आर्यन को ड्यूटी पर जाने में देर हो गई थी। पिछली रात वह उस लड़की के बारे में सोचता रहा था। उसके चेहरे पर फैला डर, उसकी मुरझाई मुस्कान और कांपती आवाज – सब कुछ उसके दिमाग में घूम रहा था। इस कारण देर रात तक नींद नहीं आई। सुबह जल्दबाजी में मोबाइल भी घर पर रह गया।
जब आर्यन दोबारा घर की तरफ अपनी बाइक लेकर मुड़ा, तो अचानक वही लड़की दिखी। उसके पिता एक्टिवा चला रहे थे और आरती पीछे बैठी थी। चेहरे पर स्कार्फ बंधा था, लेकिन उन आंखों को आर्यन ने पहचान लिया। जैसे ही एक्टिवा आगे बढ़ी, कुछ लड़के बाइक से उनका पीछा कर रहे थे। उनकी बुरी नियत समझने में देर नहीं लगी।
तीन-चार दिन बीत गए। काम के बोझ से घर लौटने में रात हो जाती। दोस्तों से मिलना-जुलना कम हो गया था। उस रात भी आर्यन देर से आया, बहुत थका हुआ था। खिड़की से देखा तो आज दोस्तों में से कोई नहीं आया था। खाना खाकर टीवी देखते हुए बिस्तर पर लेट गया। पता ही नहीं चला कब नींद आ गई।
देर रात कुत्तों के भौंकने की तेज आवाज से आंख खुली। ऐसा लग रहा था जैसे गली के सारे कुत्ते एक साथ किसी अनहोनी पर रो रहे थे। आर्यन थोड़ी देर बिस्तर पर पड़ा रहा। सोचा गली में इतने लोग रहते हैं, कोई तो उठकर कुत्तों को भगाएगा। लेकिन कोई नहीं आया।
जब आवाज कम नहीं हुई तो खुद ही उठकर बाहर निकला। सड़क पर देखा तो बिजली के खंभे के नीचे करीब दस-बारह कुत्तों का झुंड भौंक रहा था। किसी ने ट्यूबलाइट पत्थर मारकर तोड़ दी थी, जिससे वहां गहरा अंधेरा था। साफ नहीं हो पा रहा था कि कुत्ते किस पर भौंक रहे हैं।
आर्यन ने पास पड़ा छोटा पत्थर उठाकर फेंका। कुत्ते एक झटके में भागे पर थोड़ी दूर जाकर फिर भौंकने लगे। उसे गुस्सा आ रहा था। तभी उसकी नजर दूर एक घर की बाड़ पर पड़ी। कुछ हलचल हो रही थी। अंधेरे में किसी की छाया मंडरा रही थी।
आसपास चोरी की घटनाएं बढ़ी थीं, इसलिए सतर्कता जरूरी थी। आर्यन मोबाइल पर रील स्क्रोल करते हुए आम रफ्तार में चलने लगा। तिरछी नजर से उसे देख रहा था। उसे अपनी तरफ आता देख वह आकृति घर के दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी।
अब बीस-पच्चीस कदम की दूरी थी। दरवाजे की चौखट अंदर होने और लाइट बंद होने से गहरा अंधेरा था। आर्यन अब सिर्फ पांच फीट दूर था। उसने देखने की कोशिश की, लेकिन अंधेरे ने सब निगल लिया था। तुरंत मोबाइल की टॉर्च ऑन की और रोशनी डाली। दरवाजे की चौखट पर सफेद एलईडी लाइट पड़ी, लेकिन वहां कोई नहीं था।
वह बिना नजरें हटाए चला आ रहा था। फिर कैसे भाग गया? कुछ पल ठहरा, इधर-उधर देखा, पर कोई हलचल नजर नहीं आई। जिन कुत्तों को भगाया था, वे दूर पहाड़ी पर खड़े लगातार रो रहे थे। वीरान रात में उनकी आवाज डरावनी लग रही थी।
जरूर कुछ अजीब था। वरना इतनी बेचैनी क्यों? आर्यन ने फिर दरवाजे की तरफ टॉर्च की रोशनी डाली। कुछ नहीं दिखा। कुत्तों की आवाजें धीरे-धीरे थम गईं और चारों ओर सन्नाटा छा गया। रात के गहरे सन्नाटे में केवल कीड़ों की आवाज गूंज रही थी।
