रामदीन अपना पुराना रिक्शा लेकर गांव की धूल भरी सड़कों पर दौड़ रहा था। शाम हो चुकी थी और उसे जल्दी घर पहुंचना था। “अरे काका, बस बस यहीं रोक दो,” सवारी ने कहा। रामदीन ने रिक्शा रोका। “कितना हुआ?” सवारी ने पूछा। “बीस रुपये हुआ बेटा,” रामदीन ने विनम्रता से कहा। पैसे लेकर वह आगे बढ़ा ही था कि सामने से जमींदार का मुनीम मुन्ना लाल दिखाई दिया।
“अरे रामदीन, ठाकुर साहब बुला रहे हैं तुझे,” मुन्ना लाल ने आवाज़ लगाई। रामदीन का दिल बैठ गया। वह जानता था कि जमींदार के बुलावे का मतलब मुसीबत होती है। उसने अपना रिक्शा एक तरफ खड़ा किया और ठाकुर की हवेली की ओर चल पड़ा।
हवेली के बड़े दरवाजे से अंदर जाते ही ठाकुर सिंह अपनी कुर्सी पर विराजमान दिखे। “नमस्ते मालिक, कैसे याद किया?” रामदीन ने हाथ जोड़कर कहा।
“तेरी इतनी औकात नहीं है कि हम तुझे याद करें रामदीन। तुझे इसलिए बुलवाया है कि अगर तूने दो महीने में अपनी जमीन नहीं छुड़वाई तो कानूनन वो हमारी हो जाएगी। समझा?” ठाकुर ने गुर्राते हुए कहा।
“लेकिन मालिक, मैं तो समय पर ब्याज और मूलधन चुका रहा हूं,” रामदीन ने घबराते हुए कहा।
“वो सब हम नहीं जानते। दो महीने हैं तेरे पास। या तो पैसे ला या अपने बेटे के साथ हमारे खेतों में मजदूरी करने आ जा। बस इतना ही,” ठाकुर ने निर्णय सुना दिया।
“मालिक, मेरा बेटा अर्जुन पढ़ाई कर रहा है। वो अफसर बनना चाहता है। मैं उसे अपनी तरह मजदूर नहीं बना सकता,” रामदीन की आंखों में आंसू आ गए।
“हा हा हा! अफसर बनेगा? दिन में ख्वाब देखना छोड़ दे रामदीन। सोच ले, जमीन प्यारी है या बेटे की पढ़ाई,” ठाकुर ने ठहाका लगाया।
उस रात घर लौटकर रामदीन बहुत परेशान था। अर्जुन ने पिता की चिंता देखी तो पूछा, “क्या हुआ पिताजी? आज इतनी देर कैसे हो गई?”
रामदीन ने सब बात बताई। अर्जुन तुरंत बोला, “तो कल से मैं भी चलता हूं खेतों में आपके साथ।”
“नहीं बेटा! मेरा सपना तुझे मजदूरी नहीं, अफसर बनते देखने का है। मैं जमीन का दर्द सह लूंगा लेकिन तुझे मजदूरी करते देखने का दर्द नहीं,” रामदीन ने दृढ़ता से कहा।
अगले दिन रामदीन ठाकुर के पास गया और कहा, “मालिक, आप मेरी जमीन रख लीजिए। मैं रिक्शा चलाकर गुजारा कर लूंगा। बस अर्जुन को पढ़ने दीजिए।”
ठाकुर सिंह को यह बात बहुत बुरी लगी। “देख रहे हो मुन्ना लाल, इस दो कौड़ी के आदमी में कितनी अकड़ आ गई है। मैं इसे मजदूर बनाकर रहूंगा,” ठाकुर ने गुस्से में कहा।
कुछ दिनों बाद बलराम काका रामदीन के घर आए। “भाई, मेरी पत्नी बहुत बीमार है। दवाई के लिए सौ रुपये चाहिए। जमींदार ने मांगने पर डांट कर भगा दिया।”
रामदीन ने तुरंत अर्जुन की किताबों में रखे पैसे निकाले और बलराम को दे दिए। “चिंता मत करो काका, अर्जुन अपने दोस्त की किताबों से पढ़ लेगा। आपकी पत्नी की जान बचाना जरूरी है।”
