रात के बारह बज चुके थे। आसमान में बादल ऐसे घुमड़ रहे थे जैसे किसी ने काली रुई का पहाड़ उड़ेल दिया हो। बिजली कड़कती तो पूरा गाँव एक पल के लिए चमक उठता — और फिर अँधेरा, और भी गहरा।
उसी तूफानी रात में रघुनाथ दास के दरवाज़े पर एक गाड़ी रुकी।
रघुनाथ — उम्र कोई साठ के आसपास, झुर्रीदार चेहरा, आँखों में गाँव की हज़ार कहानियाँ — अपनी खाट से उठे और दरवाज़ा खोला। सामने एक शहरी अफ़सर खड़े थे। कोट-पैंट, हाथ में फ़ाइल, चेहरे पर थकान।
“रघुनाथ जी? मैं विक्रम सेन हूँ। मुंबई से तबादला होकर आया हूँ। ज़िले का नया डिप्टी कलेक्टर। आज ही आदेश मिला।”
रघुनाथ ने हाथ जोड़े। “साहब, आइए। लेकिन इस वक़्त? रात के बारह बजे? और यह बारिश…”
“सरकारी बँगला तैयार है ना? बस वहाँ पहुँचना है। परिवार गाड़ी में है — पत्नी और दो बेटियाँ।”
रघुनाथ ने आसमान की तरफ़ देखा। कुछ सोचा। फिर बोले — “साहब, बँगला नदी के किनारे है। रात को उधर… लेकिन आप कहते हैं तो चलिए। गाड़ी नदी के रास्ते से ले जाइए — दाहिने हाथ पर बँगला मिलेगा। मैं पीछे के कच्चे रास्ते से आता हूँ।”
“गाड़ी में क्यों नहीं बैठते?”
रघुनाथ ने सिर्फ़ मुस्कुराया और रात में निकल गए।
गाड़ी नदी किनारे के रास्ते पर धीरे-धीरे बढ़ रही थी। बारिश तेज़ थी। विंडशील्ड पर पानी ऐसे गिर रहा था जैसे कोई ऊपर से बाल्टी उड़ेल रहा हो।
तभी पिछली सीट पर बैठी बड़ी बेटी काव्या ने खिड़की से बाहर झाँका।
“पापा… वो देखो। रघुनाथ काका!”
विक्रम सेन ने गर्दन घुमाई। सचमुच — नदी के एकदम किनारे, अँधेरे में एक आकृति चल रही थी। छाता था हाथ में। वही चाल, वही कद।
“अरे! तो यह बोल रहे थे गाड़ी में नहीं बैठूँगा — और नदी किनारे से ही आ रहे हैं!” ड्राइवर ने कहा।
“लेकिन यह इतनी जल्दी आगे कैसे निकल गए?” छोटी बेटी रिया ने हैरानी से कहा।
कोई जवाब नहीं था।
बँगले पर पहुँचे तो रघुनाथ पहले से वहाँ खड़े थे — पीछे के रास्ते से आए थे, साफ़ कह दिया। काव्या ने पूछा कि नदी किनारे तुम्हें देखा — तो रघुनाथ का चेहरा पल भर के लिए सख्त हो गया।
“मैं उधर गया ही नहीं था।”
सन्नाटा।
“अंधेरे में गलतफ़हमी हुई होगी।”
बँगला सरकारी था लेकिन पुराना — ऊँची छत, लकड़ी के दरवाज़े, बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ। काव्या के कमरे की खिड़की सीधे नदी की तरफ़ खुलती थी।
रात को चाय पीते-पीते रघुनाथ ने एक बात और कही —
“बँगले से नदी का नज़ारा बहुत सुंदर लगता है। लेकिन उधर मत देखिएगा।”
“क्यों?” काव्या ने पूछा।
“बारिश का मौसम है। मिट्टी गीली है। फिसलन है। पानी बहुत है।” रघुनाथ ने नज़रें नीची कर लीं।
लेकिन उनकी आँखों में जो था — वो सिर्फ़ फिसलन का डर नहीं था।
रात को काव्या सो नहीं पाई।
खिड़की के पार नदी थी — रिमझिम बारिश में काँपती, चमकती। और उस काँपते पानी में काव्या को कुछ दिख रहा था… या शायद सिर्फ़ मन का वहम था।
सुबह उठी तो बँगले के दरवाज़े से नदी तक मिट्टी पर पैरों के निशान थे। लेकिन निशान आने के थे — जाने के नहीं।
नदी से बँगले की तरफ़।
रघुनाथ ने ज़मीन पर झुककर देखा। उनका चेहरा पीला पड़ गया।
“यह निशान उल्टे हैं।”
विक्रम सेन की पत्नी प्रभा ने घबराकर पूछा — “मतलब?”
