आँखें भर आईं — “देखा? वो हर रात मेरी सीसीटीवी स्क्रीन पर बैठा रहता था। और एक रात… मैंने खुद को उस कमरे में बैठे देखा सीसीटीवी में — जबकि मैं अपनी कुर्सी पर था। उसके बाद मैंने शिफ्ट बदलने की रिक्वेस्ट की। किसी ने नहीं सुनी। तो एक रात मैंने वो दरवाज़ा खोल दिया। आज तक नहीं बता सकता अंदर क्या था। बस इतना जानता हूँ — वहाँ कुछ है। जो किसी को भी अपने जैसा बना सकता है।”
इतना कहकर शरद वहाँ से चला गया।
उस रात विवेक ने पूरी बात राजेश को बताई। दोनों ने फैसला किया — सीसीटीवी कैमरा चालू करेंगे और रिकॉर्डिंग सेव करेंगे। पिछली तीन रातों की फुटेज पेन ड्राइव में भर ली।
सुबह होते ही विवेक ने एचआर को मेल किया — “अब ऑफिस नहीं आ सकता। मीटिंग रूम नंबर तीन के बारे में कुछ गंभीर बात है।”
लेकिन मेल भेजते ही स्क्रीन काली हो गई। और एक अजीब फॉन्ट में लिखा आया —
“जो तुमने देखा, वो किसी को नहीं देखना चाहिए था।”
विवेक घर आया, सोने की कोशिश की। उठा तो पेन ड्राइव गायब थी। लैपटॉप खुला था और स्क्रीन पर फिर वही लाइन —
“शिफ्ट 13 नहीं छोड़ सकते।”
उसी रात राजेश का फोन आया — उसके स्क्रीन पर भी वही लाइन थी। और मीटिंग रूम नंबर तीन का दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल गया था।
अगली सुबह एचआर ने देखा — मीटिंग रूम नंबर तीन की सीसीटीवी फुटेज खुद-ब-खुद डिलीट हो चुकी थी। कोई बैकअप नहीं बचा था। और जिस फ्लोर पर वो कर्मचारी मरा था — वहाँ की ज़मीन गीली और दरकी हुई थी। जैसे ज़मीन खुद कुछ छुपा रही हो।
अगले हफ्ते दोनों ने इस्तीफा दे दिया।
विवेक ने नौकरी छोड़ी। शहर छोड़ा।
लेकिन आज भी — रात के ठीक 3 बजकर 10 मिनट पर — उसकी नींद अचानक टूट जाती है।

