पूर्णिमा की रात। जंगल के बीच से गुजरता सीधा हाईवे हल्की नीली चांदनी में नहाया हुआ था। उस सुनसान सड़क पर एक रॉयल एनफील्ड फटफटाती हुई दौड़ रही थी। हेडलाइट की पीली रोशनी आगे की सड़क को चीर रही थी। 40 वर्षीय विक्रम शर्मा बाइक चला रहे थे। उनके पीछे उनका 12 वर्षीय बेटा तुलसी उर्फ टुल्लू बैठा था।
“पापा, घर पहुंचने में कितना टाइम लगेगा?” टुल्लू ने पूछा, पर बाइक की तेज आवाज में आवाज़ डूब गई। उसने पापा के कंधे को दो बार थपथपाया।
विक्रम ने इंजन साइलेंट मोड में डाल दिया। एक ज़हरीला सन्नाटा चारों तरफ फैल गया। जंगल की उस रात की शांति टुल्लू की हड्डियों में उतरने लगी।
“क्या हुआ बेटा?” विक्रम ने साइड मिरर में देखते हुए पूछा।
“पापा… यह जंगल बहुत डरावना है। मम्मी ने क्यों कहा था इस सड़क पर बाइक मत रोकना?”
विक्रम हल्के से मुस्कुराए। “तुम्हारी मम्मी डरपोक हैं। उन्हें लगता है यहाँ काल का छलावा रहता है।”
“काल का छलावा?” टुल्लू की आँखें जिज्ञासा से चमकीं।
“हाँ बेटा। हमारी दुनिया से परे एक अंधेरी दुनिया है — तिमिर। वहाँ से कभी-कभी दरवाज़ा खुलता है और बुरी ताकतें धरती पर आ जाती हैं। 1945 में, इसी जंगल में ऐसा हुआ था। काल नाम का राक्षस आया था जो रात को राहगीरों को भ्रम दिखाता था। और सुनो — वो तुम्हारी उम्र के बच्चों को ज़्यादा डराता था क्योंकि डरे हुए बच्चे का कलेजा उसे सबसे ज़्यादा मीठा लगता है।”
टुल्लू के हाथ-पाँव काँपने लगे। तभी एक ज़ोरदार धमाके की आवाज़ आई। बाइक का टायर पंचर हो गया।
विक्रम ने मुश्किल से बाइक रोकी। तभी हवा में एक भयानक घड़ी की टन-टन गूँजी — बारह बार। दोनों ने दाईं तरफ देखा। लोहे की काली सलाखों वाला एक विशाल गेट था। सफेद अक्षरों में लिखा था — “कोहराम कब्रिस्तान”। अंदर कब्रों से सफेद कोहरा रिस रहा था। दूर एक चर्च की घड़ी आधी रात बजा रही थी।
“पापा… वहाँ…” टुल्लू की आवाज़ रुक गई। कब्रिस्तान में एक लड़का खड़ा था। बिल्कुल टुल्लू जैसा। वही हाफ शर्ट, वही नीली जींस। लेकिन उसकी त्वचा दूध जैसी सफेद थी। आँखों के नीचे काले घेरे। चेहरा एकदम भावहीन। जैसे कोई जीती-जागती लाश।
“पापा… मैं यहाँ हूँ तो वो कौन है?”
विक्रम कुछ पूछते, तभी टुल्लू ने वापस देखा — वो जगह खाली थी।
बाइक से उतरकर विक्रम टायर देखने लगे। टुल्लू पीछे अकेला खड़ा था। तभी उसके कंधे पर दो बार किसी ने थपथपाया। वो घबराकर पलटा — पीछे कुछ नहीं था। सिर्फ चाँदनी में नहाई सुनसान सड़क।
और जब उसने आगे देखा — पापा और बाइक दोनों गायब थे।
“पापाआआ!” टुल्लू चीख पड़ा।
दूर अंधेरे में उसे पापा दिखे। लेकिन कैसे पापा! शरीर बर्फ जैसा नीला। आँखें साँप जैसी हरी। कान खरगोश जैसे लंबे। नाखून चाँदी के। पैर उल्टे। वो हाथ हिलाकर टुल्लू को बुला रहे थे और उल्टे कदमों से पीछे जा रहे थे।
“पापा! रुको!” टुल्लू रोते हुए उस दिशा में दौड़ा।
और उसी पल — पापा और बाइक वापस प्रकट हो गए, जहाँ पहले थे। छलावे ने भ्रम का जाल बुन दिया था।
“नुनुउउ! कहाँ जा रहे हो?” विक्रम चिल्लाए।
लेकिन टुल्लू के दिमाग पर छलावे की जकड़ थी। उसे सामने बाइक पर एक नकली टुल्लू बैठा दिखा — गुलाबी चमकती आँखें, काले दाँत, खरगोश जैसे कान। बाइक आगे निकल गई।
“पापा! वो भूत है! उसे उतारो!”
विक्रम को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वो टुल्लू के पास दौड़े और उसे पकड़ लिया।
टुल्लू ने सामने देखा — पापा नहीं, छलावा था। काला शरीर, V-आकार का चेहरा, पीली चमकती आँखें, लाल धोती।
“पकड़ लिया! अब तुम्हारा कलेजा निकालकर खा जाऊँगा! डरे हुए बच्चे का कलेजा बड़ा मीठा होता है!” छलावा हँसा।
“नहीं! छोड़ो मुझे!” टुल्लू मारने लगा।
“नुनु! बेटा मैं हूँ! पापा हूँ!” विक्रम चिल्लाए पर आवाज़ टुल्लू तक नहीं पहुँची।
विक्रम ने पीछे मुड़कर देखा — उसके हाथ में एक चिपचिपा तरल था। सामने देखा तो दिल रुक गया। उसने जिसे पकड़ा था वो टुल्लू नहीं — एक तीन फुट का कंकाल था, जिस पर टुल्लू के कपड़े थे। खोपड़ी का जबड़ा भयानक हँसी हँस रहा था।
घबराहट में विक्रम पीछे हटे। सड़क किनारे लकड़ी का एक मोटा टुकड़ा पड़ा था। उन्होंने उठाया और उस आकृति के सिर पर पूरी ताकत से दे मारा।
“आआआ… मम्मी!”
विक्रम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
सड़क पर खून की नदी बह रही थी। फटी हुई खोपड़ी। और टुल्लू — बड़ी-बड़ी बेजान आँखों से पापा को देख रहा था।
“हे भगवान… मैंने अपने बेटे को मार डाला।”
विक्रम फूट-फूटकर रोने लगे।
तीस मिनट बाद — एंबुलेंस, पुलिस जीप। दो अफसर — इंस्पेक्टर भरवा और कांस्टेबल आंडू।
“भरवा सर, वही जगह, बस वक्त अलग है। जरूर छलावे ने करवाया है।”
“हाँ। जल्दी चलो, रात बहुत हो गई। कहीं अगला नंबर हमारा न लगे।”
जीप चली। विक्रम पीछे बैठे थे। तभी कोहरे में टुल्लू की आवाज़ आई।
“पापा… आओ ना। मुझे अकेला अच्छा नहीं लगता।”
“बेटा! आ रहा हूँ!” विक्रम ने जीप का दरवाज़ा खोला और कूद गए।
घाटी। गहरी, काली, अतल।
जीप पहाड़ी रास्ते पर थी। विक्रम सड़क पर नहीं — घाटी के अंधेरे में कूदे थे।
और वहाँ — काल का छलावा खड़ा था। कंधे उचकाते हुए ज़ोर-ज़ोर से हँस रहा था।
“छल… छल… छलावा…”