“मतलब…” रघुनाथ रुके। फिर धीरे से बोले — “जिसके पैर उल्टे हों, उसके कदमों के निशान ऐसे ही बनते हैं।”
रिया की चीख निकलते-निकलते रुकी। प्रभा ने उसे अपने से लिपटा लिया।
“बेकार की बातें मत करो रघुनाथ जी। बच्चियाँ हैं। जाइए — बाज़ार से कुछ खाने का सामान ले आइए।”
अगले दिन काव्या बाज़ार गई — मछली और मिठाई लाने।
जाते वक़्त नदी किनारे उसे एक लड़की दिखी।
काली लंबी चोटी। बड़ी-बड़ी काजल भरी आँखें। गोरा चेहरा जिस पर एक अजीब सी मुस्कान थी — न खुशी की, न दुख की। बस… रहस्यमयी।
“तुम यहीं रहती हो?” काव्या ने पूछा।
लड़की ने सिर हिलाया — हाँ।
“कल मिलोगी? साथ खेलेंगे।”
तभी रिया की आवाज़ आई — “काव्या! उधर क्या कर रही है? जल्दी आ!”
काव्या ने मुड़कर देखा — लड़की ग़ायब थी।
पानी में एक भँवर था — और बस।
शाम को काव्या लौट रही थी। बाज़ार से मछली का थैला हाथ में था।
नदी के पास पहुँचते ही पानी में हलचल हुई। एक तेज़ सड़न की बू आई — जैसे हफ्तों से पड़ी सड़ी मछली। काव्या ने कदम तेज़ किए।
परछाईं।
उसके साथ-साथ चल रही थी — लेकिन कोई नज़र नहीं आ रहा था।
पेड़ से एक मोटी डाली अचानक टूटकर रास्ते में आ गिरी।
और फिर — वो आवाज़।
पहले धीरे। फिर और धीरे। फिर सीधे कान में —
“मुझे मछली दे दो।”
काव्या दौड़ पड़ी।
“तू मछली नहीं देगी?”
अब आवाज़ में गुस्सा था — और कुछ और भी। एक खिंचाव। जैसे नदी का पानी किसी को अपनी तरफ़ खींचता है।
काव्या ने दरवाज़ा पीटा। रिया ने खोला। काव्या अंदर गिर पड़ी।
रात को प्रभा को रसोई से आवाज़ सुनाई दी।
वो उठीं। धीरे से रसोई की तरफ़ गईं।
दरवाज़ा खोला।
काव्या वहाँ थी — लेकिन यह काव्या नहीं थी।
हाथ में कच्ची मछली थी। आधी खाई जा चुकी थी। कपड़ों पर खून के धब्बे। मुँह पर वही अजीब मुस्कान — न खुशी की, न दुख की।
“काव्या…!” प्रभा की आवाज़ काँपी।
काव्या ने सिर उठाया। उसकी आँखें — काजल से भरी, बड़ी-बड़ी — किसी और की आँखें लग रही थीं।
“भूख लगी थी। उसने मुझे मछली खिलाई।”
“कौन? किसने?”
काव्या मुस्कुराई — वही मुस्कान।
“अब मैं उसके साथ रहूँगी।”
खिड़की के बाहर नदी में — बिना किसी हवा के — एक लहर उठी।
और कहीं दूर से, पानी के नीचे से — हँसी की आवाज़ आई।
रघुनाथ सुबह आए। बँगले का दरवाज़ा खुला था। अंदर कोई नहीं था।
सिर्फ़ नदी किनारे तक जाते पैरों के निशान थे।
और वापस आने के — कोई नहीं।

