केशवनगर के घने जंगलों में ऊंची पहाड़ियों के बीच से झरने बहते थे। पास में एक विशाल समुद्र था जहां राजेश नाम का निडर मछुआरा रहता था। राजेश अपनी बहादुरी के लिए पूरे गांव में प्रसिद्ध था।
एक दिन जब राजेश समुद्र में जा रहा था, तो अन्य मछुआरे उसे चेतावनी देते हुए कहने लगे, “राजेश, इतने गहरे समुद्र में मत जाओ। यह खतरनाक है।” परंतु राजेश हंसते हुए बोला, “मुझे तैरना अच्छी तरह आता है। तुम लोग चिंता मत करो।”
राजेश रोजाना समुद्र की गहराई में जाकर बड़ी मछलियां पकड़ता था। दूसरे मछुआरे केवल नहर के किनारे छोटी मछलियां पकड़ते थे। बाजार में जब राजेश अपनी बड़ी मछलियां लाता, तो सभी उसी से खरीदते थे। इससे विक्रम और अन्य मछुआरे उससे जलने लगे।
शाम को राजेश घर पहुंचा तो उसकी पत्नी प्रिया ने स्वादिष्ट भोजन तैयार कर रखा था। “वाह प्रिया! तुम्हारे हाथों का खाना खाकर सारी थकान मिट जाती है,” राजेश बोला। प्रिया मुस्कुराते हुए बोली, “बस करो, अब जल्दी खाना खा लो।”
दूसरी तरफ गांव के मछुआरे राजेश की सफलता से परेशान थे। विक्रम ने कहा, “हमें राजेश को रोकना होगा। उसके कारण हमारा व्यापार बर्बाद हो रहा है।” सभी मछुआरों ने मिलकर योजना बनाई।
अगले दिन जब राजेश जंगल से गुजर रहा था, तो मछुआरों ने उसे घेर लिया। विक्रम चिल्लाया, “आज तुझे सबक सिखाएंगे!” सभी ने मिलकर राजेश को बुरी तरह पीटा। राजेश के पैर में गहरा घाव हो गया। रोते हुए राजेश बोला, “मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा?” विक्रम बोला, “तेरे बड़े शिकार से हमारा धंधा बर्बाद हो रहा है। अब समुद्र में मत जाना।”
राजेश दर्द से कराहता हुआ नहर की तरफ चला गया। अब वह भी छोटी मछलियां पकड़ने लगा। शाम को जब वह बाजार गया, तो व्यापारी हैरान हुए। घर पहुंचकर राजेश ने प्रिया को सब बताया। प्रिया दुखी होकर बोली, “अब तुम आराम करो। मैं मछलियां पकड़ूंगी।”
अगले दिन प्रिया नहर पर गई। दिनभर प्रयास करने पर भी उसके जाल में एक भी मछली नहीं आई। विक्रम हंसते हुए बोला, “मंगला, यह काम तुम्हारे बस का नहीं।” निराश होकर प्रिया घर लौट आई।
राजेश ने हिम्मत बढ़ाते हुए कहा, “हार मत मानो। कल फिर कोशिश करना।” प्रिया ने सिर हिलाया।
उधर नहर के पास महर्षि देवदत्त तपस्या कर रहे थे। पानी में नीला नाम की जलपरी रहती थी। वह अपने बच्चों की चिंता में ऊपर आई, तो पानी की बूंदें साधु पर पड़ीं। साधु का ध्यान टूट गया।
क्रोधित होकर साधु बोले, “मूर्ख! तूने मेरी तपस्या भंग की। मैं तुझे श्राप देता हूं कि तू मछली बन जा। तभी मुक्त होगी जब कोई तुझे पकड़कर छोड़ दे।” नीला रोती रही पर श्राप लग चुका था।
अगले दिन प्रिया फिर नहर पर गई। विक्रम ने फिर मजाक उड़ाया। प्रिया चुपचाप बैठी रही। शाम हुई, तो उसके जाल में कुछ फंसा। यह नीला थी जो मछली बन चुकी थी।
नीला रोते हुए बोली, “मुझे छोड़ दो। मेरे बच्चे भूखे हैं।” प्रिया का दिल पिघल गया। उसने सोचा, “मैं किसी मां को उसके बच्चों से अलग नहीं कर सकती।” उसने नीला को छोड़ दिया।
श्राप टूटते ही नीला जलपरी बन गई। वह बोली, “प्रिया, तुमने मेरी जान बचाई। यह जादुई जाल लो। इसमें हमेशा मछलियां भरी रहेंगी।” प्रिया खुशी से जाल लेकर घर आई।
राजेश ने पूछा, “यह क्या है?” प्रिया ने पूरी कहानी बताई। राजेश बोला, “चलो कल परखते हैं। हम समुद्र किनारे झोपड़ी बनाकर रहेंगे।”
अगले दिन जब प्रिया ने जाल डाला, तो ढेरों मछलियां फंस गईं। विक्रम हैरान रह गया। प्रिया ने अच्छी कमाई की।
रात को विक्रम ने चोरी से जाल बदल लिया। सुबह जब उसने अपना जाल डाला, तो उसमें मगरमच्छ फंस गया। विक्रम चिल्लाया, “बचाओ!” प्रिया ने दौड़कर जाल काट दिया।
शर्मिंदा विक्रम ने माफी मांगी, “मुझे क्षमा करो। यह जाल तुम्हारा है। मैं गलत था। अब ईमानदारी से काम करूंगा।”
प्रिया ने जाल वापस लिया। अब वह और राजेश खुशहाल जीवन जीने लगे। राजेश का घाव भी ठीक हो गया। दोनों समुद्र किनारे सुख से रहने लगे।
ईमानदारी, दया और परोपकार से ही सच्ची खुशी मिलती है। दूसरों से जलन और बेईमानी कभी सफलता नहीं दिलाती।