आर्यन घर लौटने लगा। पर कुछ कदम चलते ही महसूस हुआ कि कोई पीछे चल रहा है। कदम धीमे किए और ध्यान से सुनने लगा। पीछे से कदमों की आहटें करीब आती महसूस हो रही थी। मन में अजीब घबराहट थी।
यह वही व्यक्ति हो सकता है जो छिपकर देख रहा था। कोई चोर अंधेरे में दुबका बैठा था और अब भागने की जगह ढूंढ रहा था। अगर साथ में जानलेवा हथियार है तो? यही सोच कर कलेजा कांप उठा।
तभी गर्दन पर हल्की सिहरन महसूस हुई। लगा किसी ने कंधों पर हाथ रखकर पीछे खींच लिया। झट से मुड़कर देखा पर कोई नहीं था। गौर से देखने पर थोड़ी दूर खंभे की हल्की रोशनी में एक धुंधली काली आकृति खड़ी नजर आई।
कोई दूरी पर खड़ा था। आकृति अजीब तरह से झुकी हुई थी। दोनों हाथ जमीन तक लटक रहे थे। पूरी तरह स्थिर, पर सख्त लाल आंखें आर्यन पर टिकी थीं। जैसे अंदर झांक रही हों। मौजूदगी किसी बुरे सपने जैसी लग रही थी।
छह फीट लंबा, दुबला-पतला शरीर। धुंधले काले रंग की आकृति देख धड़कनें तेज हो गईं। डर से सिहरन दौड़ गई। अंदर की ताकत खत्म हो गई। सन होकर बस देख रहा था।
तभी उस आकृति ने बायां हाथ धीरे-धीरे उठाकर एक इशारा किया। किसी घर की तरफ संकेत कर रहा था। पर समझने की हिम्मत नहीं बची थी। बस वहां से भागना चाहता था, पर पैर जकड़े थे।
एक ही चारा था – जोर से चिल्लाकर लोगों को बुलाना। लेकिन कुत्तों की आवाज से जो नहीं निकले, क्या उन्हें सुनाई देगी? बिल्कुल बेबस था।
पर पलक झपकते ही वह डरावनी छवि गायब हो गई। समझ पाता उतने में दूर एक घर की लाइट जली और कोई बाहर निकला। गाड़ी निकाल रहे थे। आर्यन को देखकर रोककर पूछा, “बेटा, रिक्शा अभी आ सकता है?”
“हां, पर क्या हुआ?”
“पेशेंट को अस्पताल ले जाना है।”
आर्यन ने दोस्त को फोन लगाया और उनके साथ घर पहुंचा। वह लड़की आरती जमीन पर पड़ी थी। खोखली आंखों के नीचे गहरे काले घेरे। बेजान बाल और थके चेहरे पर अजीब तनाव। उसकी मां सिराहने बैठी कलाई सहला रही थी।
“आरती, चिंता मत करो बेटी। सब ठीक हो जाएगा।”
मां ने कांपते स्वर में पूछा, “गाड़ी का इंतजाम हुआ?”
उसे अस्पताल भर्ती कराया गया। मां-पिता दोनों गुमसुम थे। आर्यन वहीं रुक गया, सोचा शायद जरूरत पड़े। डॉक्टरों ने जांचें शुरू कर दीं। शरीर स्कैन हो रहा था।
आर्यन बाहर खड़ा दरवाजे के शीशे से झांक रहा था। आरती बेहोश पड़ी थी। ग्लूकोस बूंद-बूंद नसों में उतर रहा था। ईसीजी मशीन की पीप-पीप गूंज रही थी।
आईसीयू के दरवाजे पर लगे कांच से भीतर देखकर जैसे ही मुड़ा, कुछ अजीब लगा। दोबारा झांका तो कमरे के कोने में हल्की हलचल महसूस हुई। दवाइयों की मेज के पास। ठिटक गया। ठंडी सनसनी दौड़ गई।
भौंहें सिकोड़कर ध्यान से देखा। आईसीयू के दाहिने कोने में छाया सी खड़ी थी। डॉक्टर या नर्स का वहां होना संभव नहीं था। पर छाया बिल्कुल स्थिर, गंभीर और भूरे रंग की थी।
आर्यन ने बेंच पर बैठे उसके पिता को बुलाया।
“अंकल!”
