रात के बारह बज रहे थे। दिल्ली का शोर धीरे-धीरे थम रहा था लेकिन आर्यन के दिल का शोर अभी भी जारी था। वो एक छोटे से कमरे में बैठा था, लैपटॉप की स्क्रीन उसके चेहरे पर नीली रोशनी फेंक रही थी। नौकरी के लिए आज भी कोई जवाब नहीं आया था। लेकिन आर्यन को इस वक्त नौकरी से ज़्यादा एक चीज़ की फ़िक्र थी — रिया। वो लड़की जिसके बिना उसकी सांसें भी अधूरी लगती थीं।
उधर रिया अपने कमरे में तकिया सीने से लगाए आर्यन से फोन पर बात कर रही थी। उसके कानों में ईयरफोन था और उसकी पालतू बिल्ली मिट्टू दूर बैठकर उसे देख रही थी।
“आर्यन, इतना नेगेटिव मत सोचो। नौकरी मिलेगी। और अगर नहीं भी मिली तो क्या? मैं तुमसे ही शादी करूंगी।”
“रिया, बेरोज़गार को कौन अपनी बेटी देगा?”
“देखो, नौकरी एक टेम्पोरेरी चीज़ है। उसके लिए ज़िंदगी की परमानेंट खुशी नहीं छोड़ते। अब चुप करो और फोन पर किस दो।”
आर्यन हंस पड़ा। लेकिन उसी पल रिया की नज़र खिड़की पर पड़ी। बाहर अंधेरे में एक साया था। बाल हवा में लहरा रहे थे। रिया ने ईयरफोन निकाला और खिड़की के पास गई। बाहर झांका तो एक बेहद खूबसूरत औरत उल्टी लटकी हुई थी — आंखें खुली, बाल नीचे झूलते हुए, चेहरे पर एक भयानक मुस्कान।
रिया चीख पड़ी। लेकिन उसी पल वो औरत गायब हो गई।
फिर घर के अंदर से एक गुर्राने की आवाज़ आई — जानवर जैसी, भयानक। रिया मुड़ी तो जो देखा, उसकी आत्मा कांप गई। वही औरत उसके बिस्तर पर बैठी थी और मिट्टू को… खा रही थी। रिया की आवाज़ उसके गले में ही घुट गई।
सात दिन बाद रिया अस्पताल के ICU में जिंदा लाश बनी पड़ी थी। आंखें खुली थीं लेकिन देख नहीं रही थीं। आर्यन हर रोज़ अस्पताल आता। चुपचाप ICU के बाहर से झांकता। रिया के पिता अगर देख लेते तो बवाल हो जाता, इसलिए वो छिपकर आता।
एक रात आर्यन अस्पताल के कैंपस में बेचैनी से टहल रहा था। आसमान को देख रहा था। आंखें भीगी हुई थीं। तभी किसी ने कहा —
“एक्सक्यूज़ मी।”
आर्यन ने ध्यान नहीं दिया।
“एक्सक्यूज़ मी!” — इस बार आवाज़ तेज़ थी।
आर्यन ने मुड़कर देखा। एक लड़की खड़ी थी। काले बाल, गहरी आंखें, सफेद डॉक्टरी कोट। चेहरे पर अजीब शांति।
“मैं आठ दिनों से आपको देख रही हूं। कपड़े नहीं बदले। खाना नहीं खाया। कौन एडमिट है?”
“जिंदगी।” — आर्यन ने कहा।
“जिंदगी?”
“हां। मेरी रिया। मेरी सब कुछ। वो नदी जैसी थी — बहती थी, हंसती थी। और अब उसे मशीनों के बीच देखना…” आर्यन फूट-फूट कर रो पड़ा।
लड़की ने धीरे से कहा — “टेंशन मत लो। मैं हूं ना।”
“तुम… तुम क्या करोगी?”
“मैं ही तो रिया की ट्रीटमेंट कर रही हूं।”
आर्यन चौंक गया। “आपको तो मैंने पहले कभी नहीं देखा।”
“तुम खुद छिपकर देखते हो, मुझे कैसे देखते? मेरा नाम है — डॉक्टर चुड़ैला।”
नाम अजीब था। लेकिन आर्यन को नाम से क्या मतलब? उसे तो बस रिया चाहिए थी।
तीन दिन बाद। रात के दो बजे। डॉक्टर चुड़ैला आर्यन के पास दौड़ती हुई आई। उसकी आंखों में चमक थी।
“आर्यन! रिया ने आज पंद्रह दिनों में पहली बार पलकें झपकाईं!”
आर्यन की आंखें फिर भर आईं। लेकिन इस बार खुशी के आंसू थे।
“डॉक्टर चुड़ैला… आपका एहसान कभी नहीं चुका पाऊंगा।”
“बस शादी में बुलाना मत भूलना।” — चुड़ैला ने मुस्कुराते हुए कहा।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
उसी रात, जब अस्पताल में सन्नाटा था — ICU में एक परछाईं उतरी। वही औरत। खिलखिलाते हुए बेड के नीचे से निकली। उसने ऊपर देखा। CCTV कैमरे एक-एक करके बंद होते गए। फिर वो रिया के पास खड़ी हो गई। लंबे समय तक घूरती रही।
और फिर उसने रिया के हाथ की drip निकाल दी।
खून की धार फर्श पर गिरने लगी।
रिया तड़पने लगी।
श्मशान घाट में लपटें ऊंची उठ रही थीं। आर्यन दूर खड़ा था। उसकी आंखें सूनी थीं। वो खुद भी उन लपटों में उतर जाना चाहता था। उसे याद आया पहली मुलाकात का वो दिन।
“इतनी देर से क्यों आए? दस मिनट से वेट कर रही हूं।”
“सॉरी मैम, ट्रैफिक था।”
“झूठे!”
“मैम, इसी कमाई से रोटी चलती है — झूठ क्यों बोलूंगा?”
“अच्छा ठीक है। ओटीपी लो।”
उसने ओटीपी बताई थी। और आर्यन ने अपनी बाइक पर बिठाकर उसे उसकी मंजिल तक पहुंचाया था।
उस दिन वो सिर्फ एक Rapido राइड थी। लेकिन वो राइड ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत शुरुआत बन गई थी।
अब रिया जा चुकी थी।
लेकिन जो नहीं गया — वो था एक सवाल।
वो औरत कौन थी? वो चाहती क्या थी?
और डॉक्टर चुड़ैला… क्या वो सच में एक डॉक्टर थी?
या कुछ और?

