रात के दो बजे थे। नीलम की नींद अचानक टूटी — नहीं, नींद नहीं, वो तो कहीं और थी। एक काली रात में, किसी अजनबी गली में, जहाँ ज़मीन से खुदाई की आवाज़ें आ रही थीं जैसे कोई कब्र खोद रहा हो।
उसने देखा — सफेद कफन में लिपटी एक आकृति, न जीवित, न मृत। बस खड़ी, उसे घूरती हुई।
नीलम भागी। गेट की तरफ। लेकिन तभी एक बच्ची की आवाज़ — “मम्मा… मैं यहाँ हूँ, मम्मा…”
वो रुकी। उस आवाज़ ने उसके पाँव जकड़ लिए। आगे बढ़ी तो देखा — एक खुली कब्र। उसने अंदर झाँका… एक ताबूत… और फिर उस ताबूत के अंदर से एक हाथ निकला और—
“नीलम! नीलम, क्या हुआ?!”
विराज ने उसे झकझोरा। नीलम की साँसें उखड़ी हुई थीं।
“बुरा सपना था,” उसने कहा, हथेली से माथा पोंछते हुए।
वो तीनों — नीलम, विराज, और उनकी नौ साल की बेटी पायल — गाड़ी में थे। रात का सफर। पायल पीछे की सीट पर अपनी गुड़िया “छुनमुन” को सीने से लगाए सो रही थी।
विराज ने नीलम को शांत किया। उसने बॉस को मैसेज किया — कुछ दिन की छुट्टी चाहिए। बॉस मान गया।
वो जा रहे थे “बाँसपुर गाँव” — नीलम की माँ सावित्री माँ के पास।
शाम ढले वो गाँव पहुँचे। सावित्री माँ का घर पुराना था, बरसों का। गेट पर दस्तक दी, कोई जवाब नहीं। अंदर गए — अँधेरा। लिविंग रूम में एक झूलती कुर्सी पर सावित्री माँ बैठी थीं, आँखें बंद।
नीलम ने लाइट जलाई।
“अरे बाप रे!” सावित्री माँ उछल पड़ीं। फिर हँसीं। “सो गई थी, माफ करना।”
पायल दौड़कर नानी से लिपट गई। छुनमुन को आगे करते हुए बोली — “नानी, इससे मिलो!”
रात को खाने की मेज़ पर बातें हुईं। नीलम का काम, विराज की ठेकेदारी। सावित्री माँ ने कहा — “थक गए होंगे, आराम करो।”
रात के बारह बजे, सावित्री माँ उठीं — पायल उनके पास नहीं थी। ढूँढा तो बगल के कमरे में थी, छुनमुन से फुसफुसाकर बातें कर रही थी।
अँधेरे में। अकेले।
अगली सुबह विराज और नीलम बाज़ार गए। रास्ते में उस्ताद रहीम मिले — गाँव के क़ब्रिस्तान की देखभाल करने वाले, जनाज़ों के काम आने वाले। नीलम ने गाड़ी रोकी, थोड़ी देर बात की।
रहीम कुछ बोलना चाहते थे — लेकिन रुक गए।
बाज़ार में बचपन की सहेली सुमन मिली। उसकी दुकान थी। उसकी बेटी रिया भी वहीं थी। एक नौ महीने की प्रेगनेंट औरत भी खरीदारी कर रही थी।
हँसी-ठिठोली हुई। पुरानी यादें ताज़ा हुईं।
उसी शाम नीलम और पायल जंगल गईं घूमने। पायल उछलती-कूदती चल रही थी। नीलम गाना गुनगुना रही थी।
तभी ऑफिस का फोन आ गया।
नीलम बात में लग गई। पायल धीरे-धीरे दूर होती गई।
जब नीलम ने देखा — पायल कहीं नहीं थी।
“पायल! पायल!!” जंगल में उसकी आवाज़ें गूँजीं। कोई जवाब नहीं।
तालाब के किनारे पहुँची। छुनमुन गुड़िया पड़ी थी — किनारे पर। पानी में।
और कुछ दूर…
पायल।
पानी पर तैरती हुई।
नीलम का दिल फट गया।
घर में मातम छा गया। सावित्री माँ ने कहा — “जल्दी दफन करना होगा।” विराज गाड़ी में जाकर फूट-फूट कर रोया। नीलम पायल के पास बैठी थी, खुद को कोसते हुए।
रहीम जनाज़े की तैयारी कर रहे थे — तभी उन्हें लगा… पायल मुस्करा रही है। सीधे उनकी तरफ देखकर।
रहीम काँप गए। लेकिन काम पूरा किया।
पायल को बाँसपुर गाँव की मिट्टी में दफन कर दिया गया।
विराज और नीलम शहर लौट गए। घर पहुँचे तो पायल का कमरा खाली था। उसकी फ़ोटो देखकर विराज टूट गया।
“तुम्हें उस कॉल की इतनी ज़रूरत थी?! अपनी बेटी से ज़्यादा?!” वो चिल्लाया।
नीलम चुप रही।
अगली सुबह वो साइकोलॉजिस्ट के पास गई। डॉक्टर ने कहा — एक-दूसरे को दोष मत दो। साथ मिलकर उभरो।
घर आई तो विराज के हाथ में छुनमुन थी।
“यह यहाँ कैसे आई? हमने तो इसे क़ब्र पर छोड़ा था।”
नीलम ने छुआ गुड़िया को। ठंडी थी।
बाँसपुर में रहीम ने देखा — पायल की क़ब्र खुदी हुई थी। मिट्टी हटी हुई।
पायल अंदर नहीं थी।
उसी रात — सुमन के घर में…
रिया बिस्तर पर बैठी थी, कंबल ओढ़े। सुमन ने पूछा — “क्या हुआ?”