“बोलो बेटा, क्या बात है?”
इशारे से कहा, “क्या आपको उस कोने में कुछ नजर आ रहा है?”
वे हैरान हुए और भीतर झांकने लगे।
“किस कोने में?”
आर्यन ने दोबारा शीशे के पार झांका। पर छाया अब नजर नहीं आई।
“तुम थक गए हो।” उन्होंने कंधे पर हाथ रखा। “शायद थकान की वजह से ऐसा लग रहा है। आराम करो, चार बज रहे हैं।”
बात सुनकर आर्यन चुपचाप बगल की बेंच पर लेट गया। पर वह अनजानी छाया मन में गहराई तक उतर चुकी थी। रहस्य समझने की कोशिश में करवटें बदलता रहा।
“हेलो!”
हल्की आवाज से नींद टूटी। आंखों पर भारीपन था।
“हेलो, उठिए!”
आवाज फिर आई।
“मां, सोने दो। आज छुट्टी है।”
तभी चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे पड़े। शरीर में ठंडी लहर दौड़ी। झट से आंखें खोलीं। सामने बेहद खूबसूरत लड़की खड़ी मुस्कुरा रही थी।
आर्यन ने पहचान लिया – आरती थी। बाल पीछे बंधे, सफेद पंजाबी सूट पहना था। बस उसे देखता रह गया।
“अरे, इतनी सुबह हमारे घर?”
मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “यह ना आपका घर है ना मेरा। हॉस्पिटल है।”
उसके हाथ पर सफेद पट्टी चिपकी थी। फिर याद आया।
“आप यहां क्या कर रही हैं? जाइए, अंदर बेड पर आराम कीजिए।”
“इन्हें डिस्चार्ज दे दिया गया है।” नर्स ने रिपोर्ट चेक करते हुए कहा।
“क्या? डिस्चार्ज?”
“हां। अब हम घर जा रहे हैं।” आरती ने मुस्कुराते हुए कहा।
“यह क्या हो रहा है? मुझे समझ नहीं आ रहा।”
आर्यन पूरी तरह कंफ्यूज हो गया। पर आरती की हालत में बदलाव साफ था। वह पहले जैसी नहीं थी।
उसके पिता पास आए, “चलो, रिक्शा आ गई। तुमने बहुत मदद की। हमारे कारण परेशानी हुई।”
आर्यन का ध्यान उनकी बातों पर नहीं था। बिल्कुल चकित था। रात भर आईसीयू में रही लड़की अब इतनी जल्दी ठीक होकर घर जा रही थी। सब बहुत सलीके से हो रहा था।
आरती के पिता काउंटर पर बिल चुका रहे थे। मां और आर्यन वहीं खड़े थे।
“आरती, चलो बेटा।” पिता ने आवाज दी।
नर्स को बाय कहकर वह आई। सवाल तो बहुत थे, पर पूछ नहीं पा रहा था।
“कल आप इतनी गंभीर थीं, अब कैसे ठीक हो गईं?”
“बाद में बताऊंगी। आपका नंबर दीजिए। वैसे भी हम एक ही इलाके में रहते हैं। आपने बहुत मदद की। काफी एहसान है।”
“मदद, एहसान? कैसी बात कर रही हैं?” आर्यन ने सामान्य लहजे में पूछा।
तभी आरती की मां बोली, “तुम नहीं समझोगे। जिस अपार्टमेंट में हम रहते थे, जब ऐसा होता तो पड़ोसी दरवाजे के झिर्री से देखते, पर मदद नहीं करते। आसपास की बात दूर की है, खून के रिश्ते भी दूर हो गए।”
“हालत?”
“चलो, रिक्शा आ गई।” आरती ने बात काटी।
वे रिक्शे में बैठकर निकले और आर्यन बाइक पर जाने लगा। पर इस हड़बड़ी में आरती का नंबर जरूर याद रख लिया था।

