विक्रम रामनगर का रहने वाला था। कई दिनों से वह अपनी ससुराल गया हुआ था। जब लौटा तो गांव में हंगामा मचा था।
“क्या हुआ भाई?” विक्रम ने पूछा।
“विक्रम का गीजर चोरी हो गया!” किसी ने चिल्लाया।
विक्रम को पूरी कहानी सुनाई गई। सर्दियों का मौसम आ गया था और गांव में सभी ठंडे पानी से नहाने से कतरा रहे थे।
एक दिन गोपाल नहाने गया। ठंडे पानी पड़ते ही वह जोर से चिल्लाया, “बचाओ!”
लोग दौड़े आए। “क्या हुआ?”
“ठंडा पानी लगा तो चीख निकल गई,” गोपाल कांपते हुए बोला।
सब हंस पड़े। अब गांव में नया चलन शुरू हो गया था – सर्दियों में नहाना छोड़ दो! लोग धूप सेंकते और कहते, “नहाना तो बहादुरों का काम है।”
तभी एक शाम विक्रम मोटरसाइकिल पर एक अजीब मशीन लेकर आया – गीजर!
“यह क्या है?” लोगों ने पूछा।
“यह गीजर है। नल से गर्म पानी देता है,” विक्रम ने समझाया।
लोगों की आंखें फटी रह गईं। विक्रम ने गीजर लगाया और नल खोला। भाप के साथ गर्म पानी निकला!
“वाह! सच में गर्म है!” सब चौंक गए।
हरिप्रसाद, विक्रम के पिता, बोले, “मैं भी नहाऊंगा। महीने भर से नहीं नहाया।”
कुछ देर बाद अंदर से आवाज आई, “आहा! मजा आ गया! स्वर्ग है भाई!”
बाहर आकर हरिप्रसाद की चमक देखकर सब समझ गए – यह तो जादू है!
अगले दिन से हरिप्रसाद का घर गांव का स्नानघर बन गया। सुबह से लंबी लाइन लग जाती। कोई बाल्टी लेकर, कोई मग लेकर आता।
“दो बाल्टी गर्म पानी दे दो!”
“मैं पहले आया था!”
“लाइन में लगो सब!”
धीरे-धीरे हरिप्रसाद का आंगन मेले जैसा लगने लगा। विक्रम परेशान हो गया।
“यार, यह क्या तमाशा है? मेरा घर है या सार्वजनिक स्नानघर?”
“बेटा, गांव के लोग हैं। नहाने दे,” हरिप्रसाद बोले।
विक्रम ने सोचा – पैसे लूंगा तो भाग जाएंगे। उसने घोषणा की, “अब हर नहाने के ₹5 लगेंगे!”
लेकिन लोग और खुश हो गए! “₹5 तो कुछ नहीं! ले लो भाई।”
रात तक लोग आते रहे। विक्रम खुद अपने घर में नहीं नहा पा रहा था।
पड़ोसी मोहन को जलन होने लगी। दिन-रात शोर होता रहता।
“यह मेला नहीं घर है! एक दिन गीजर तोड़ दूंगा,” मोहन गुस्से में बोला।
एक दिन तो हाथापाई हो गई लाइन में।
“मैं पहले!”
“नहीं, मैं!”
तभी सरपंच जी आ गए। “हटो सब! पहले मैं नहाऊंगा।”
“सरपंच जी, लाइन में लगिए,” लोगों ने कहा।
“क्या? मुझसे पैसे लोगे? मैं यह गीजर ही उठा ले जाऊंगा!” सरपंच जी गरजे।
“निकल जाइए! यह मेरा घर है!” विक्रम चिल्लाया।
सरपंच जी गुस्से में चले गए।
अगली सुबह सब उठे तो गीजर गायब था! दीवार पर बस पाइप लटका था।
“मेरा गीजर चोरी हो गया!” विक्रम चीखा।
सबको मोहन पर शक हुआ। उसके घर में गीजर का खाली डब्बा मिला।
“तूने चुराया!” लोग चिल्लाए।
“नहीं! कोई मुझे फंसा रहा है,” मोहन बोला।
पुलिस आई। जांच हुई पर गीजर नहीं मिला। सरपंच के घर भी ढूंढा, कुछ नहीं।
रात को एक चोर पकड़ा गया। सबने पूछा, “तूने गीजर चुराया?”
“नहीं मालिक! मैं तो आज आया हूं!”
गीजर का रहस्य बना रहा।
गांव वालों ने मिलकर पैसे इकट्ठे किए। “नया गीजर लाएंगे!”
शाम को विक्रम शहर निकल गया। रात को चुपके से लौटा। घर में जाकर बक्से से वही पुराना गीजर निकाला!
“मेरा प्यारा गीजर!” विक्रम मुस्कुराया।
“बेटा, तेरी योजना काम कर गई!” हरिप्रसाद बोले।
“हां पिताजी! लोगों ने इतना तंग किया था। अपने गीजर के पैसे भी निकाल लिए।”
विक्रम ने गीजर दोबारा लगाया। गर्म पानी आने लगा।
“सुबह बोल देना नया गीजर ले आया,” हरिप्रसाद हंसे।
“और अगर भीड़ आए तो कहूंगा – यह वीआईपी के लिए है। और वीआईपी सिर्फ हम दो!”
दोनों बाप-बेटा जोर से हंस पड़े। अति किसी भी चीज की बुरी होती है। दूसरों की सुविधा का अनुचित लाभ नहीं उठाना चाहिए। साथ ही, चालाकी से समस्या का हल कभी स्थायी नहीं होता।

