दोपहर का समय था। घने जंगल से निकलते हुए व्यापारी संजय अपने घोड़े पर सवार होकर दीपनगर की ओर बढ़ रहे थे। थकान महसूस होने पर उन्होंने एक विशाल वृक्ष के नीचे विश्राम करने का निर्णय लिया। तभी एक रंग-बिरंगा पक्षी उड़कर आया और उन्हें घूरने लगा। संजय को यह बहुत विचित्र लगा।
कुछ देर आराम के बाद जब संजय आगे बढ़े, तो उन्हें दो रास्ते दिखाई दिए। वे असमंजस में पड़ गए। तभी वही पक्षी सामने आया और मनुष्य की आवाज में बोला, “बाईं ओर मत जाओ! वह रास्ता खतरनाक है और जंगल की गहराई में जाता है।”
संजय डर गए और तुरंत दूसरे रास्ते से दीपनगर पहुंचे। उन्होंने सीधे राजमहल जाकर राजा विक्रम सिंह को यह घटना सुनाई।
राजा विक्रम बोले, “तुम पहले नहीं हो जिसने इस रहस्यमयी पक्षी के बारे में बताया है। कई यात्रियों ने इसकी शिकायत की है। लेकिन यह किसी का नुकसान नहीं करता, इसलिए हमने कोई कार्रवाई नहीं की।”
राजकुमार देवराज, जो पास ही खड़े थे, बोले, “पिताजी, मैं इस रहस्य का पता लगाकर रहूंगा। कोई पक्षी मनुष्य की तरह कैसे बोल सकता है?”
राजा ने मना किया, लेकिन देवराज नहीं माने। अगले दिन वे जंगल में पहुंचे। जैसे ही वे खतरनाक रास्ते पर बढ़े, वही पक्षी प्रकट हुआ और चेतावनी दी। लेकिन देवराज ने अनसुना कर दिया।
घंटों की यात्रा के बाद देवराज एक प्राचीन खंडहर में पहुंचे। अंदर विशाल खजाना देखकर उनकी आंखें चमक उठीं। वे सोने का सिक्का उठाने ही वाले थे कि एक वृद्ध साधु प्रकट हुए।
“रुको! यह खजाना श्रापित है!” साधु ने चेतावनी दी।
लेकिन अहंकारी देवराज ने साधु की बात नहीं मानी और सिक्का उठा लिया। अगले ही पल रंग-बिरंगी किरणें उन पर पड़ीं और वे पत्थर में बदलने लगे। कुछ ही क्षणों में राजकुमार पूरी तरह पत्थर बन गए।
जब देवराज वापस नहीं लौटे, तो राजा विक्रम बहुत चिंतित हो गए। उन्होंने घोषणा की कि जो राजकुमार को ढूंढकर लाएगा, उसे मुंह मांगा इनाम मिलेगा।
हरियालीपुर गांव में शिकारी मानसिंह अपनी बीमार पुत्री प्रिया के इलाज के लिए परेशान थे। उनकी पत्नी सुमित्रा रो रही थीं। वैद्य ने बताया था कि प्रिया को केवल दस हजार सोने के सिक्कों वाली विशेष जड़ी-बूटी ही बचा सकती है।
मानसिंह के मित्र बलराम ने राजा की घोषणा के बारे में बताया। बलराम ने कहा, “तुम ही तो वर्षों पहले जंगल की गहराई से जीवित लौटे थे। अब फिर से जाओ और राजकुमार को बचाओ।”
मानसिंह ने राजमहल जाकर राजकुमार को ढूंढने की बात कही। राजा विक्रम ने खुशी से दस हजार सोने के सिक्के देने का वादा किया।
मानसिंह जंगल में पहुंचे और चतुराई से उस रहस्यमयी पक्षी को जाल में फंसा लिया। पक्षी ने कहा, “मुझे छोड़ दो! तुम तो इस जंगल में पहले भी आ चुके हो। मैं सब जानता हूं।”
मानसिंह चौंक गए। पक्षी ने उन्हें खंडहर तक पहुंचाया। अंदर पत्थर बने राजकुमार देवराज को देखकर मानसिंह स्तब्ध रह गए।
तभी पक्षी रंग-बिरंगी किरणों में बदलकर एक युवक में परिवर्तित हो गया। मानसिंह की सांस रुक गई।
“रोहन! तुम जीवित हो?” मानसिंह चिल्लाए।
रोहन की आंखों में आंसू थे। उसने बताया, “हां मित्र, तुमने तो मुझे मारकर छोड़ दिया था। जब हम दोनों पहली बार इस खंडहर में आए थे, तुम्हारे मन में लालच आ गया और तुमने मुझ पर तीर चला दिया। लेकिन यहां के राक्षस ने मुझे बचा लिया और मुझे शक्तियां दे दीं। मैं पक्षी बनकर यात्रियों को यहां आने से रोकता था, ताकि किसी राजपरिवार का व्यक्ति आए और श्रापित खजाने को छुए।”
मानसिंह के हाथ कांप उठे। “मुझे माफ कर दो मित्र! मुझे अपने पाप की सजा मिल गई। मेरी बेटी बीमार है। कृपया राजकुमार को ठीक कर दो।”
तभी महात्मा देवानंद प्रकट हुए। उन्होंने कहा, “यह तुम्हारी गलती नहीं थी मानसिंह। जो भी इस खंडहर में प्रवेश करता है, उसके मन में लालच आ जाता है। राक्षस ने रोहन का फायदा उठाया और उसके भीतर बदले की आग भड़काई।”
महात्मा ने मंत्र पढ़े। रोहन के शरीर से काला धुआं निकला और राक्षस प्रकट हुआ। महात्मा ने उसे जलाकर राख कर दिया। उसी क्षण राजकुमार देवराज सामान्य हो गए।
महात्मा ने खजाने को मिट्टी में बदल दिया। मानसिंह और रोहन ने एक-दूसरे को गले लगाया। दोनों की आंखों में पछतावा और क्षमा थी।
मानसिंह राजकुमार को राजमहल ले आए। राजा विक्रम ने प्रसन्न होकर एक लाख सोने के सिक्के दिए। मानसिंह ने रोहन को भी हिस्सा दिया और अपनी पुत्री प्रिया का इलाज करवाया। प्रिया पूरी तरह स्वस्थ हो गई।
“लालच का अंत विनाश है। मित्रता और क्षमा से बड़ा कोई धन नहीं।”
सच्ची मित्रता, क्षमा और संतोष ही जीवन का असली खजाना है। लालच इंसान को राक्षस बना देता है, लेकिन प्रेम और क्षमा उसे फिर से इंसान बना सकते हैं।

