एक बार राजा अकबर के राज्य में एक अंतर्राष्ट्रीय कला सम्मेलन आयोजित हो रहा था। यह सम्मेलन हर वर्ष किसी न किसी राज्य में होता था और इस बार जिम्मेदारी अकबर के राज्य को मिली थी। मंत्री और सेवक सभी अतिथियों के स्वागत की तैयारियों में व्यस्त थे। इस सम्मेलन में देश-विदेश के राजा-रानी और मंत्री अपनी अनमोल कलाकृतियां लेकर आते थे।
सभी अतिथियों में एक राजा दुष्मंत मान भी था, जो अकबर का शत्रु था। अकबर ने उसे भी आमंत्रित किया था क्योंकि ऐसे सम्मेलन राज्यों के बीच संबंध सुधारने का अवसर होते थे। राजा दुष्मंत अपने विशेष कलाकार द्वारा बनाई गई एक अद्भुत मूर्ति लेकर आया था। वह मूर्ति इतनी जीवंत लगती थी मानो कोई असली व्यक्ति खड़ा हो।
दुष्मंत ने अकबर को चेतावनी दी कि यदि इस अनमोल मूर्ति को कुछ हुआ, तो अकबर और उनके राज्य को शाही समाज से हमेशा के लिए निकाल दिया जाएगा। यह सुनकर अकबर और उनके मंत्री चिंतित हो गए।
तभी बाबा बावर्ची ने भोजन तैयार होने की सूचना दी। सभी अतिथि भोजन कक्ष की ओर दौड़ पड़े और स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेने लगे। सभी खाने में इतने मग्न थे कि किसी ने ध्यान नहीं दिया।
अचानक राजा दुष्मंत का एक सैनिक दौड़ता हुआ आया और चिल्लाया कि अनमोल मूर्ति चोरी हो गई है। सभी दौड़कर वहां पहुंचे और देखा कि मूर्ति वाकई गायब थी। अकबर ने तुरंत सैनिकों को पूरे राज्य में तलाशी का आदेश दिया।
बीरबल ने हर कमरे, छत और यहां तक कि शौचालयों में भी खोजा। सैनिकों ने बताया कि राज्य के द्वारों पर तैनात पहरेदारों ने किसी को भी अंदर या बाहर जाते नहीं देखा। यह रहस्य और गहरा हो गया।
तभी बीरबल एक शौचालय से बाहर निकला और एक युवक से टकरा गया। बीरबल ने गौर किया कि उस युवक के बालों में अजीब सफेदी थी। युवक ने अपना नाम मुट्टू स्वामी बताया और कहा कि वह राजा दुष्मंत का सचिव है।
बीरबल ने पूछा कि वह सुबह से दिखाई क्यों नहीं दिया, तो उसने कहा कि वह अभी-अभी आया है। जैसे ही एक चूहा निकला, मुट्टू डर गया और एक विचित्र मुद्रा में खड़ा हो गया। बीरबल को कुछ समझ आ गया।
इसी बीच राजा दुष्मंत ने अकबर को शाही समाज से निकालने और उनके राज्य पर पचास प्रतिशत कर लगाने की मांग की। सभी अतिथि जाने लगे तभी बीरबल ने चिल्लाकर सबको रोका।
बीरबल ने कहा कि अपनी मूर्ति साथ ले जाओ। तभी किसी ने रंगीन पानी की बाल्टी मुट्टू पर उलट दी। जब लोगों ने देखा तो वह बिल्कुल चोरी हुई मूर्ति जैसा दिख रहा था।
बीरबल ने समझाया कि कभी कोई मूर्ति थी ही नहीं। मुट्टू स्वामी ही मूर्ति बनकर खड़ा था। अतिथि सूची में उसका नाम नहीं था क्योंकि वह पंजीकृत नहीं था। शौचालय में बीरबल को चूना मिला था जो मुट्टू ने अपने बालों पर लगाया था। जब चूहा देखकर वह डरा तो उसी मुद्रा में खड़ा हो गया जैसे मूर्ति बना था। भोजन के दौरान वह चुपचाप शौचालय में गया और चूना धो दिया।
राजा दुष्मंत शर्म से सिर झुका कर खड़ा हो गया। उसकी साजिश बेनकाब हो गई थी। सभी अतिथियों ने राजा दुष्मंत पर प्रतिबंध लगाने और पचास प्रतिशत कर लगाने का फैसला किया।
जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वह खुद उसी में गिरता है। चालाकी से नहीं, ईमानदारी से जीवन जीना चाहिए।