रिया ने चुप रहने का इशारा किया। फिर बिस्तर के नीचे की तरफ इशारा।
सुमन ने झुककर देखा — रिया ख़ुद बिस्तर के नीचे थी। डरी हुई।
“ऊपर… वो है… मम्मा…”
सुमन ने ऊपर देखा —
वो पायल थी। लेकिन पायल नहीं थी।
नीलम को रात में सपना आया। तालाब। पायल की आवाज़ — “मम्मा, आ जाओ… मुझे बचाओ…”
नीलम पानी में उतरने लगी। कुछ ने खींचा।
वो चीखकर उठी।
कपड़े गीले थे।
“विराज… पायल वापस आ गई है। लेकिन वो अकेली नहीं है। हमें जाना होगा।”
दोनों फिर बाँसपुर पहुँचे। रास्ते में उस प्रेगनेंट औरत का जनाज़ा निकल रहा था।
नीलम का दिल डूब गया।
रहीम मिले। क़ब्र दिखाई।
सावित्री माँ ने रोका। कमरे में बैठाया। और बोलीं —
“मुझे सब बताना है।”
वो बात जो सब बदल देती है:
सावित्री माँ ने सुनाया अपना बचपन।
“मैं सात साल की थी। रात को पूरा गाँव दरवाज़े पर आया था — मशालें लेकर। चिल्लाते हुए। मेरी नानी को — “डायन! काला जादूगरनी!” — बुला रहे थे।”
“नानी बाहर निकलीं। कहा — मैंने कुछ नहीं किया। लेकिन तुम मानते नहीं, तो मार दो मुझे। पर एक श्राप सुन लो।”
“जो भी मेरी रक्त की कोई भी इस गाँव की मिट्टी में दफन होगी — वो कभी नहीं मरेगी। वो लौटेगी। और तुम सबका हिसाब माँगेगी।”
और फिर नानी ने खुद को खत्म कर लिया — गाँव वालों के सामने।
श्राप सच हो गया था।
पायल इस गाँव की मिट्टी में दफन हुई थी। उसके शरीर में एक दानवी आत्मा घुस आई। वो नानी के श्राप का हथियार बन गई। गाँव से बदला लेने के लिए।
रहीम ने रास्ता बताया — “पायल को गाँव की सीमा के बाहर दफनाना होगा। तभी श्राप टूटेगा।”
नीलम घर पर रुकी। विराज और रहीम पायल को ढूँढने निकले।
लेकिन पायल नीलम के पास आ गई।
“मम्मा…”
नीलम ने आवाज़ पहचानी। उठी। छुनमुन लेकर क़ब्र की तरफ चल दी।
क़ब्र के पास पहुँची। ताबूत खुला था। आवाज़ें आ रही थीं।
तभी पीछे से — हवा का झोंका।
मुड़कर देखा — पायल खड़ी थी।
नीलम दौड़ी उसकी तरफ—
ताबूत से एक काली आकृति निकली। उसका गला दबाने लगी।
“पायल… मैं तुम्हारी माँ हूँ…”
लेकिन वो पायल नहीं थी।
छुनमुन हाथ से गिर गई।
दानवी पायल रुकी। गुड़िया को देखा।
उस गुड़िया से उसका रिश्ता था — जो मौत के बाद भी नहीं टूटा था।
विराज आया। रहीम आए। सावित्री माँ भी।
रहीम ने कुरान की आयतें पढ़ीं। हाथ पायल के सर पर रखा।
धुआँ उठा।
पायल गिर पड़ी।
श्राप टूट गया था। आत्मा चली गई थी।
और पायल… पायल भी।
सब मिलकर रोए। फिर उठे।
इस बार पायल को गाँव की सीमा के बाहर दफनाया गया। उसकी क़ब्र पर छुनमुन रखी गई।
नीलम ने विराज का हाथ थामा।
दोनों निकल पड़े।
पायल की आत्मा को शांति मिल गई थी।
और बाँसपुर की मिट्टी — अब साफ थी।

