चंदनपुर गाँव में दो भाई अरुण और विक्रम रहते थे। अरुण घमंडी और आलसी था, जबकि विक्रम मेहनती और विनम्र। पिता हरिलाल की मृत्यु के बाद अरुण ने पैतृक जमीन बेचकर शहर जाने का फैसला किया। विक्रम गाँव में रहकर खेती करने लगा।
शहर में अरुण ने व्यापार शुरू किया और खूब पैसा कमाया। वह गाँव आकर विक्रम का मजाक उड़ाता। सरपंच की बेटी प्रिया से उसका विवाह हुआ। प्रिया नखरेबाज़ और फिजूलखर्च थी। विक्रम ने मजदूर की बेटी सीमा से विवाह किया जो सरल और मेहनती थी।
समय बदला और अरुण का व्यापार घाटे में चला गया। साथी धोखेबाज निकला। प्रिया की बढ़ती मांगों ने स्थिति और खराब कर दी। बैंक ने दुकान सील कर दी, गाड़ियां और घर नीलाम हो गया। अरुण-प्रिया सड़क पर आ गए।
दूसरी ओर विक्रम की मेहनत रंग लाई। उसने नया खेत खरीदा और गाँव में इज्जत कमाई। सीमा ने हर कदम पर साथ दिया। माता कमला देवी की मृत्यु के बाद अरुण को एक योजना सूझी।
उसने दलाल मंगल सिंह से नकली वसीयत बनवाई जिसमें सारी संपत्ति अरुण के नाम थी। कागजात दिखाकर उसने विक्रम को घर से निकाल दिया। विक्रम अपने छोटे खेत की झोपड़ी में चला गया।
विक्रम ने हिम्मत नहीं हारी। सीमा के साथ मिलकर दोगुनी मेहनत शुरू की। अरुण ने मंगल सिंह को पैसे देने से मना कर दिया। गुस्साए मंगल ने पंचायत में सच उजागर कर दिया।
गाँव की पंचायत में मंगल सिंह ने नकली दस्तावेजों का खुलासा किया। सरपंच ने अरुण और प्रिया को गाँव से बेदखल कर दिया। विक्रम को उसकी संपत्ति वापस मिल गई।
अरुण अब गाँव-गाँव भटकता है और मजदूरी करता है। उसका घमंड चूर-चूर हो गया। विक्रम ने अपना घर पाया लेकिन उसका दिल करुणा से भरा रहा। उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि अरुण को सही रास्ता दिखाए।
सीमा ने कहा, “आपका दिल बहुत बड़ा है। यही असली अमीरी है।” विक्रम मुस्कुराया।
समय ने अपना पाठ पढ़ा दिया। धोखेबाज की पहचान मिट गई और मेहनती ने सम्मान पाया।
“मेहनत और ईमानदारी से अर्जित धन ही स्थायी होता है। घमंड और धोखे की नींव पर खड़ी इमारत कभी टिकती नहीं। समय सबको उसके कर्मों का फल देता है।”

