एक समय की बात है, एक घने जंगल में एक भूखी लोमड़ी रहती थी। उसका नाम था चंचला। चंचला कई दिनों से भूखी थी और खाने की तलाश में इधर-उधर भटक रही थी। जंगल में उसे कहीं भी खाना नहीं मिल रहा था। वह थकी-हारी इधर-उधर घूम रही थी, जब उसकी नज़र एक सुंदर तालाब पर पड़ी।
तालाब का पानी एकदम साफ और ठंडा था। उसके किनारे हरी-हरी घास उगी हुई थी। तालाब के पास ही एक छोटा सा कछुआ खेल रहा था। उसका नाम था मंथरा। मंथरा बहुत खुश था और धूप में बैठकर मज़े कर रहा था। वह कभी पानी में तैरता, तो कभी किनारे पर आकर घास पर लेट जाता।
चंचला ने जब मंथरा को देखा, तो उसकी आँखें चमक उठीं। उसने सोचा, “वाह! यह तो मेरे लिए बढ़िया भोजन है। यह छोटा कछुआ आसानी से मेरा शिकार बन जाएगा।” चंचला धीरे-धीरे मंथरा के पास आई। उसने अपने कदम बहुत सावधानी से रखे ताकि मंथरा को पता न चले।
जब चंचला मंथरा के बिल्कुल पास आ गई, तो उसने अचानक छलांग लगाई और मंथरा को अपने पंजों में पकड़ लिया। “मैं तुम्हें पकड़ लिया!” चंचला ने खुशी से कहा। मंथरा डर गया, लेकिन उसने घबराने की जगह समझदारी से काम लिया।
मंथरा ने तुरंत अपना सिर और अपने चारों पैर अपने मजबूत कवच के अंदर छुपा लिए। उसका कवच बहुत सख्त और मजबूत था। अब मंथरा एक गोल गेंद की तरह दिख रहा था। चंचला ने कवच को काटने की कोशिश की। उसने अपने तेज दांतों से कवच पर वार किया, लेकिन कवच बिल्कुल नहीं टूटा।
चंचला ने अपने पंजों से कवच को खरोंचने की कोशिश की, पर कुछ नहीं हुआ। वह बार-बार कोशिश करती रही, लेकिन कवच इतना मजबूत था कि उसमें एक भी खरोंच नहीं आई। चंचला परेशान हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस कछुए को कैसे खाया जाए।
“अरे, यह तो बहुत मुश्किल है,” चंचला ने चिड़चिड़ाते हुए कहा। “मैं इसे कैसे खाऊं? इसका कवच तो पत्थर जैसा सख्त है।” वह इधर-उधर चक्कर काटने लगी और सोचने लगी कि क्या किया जाए।
तभी मंथरा ने धीरे से अपना सिर बाहर निकाला और बहुत ही नरम आवाज़ में बोला, “लोमड़ी जी, अगर आप सच में मुझे खाना चाहती हैं, तो मुझे पानी में डाल दीजिए।”
चंचला ने हैरानी से पूछा, “पानी में? क्यों?”
मंथरा ने चालाकी से जवाब दिया, “जी हाँ, लोमड़ी जी। पानी में जाने से मेरा कवच नरम हो जाता है। फिर आप आसानी से मुझे खा सकती हैं। यह हमारे कछुओं का राज़ है।”
चंचला को यह बात सुनकर बहुत खुशी हुई। उसने सोचा कि कछुआ सच बोल रहा है। “अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी बात बताई तुमने। तुम बहुत ईमानदार हो,” चंचला ने कहा। वह मंथरा की चालाकी समझ नहीं पाई।
चंचला ने मंथरा को अपने मुँह में पकड़ा और तालाब की ओर चल पड़ी। वह बहुत खुश थी और सोच रही थी कि अब उसे अच्छा भोजन मिल जाएगा। तालाब के किनारे पहुँचकर उसने मंथरा को पानी में डाल दिया।
लेकिन जैसे ही मंथरा पानी में गया, उसने तुरंत अपने पैर बाहर निकाले और तेज़ी से तैरना शुरू कर दिया। पानी में मंथरा बहुत तेज़ था। वह पलक झपकते ही तालाब के बीचोंबीच पहुँच गया, जहाँ चंचला उसे नहीं पकड़ सकती थी।
चंचला किनारे पर खड़ी हो गई। वह बहुत गुस्से में थी। उसने जोर से चिल्लाया, “अरे, वापस आओ! तुमने मुझे धोखा दिया!” वह गुस्से में अपने पैर पटक रही थी।
मंथरा ने पानी में खड़े होकर मुस्कुराते हुए कहा, “लोमड़ी जी, तेज़ दांत से ज़्यादा तेज़ दिमाग काम करता है। आपको मेरी चाल में नहीं आना चाहिए था।” वह पानी में खुशी-खुशी तैरने लगा।
चंचला बहुत शर्मिंदा हुई। उसे एहसास हुआ कि उसने कितनी बड़ी गलती की। उसने एक छोटे से कछुए की बात पर विश्वास कर लिया और अपना शिकार गँवा बैठी। वह गुस्से में इधर-उधर घूमती रही, लेकिन कुछ नहीं कर सकी।
मंथरा अपने तालाब में सुरक्षित था। उसने अपनी समझदारी से अपनी जान बचा ली। वह तैरता रहा और खुशी से पानी में उछल-कूद करता रहा। चंचला को खाली पेट ही वापस जंगल में लौटना पड़ा।
इस घटना के बाद मंथरा और भी ज़्यादा सावधान हो गया। उसने सीखा कि खतरे में घबराना नहीं चाहिए, बल्कि शांत रहकर सोचना चाहिए। उसकी चतुराई ने उसकी जान बचा ली थी।
चंचला भी एक सबक सीख गई। उसने समझा कि हर किसी की बात पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए। कभी-कभी छोटे जीव भी बड़ों को सबक सिखा सकते हैं।
तालाब के पास के सभी जानवरों ने यह कहानी सुनी। सबने मंथरा की चतुराई की तारीफ की। मंथरा एक नायक बन गया। उसकी कहानी पूरे जंगल में फैल गई।
मंथरा अब भी उसी तालाब में रहता है। वह खुशी-खुशी अपना जीवन बिता रहा है। जब भी कोई छोटा जानवर मुसीबत में फँसता है, तो मंथरा उसे यह कहानी सुनाता है और सिखाता है कि मुसीबत में धैर्य और समझदारी कैसे काम आती है।
सूझबूझ और धैर्य से हर मुसीबत से बचा जा सकता है। घबराने की जगह शांत रहकर सोचना चाहिए। छोटा होना कमज़ोर होना नहीं है – अगर दिमाग तेज़ हो, तो कोई भी मुश्किल आसान हो जाती है।

