बहुत समय पहले की बात है, घने जंगल में चीतल नाम का एक सुंदर हिरण रहता था। उसके सींग चमकीले थे और उसकी आँखें बहुत मासूम थीं। चीतल का सबसे अच्छा दोस्त था काली नाम का एक चतुर कौवा। दोनों की दोस्ती बचपन से थी। वे साथ खेलते, साथ खाना खाते और एक-दूसरे की हर मुसीबत में मदद करते थे।
एक सुबह की बात है, जब सूरज की किरणें अभी-अभी पेड़ों के बीच से झांक रही थीं। चीतल जंगल में घास चरने के लिए निकला। वह अपने पसंदीदा स्थान की ओर जा रहा था जहाँ मीठी हरी घास उगती थी। लेकिन उसे क्या पता था कि शिकारी ने वहां जाल बिछा रखा था।
जैसे ही चीतल उस जगह पर पहुंचा, उसका पैर जाल में फंस गया। वह जितना जोर लगाता, जाल उतना ही कसता जाता। चीतल घबरा गया और जोर-जोर से चिल्लाने लगा। उसकी आवाज सुनकर काली कौवा तुरंत वहां पहुंचा।
“अरे चीतल! यह क्या हो गया?” काली ने चिंतित होकर पूछा।
“काली भाई, मैं इस जाल में फंस गया हूँ। शिकारी कभी भी आ सकता है। कृपया मेरी मदद करो!” चीतल ने डरते हुए कहा।
काली ने तुरंत सोचना शुरू किया। वह जानता था कि अकेले वह जाल नहीं तोड़ सकता। उसे किसी और की मदद चाहिए थी। तभी उसे अपने दोस्त खरगोश, जिसका नाम फुर्ती था, की याद आई।
काली तेजी से उड़ा और पास की झाड़ियों में रहने वाले फुर्ती को ढूंढने लगा। कुछ ही देर में उसे फुर्ती मिल गया। काली ने सारी बात बताई।
“चलो, जल्दी करो! हमें चीतल को बचाना है,” फुर्ती ने फौरन कहा।
दोनों दोस्त वापस आए। इतने में दूर से शिकारी आता दिखाई दिया। वह अपने हाथ में लाठी और बोरा लेकर आ रहा था। चीतल को देखकर शिकारी की आँखें चमक उठीं।
“आज तो बड़ा शिकार मिलेगा!” शिकारी खुशी से बोला।
तभी काली और फुर्ती ने अपनी योजना पर अमल करना शुरू किया। फुर्ती ने शिकारी के रास्ते में जाकर एकदम से मरने का नाटक कर दिया। वह जमीन पर गिर गया और बिल्कुल हिलना-डुलना बंद कर दिया।
शिकारी चीतल के पास जा रहा था, लेकिन रास्ते में पड़े खरगोश को देखकर रुक गया।
“अरे! यह तो खरगोश पड़ा है। पहले इसे उठा लूं,” शिकारी ने सोचा और चीतल की तरफ से मुड़कर फुर्ती की ओर बढ़ने लगा।
जैसे ही शिकारी फुर्ती के पास झुका, काली ने जोर-जोर से “कांव-कांव” की आवाज लगाई और शिकारी के सिर के ऊपर मंडराने लगा। शिकारी का ध्यान पूरी तरह बंट गया।
इसी बीच फुर्ती तेजी से उछला और झाड़ियों में छिप गया। शिकारी हैरान रह गया। “यह क्या! खरगोश तो जिंदा था!” वह चिल्लाया।
शिकारी खरगोश के पीछे भागने लगा। इतने में काली ने अपनी तीखी चोंच से जाल की रस्सी काटने की कोशिश की। चीतल ने भी पूरी ताकत लगाई। आखिरकार जाल कमजोर हो गया और चीतल ने एक जोरदार झटके से खुद को आजाद कर लिया।
“भागो चीतल, भागो!” काली चिल्लाया।
चीतल तेजी से भागा और जंगल की गहराई में चला गया। फुर्ती भी अपने बिल में छिप गया। जब शिकारी वापस आया तो उसे न तो हिरण मिला, न खरगोश और न ही कुछ हाथ लगा। वह निराश होकर वापस चला गया।
शाम को तीनों दोस्त मिले। चीतल की आँखों में आंसू थे।
“आप दोनों ने मेरी जान बचाई। आप सच्चे दोस्त हो,” चीतल ने कहा।
“दोस्त मुसीबत में ही काम आते हैं,” काली ने मुस्कुराते हुए कहा।
उस दिन के बाद तीनों की दोस्ती और भी मजबूत हो गई।
“सच्चे दोस्त मुसीबत के समय साथ खड़े रहते हैं। एकता और सूझबूझ से हर मुश्किल को आसान बनाया जा सकता है। दोस्ती में त्याग और बुद्धिमानी का होना जरूरी है।”

