एक सुनहरी सुबह, एक छोटा लड़का अपने घर से निकलकर नदी के किनारे टहलने गया। उसका नाम राहुल था और वह केवल बारह साल का था। उसके घने काले बाल हवा में लहरा रहे थे और उसकी बड़ी भूरी आंखें आस-पास की हर चीज़ को देखने में व्यस्त थीं। वह एक साधारण नीली टी-शर्ट और भूरे रंग की पैंट पहने हुए था।
राहुल धीरे-धीरे नदी के किनारे चल रहा था, अपने मन में तरह-तरह के सपने देख रहा था। अचानक उसकी नज़र नदी किनारे बिखरे हुए रंग-बिरंगे कंकड़ों के एक ढेर पर पड़ी। ये कंकड़ सूरज की रोशनी में चमक रहे थे और इनके अलग-अलग रंग देखकर राहुल का मन खुशी से भर गया।
“वाह! कितने खूबसूरत कंकड़ हैं!” राहुल ने मन ही मन सोचा और तुरंत उस ढेर के पास जाकर बैठ गया। उसने एक-एक करके कंकड़ों को उठाना शुरू किया। कुछ कंकड़ नीले रंग के थे, कुछ लाल, कुछ हरे और कुछ बैंगनी। हर कंकड़ की सतह बेहद चिकनी थी और वे हाथ में पकड़ने में बहुत अच्छे लग रहे थे।
पहले तो राहुल ने कंकड़ों को अपनी हथेली में रखकर उन्हें देखा, उन्हें एक-दूसरे से टकराया और उनकी मधुर आवाज़ सुनी। फिर अचानक उसके मन में एक शरारत सूझी। उसने एक कंकड़ उठाया और उसे नदी में फेंक दिया। कंकड़ पानी में गिरा तो “छपाक” की आवाज़ हुई और पानी में लहरें बनीं।
“कितना मज़ेदार है!” राहुल ने सोचा और एक के बाद एक कंकड़ नदी में फेंकता रहा। हर बार जब कंकड़ पानी में गिरता, तो वह खुशी से ताली बजाता। कभी वह कंकड़ को दूर तक फेंकने की कोशिश करता, कभी उसे तिरछा फेंकता ताकि वह पानी की सतह पर उछले।
घंटों बीत गए और राहुल को समय का बिल्कुल अहसास नहीं हुआ। वह इस खेल में इतना मग्न था कि उसे पता ही नहीं चला कि वह लगभग सभी कंकड़ नदी में फेंक चुका है। जब उसने देखा तो केवल चार-पांच कंकड़ ही बचे थे।
जैसे ही राहुल ने अंतिम कंकड़ उठाया, उसे किसी की आवाज़ सुनाई दी। “बेटा, तुम इन कंकड़ों का क्या कर रहे हो?”
राहुल ने पीछे मुड़कर देखा तो एक बुज़ुर्ग आदमी वहां खड़ा था। उस बूढ़े आदमी की दाढ़ी सफ़ेद थी, आंखें दयालु थीं, और वह एक सफ़ेद कुर्ता और धोती पहने हुए था। उसके हाथ में एक लकड़ी की छड़ी थी।
“मैं बस खेल रहा हूं, दादाजी,” राहुल ने मासूमियत से जवाब दिया। “ये तो सिर्फ़ साधारण कंकड़ हैं।”
बुज़ुर्ग आदमी मुस्कराया और धीरे-धीरे राहुल के पास आकर बैठ गया। उसने बचे हुए कंकड़ों में से एक को उठाया और अपनी हथेली में रखकर ध्यान से देखा।
“बेटा, क्या तुम जानते हो कि ये क्या हैं?” बूढ़े आदमी ने पूछा।
राहुल ने अपने कंधे उचकाए और कहा, “ये तो बस कंकड़ हैं, दादाजी। नदी में बहुत सारे मिलते हैं।”
बुज़ुर्ग आदमी ने कंकड़ को सूरज की रोशनी में उठाया। कंकड़ अलग-अलग रंगों में चमकने लगा जैसे इंद्रधनुष हो।
“मेरे प्यारे बच्चे,” उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “ये कोई साधारण कंकड़ नहीं हैं। ये तो बहुत दुर्लभ रत्न हैं। इन्हें कीमती पत्थर कहते हैं। एक-एक कंकड़ हज़ारों रुपए का है।”
राहुल की आंखें फैल गईं। वह हैरानी से बूढ़े आदमी को देखने लगा। “क्या… क्या सच में, दादाजी?”
“बिल्कुल सच, बेटा। ये प्रकृति के अनमोल उपहार हैं। लेकिन ये इतने सादे दिखते हैं कि लोग इन्हें पहचान नहीं पाते।” बुज़ुर्ग ने समझाया।
राहुल ने नदी की तरफ देखा जहां उसने दर्जनों कंकड़ फेंके थे। उसकी आंखों में आंसू आ गए। “मैंने इतने सारे कीमती रत्न फेंक दिए, दादाजी! काश मुझे पहले पता होता!”
बूढ़े आदमी ने प्यार से राहुल के सिर पर हाथ रखा। “बेटा, अब जो हो गया सो हो गया। लेकिन इससे एक बहुत महत्वपूर्ण सीख मिलती है।”
“कौन सी सीख, दादाजी?” राहुल ने उत्सुकता से पूछा।
“यह सीख कि हमें हमेशा चीज़ों की असली कीमत समझनी चाहिए। कभी-कभी सबसे कीमती चीज़ें बहुत सादी दिखती हैं। हमारे माता-पिता का प्यार, दोस्तों की मित्रता, स्वास्थ्य, समय – ये सब रत्नों से भी ज़्यादा कीमती हैं। लेकिन हम इन्हें साधारण समझकर इनकी कद्र नहीं करते।”
राहुल ने गंभीरता से सिर हिलाया। वह समझ गया था कि बूढ़े आदमी की बात में कितनी गहराई है।
“दादाजी, मैं अब कभी भी किसी चीज़ को साधारण समझकर उसकी कद्र नहीं करूंगा,” राहुल ने वादा किया।
बुज़ुर्ग आदमी ने मुस्कराते हुए बचे हुए कंकड़ राहुल के हाथ में रख दिए। “इन्हें संभालकर रखना, बेटा। और हमेशा याद रखना कि जिंदगी में सबसे कीमती चीज़ें अक्सर बहुत सादी दिखती हैं।”
राहुल ने कंकड़ों को सावधानी से अपनी जेब में रखा और बूढ़े आदमी को धन्यवाद दिया। उस दिन से राहुल ने जीवन को एक नई नज़र से देखना शुरू किया।
हमारे पास जो कुछ भी है, उसकी कद्र करना चाहिए। अक्सर सबसे कीमती चीज़ें हमारे सामने ही होती हैं, लेकिन हम उन्हें पहचान नहीं पाते।

