आधी रात के सन्नाटे में एक युवक अपना बैग थामे तेज़ कदमों से घर की ओर बढ़ रहा था। उसके चेहरे पर अजीब घबराहट थी — जैसे उसे किसी अनदेखे खतरे का आभास हो रहा हो। जैसे ही वह गाँव के पुराने कुएँ के पास पहुँचा, उसका पूरा बदन पसीने से भीग गया। कुएँ की मंडेर पर अँधेरा इतना घना था कि वहाँ से गुज़रना मौत को दावत देने जैसा लगता था। उसने मन में प्रार्थना की और कदम बढ़ाए, लेकिन तभी उसके कानों में पायल की झनकार गूँजी। वो ठिठक गया। पीछे मुड़ा — और उसके सामने लाल घूंघट ओढ़े एक स्त्री खड़ी थी। उसने अपना हाथ बढ़ाया और एक ही झटके में उसकी गर्दन मरोड़ दी। वो निर्जीव होकर धरती पर गिर पड़ा।
अगली सुबह जब गाँव वाले वहाँ से गुज़रे, तो कोहराम मच गया। यह दो महीनों में पाँचवीं रहस्यमय मौत थी। लोगों ने कहा — यह सती माता का प्रकोप है। कुएँ पर एक छोटा मंदिर बना दिया गया, भोग चढ़ाया जाने लगा, और रात को वहाँ जाने पर अनकही पाबंदी लग गई। लेकिन मौतें नहीं रुकीं।
उन्हीं रातों में से एक रात, काले कपड़ों में चेहरा ढके एक युवती काव्या कुएँ के पास पहुँची। वह एक साहसी और रहस्यमयी महिला थी — पतले नयन-नक्श, लंबे काले बाल, और आँखों में एक गहरी पीड़ा छिपी हुई थी। उसके हाथ में काले कपड़े में बँधी एक पोटली थी। उसने वहाँ आसन लगाया, हल्दी-कुमकुम चढ़ाया, अपनी उँगली काटकर रक्त का चढ़ावा दिया, और तेल का दीपक जलाया।
‘मंजुला, तुम्हारा बदला पूरा हो गया है। अब शांत हो जाओ। बेगुनाहों को मत मारो।’ उसकी आवाज़ दर्द से भरी थी। लेकिन यह प्रार्थना नहीं थी, यह एक स्वीकारोक्ति थी — एक गलती की।
तीन महीने पहले, इसी कुएँ के पास काव्या ने एक भयंकर तांत्रिक अनुष्ठान किया था। यज्ञकुंड में नर-कंकाल की खोपड़ी में भरा पशु-रक्त, बँधा हुआ मुर्गा, और धीमे स्वर में उच्चारे गए मंत्र। उसने अपनी बहन मंजुला की आत्मा को जागृत किया था। मंजुला — जो अपने पति राजीव की मृत्यु के बाद उसके दोनों देवरों विक्रम और सुरेश की वासना का शिकार हो गई थी। उनसे बचने के लिए उसने इसी कुएँ में कूदकर जान दे दी थी।
‘मैं तुम्हारी मौत का बदला लूँगी मंजुला!’ काव्या ने कसम खाई थी। अनुष्ठान सफल हुआ। मंजुला की आत्मा घूंघट में प्रकट हुई — उसका चेहरा गला हुआ, आँखें सफेद और उलटी। उसने पहले विक्रम को मारा, फिर उसके भाई सुरेश को। न्याय हो गया था।
लेकिन फिर आत्मा रुकी नहीं। उसने एक राहगीर को मारा। फिर उनकी माँ राधा को। फिर एक साइकिल सवार को। काव्या घबरा गई। वो बार-बार कुएँ पर आकर मंजुला को शांत करने की कोशिश करती, लेकिन मौतें बढ़ती जाती थीं। मृत्यु के बाद आत्मा किसी की सगी नहीं होती — यह सत्य काव्या को अब समझ आ रहा था।
फिर एक रात — काव्या के घर का दरवाज़ा खटखटाया गया। रात के डेढ़ बजे। उसने दरवाज़ा खोला — और सामने मंजुला की आत्मा खड़ी थी। घूंघट हटा। वही भयानक चेहरा। काव्या की साँसें रुक गईं।
‘मंजुला, रुको! मैं तुम्हारी बहन हूँ! मैंने तुम्हारे लिए यह सब किया था!’ आत्मा ने एक पल के लिए ठहरकर देखा — जैसे कोई भूली हुई याद सतह पर आई हो। लेकिन मृत्यु की दुनिया में रिश्ते बेमानी होते हैं। उसने अपनी बहन की गर्दन भी मरोड़ दी। काव्या की चीख रात के अँधेरे में घुल गई।
जब सुबह लोगों को पता चला, तो पूरे गाँव में दहशत फैल गई। लोगों ने अपने घर छोड़ दिए, गाँव खाली हो गया। कहते हैं — आज भी उस गाँव के कुएँ के पास रात को पायल की आवाज़ आती है। लाल घूंघट में मंजुला की आत्मा वहाँ भटकती है। और जो भी उसके सामने आता है… वो फिर कभी नहीं लौटता।
कहानी का सार यही है — बदला लेने की आग में इंसान अक्सर वो दरवाज़ा खोल देता है जिसे बंद करना फिर उसके बस में नहीं रहता।