अर्जुन ने कोई शिकायत नहीं की। उसने अपने पिता के त्याग को समझा।
महीनों बाद एक दिन सरकारी डाकिया रामदीन के घर आया। “अर्जुन के नाम पत्र है। यहां साइन करें।”
“मुझे साइन करना नहीं आता भाई,” रामदीन ने शर्मिंदा होकर कहा।
अर्जुन को बुलाया गया। पत्र खोलते ही उसके चेहरे पर खुशी छा गई। “पिताजी! मैं परीक्षा में पास हो गया हूं! मुझे आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना होगा।”
रामदीन की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। “सब ठीक हो जाएगा बेटा। तेरे जाने का इंतजाम मैं कर दूंगा।”
अगले दिन रामदीन अर्जुन को स्टेशन छोड़ने जा रहा था। रास्ते में बलराम काका मिले। “आशीर्वाद दो काका, मैं परीक्षा में सफल हो जाऊं,” अर्जुन ने कहा।
“जरूर होगा बेटा। तेरे पिता ने तुझ पर बहुत मेहनत की है,” बलराम ने आशीर्वाद दिया।
लेकिन ठाकुर को यह बात पता चल गई। उसने बलराम से पूछताछ की और गुस्से में आकर मुन्ना लाल से कहा, “इसका रिक्शा छीन लो। अगर रोजगार ही नहीं होगा तो यह हाथ जोड़कर मेरे पास आएगा ही।”
अगले दिन ठाकुर ने रामदीन का रिक्शा भी ब्याज के नाम पर छीन लिया। रामदीन टूट गया। उसके पास अब कुछ नहीं बचा था। उसे मजबूरन ठाकुर के खेतों में मजदूरी करनी पड़ी।
कुछ महीने बाद अर्जुन शहर से लौटा। अपने पिता को खेतों में काम करते देखकर वह स्तब्ध रह गया। “पिताजी, आप यहां क्यों हैं? और हमारा रिक्शा कहां है?”
“जमींदार ने ले लिया बेटा, ब्याज के बदले,” रामदीन ने धीमी आवाज़ में कहा।
अर्जुन तुरंत ठाकुर की हवेली की ओर चल पड़ा। “ठाकुर साहब, मुझे हमारा रिक्शा चाहिए और मेरे पिता ने कितना कर्जा लिया था, उसके कागजात भी।”
“चार अक्षर क्या पढ़ लिया, कागजात मांग रहा है? नहीं है कुछ भी। जाओ यहां से,” ठाकुर ने धक्का देते हुए कहा।
“आप रिक्शा देंगे या नहीं?” अर्जुन ने दृढ़ता से कहा।
“नहीं दूंगा। क्या कर लेगा?” ठाकुर ने चुनौती दी।
तभी पुलिस की गाड़ियां आईं। एक युवा अफसर ने बाहर निकलकर कहा, “मैं इस जिले का नया आईपीएस ऑफिसर हूं। लोगों की जमीन हड़पने और जबरदस्ती बंधुआ मजदूरी करवाने के अपराध में आपको गिरफ्तार किया जाता है ठाकुर सिंह।”
ठाकुर की सारी अकड़ धूल में मिल गई। सभी ग्रामीणों को उनकी जमीनें वापस मिलीं।
बलराम काका ने अर्जुन को गले लगाते हुए कहा, “बेटा, तुमने इस गांव में सूर्योदय कर दिया। एक शिक्षित व्यक्ति ही यह काम कर सकता था।”
रामदीन की आंखों में गर्व के आंसू थे। उसका सपना पूरा हुआ था।
शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार है जो समाज में बदलाव ला सकता है। माता-पिता का त्याग और बच्चों की मेहनत मिलकर असंभव को संभव बना सकती है। शिक्षा न केवल व्यक्ति को बल्कि पूरे समाज को अन्याय से मुक्ति दिला सकती है।

