होली का त्यौहार नजदीक था, लेकिन सूरजपुर गाँव में खुशी की जगह एक गहरा डर पसरा हुआ था। बुजुर्ग औरतें एक-दूसरे को चेतावनी दे रही थीं — “जितनी भी नई नवेली दुल्हनें हैं, उन्हें होली से पहले मायके भेज दो। वरना अनर्थ हो जाएगा।”
मेघा अपनी माँ सुमित्रा के साथ रसोई में बैठी थी। उसके लिए भी एक रिश्ता आया था, लेकिन माँ ने साफ़ कह दिया — “होली के बाद देखेंगे। अभी शादी का नाम लेना भी मौत को दावत देना है।”
पूरे गाँव में एक-एक नई दुल्हन को मायके भेजा जा रहा था। उसी शाम मेघा को उसकी सहेली काजल का फ़ोन आया। “कितने दिनों बाद याद आई मेरी? एक सरप्राइज़ है तेरे लिए — जल्द ही मिलेगा!” बात बीच में ही कट गई। काजल के फ़ोन की बैटरी खत्म हो गई थी।
होली से ठीक एक दिन पहले, रात के आठ बजे मेघा के घर की डोरबेल बजी। दरवाज़ा खुला तो सामने काजल खड़ी थी — मांग में सिंदूर, हाथों में लाल चूड़ा — और साथ में उनका कॉलेज दोस्त विक्रम। काजल खुशी से बोली — “लग गया ना झटका? मैंने और विक्रम ने शादी कर ली! पहली होली तेरे साथ मनाने आई हूँ!”
मेघा का चेहरा पीला पड़ गया। उसने काँपती आवाज़ में कहा — “तूने यह क्या किया? यहाँ नहीं आना चाहिए था तुझे। अगर पहले बता देती तो मैं कभी आने नहीं देती।”
काजल और विक्रम हक्का-बक्का थे। सुमित्रा और पिता रामशरण ने दोनों को अंदर बुलाकर सच बताया — “इस गाँव में कोई भी नई दुल्हन होली नहीं मना सकती। वो प्रेत आत्मा… वो रूपा… उसे नहीं छोड़ती।”
विक्रम को यकीन नहीं आया, पर दोनों जाने को राज़ी हो गए। गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हुई। मैकेनिक ने रात में आने से मना कर दिया। मजबूरन दोनों को वहीं रुकना पड़ा।
आधी रात को विक्रम की नींद टूटी — पायल की छनछन की आवाज़ से। पलटा तो काजल वहाँ थी ही नहीं। खिड़की से झाँका — काजल नंगे पाँव एक पुराने बरगद की तरफ़ चली जा रही थी, जैसे किसी ने खींचा हो।
“काजल! रुको!” विक्रम खिड़की से कूदा। जब उसने काजल का कंधा पकड़ा, वो पलटी — लेकिन उसका चेहरा देखकर विक्रम ठंडा पड़ गया। आँखें एक जगह जमी हुईं, चेहरे पर एक भयानक मुस्कान। एक भारी, पराई आवाज़ में बोली — “बच नहीं पाओगे। इस गाँव में कोई नई दुल्हन होली नहीं मनाएगी। सिर्फ खून की होली होगी।”
विक्रम वहीं बेहोश हो गया।
सुबह जब होश आया, मेघा और गाँव वाले उसके पास खड़े थे। विक्रम चीखा — “काजल कहाँ है?” तभी एक कमरे से ज़ोर की आवाज़ आई। दरवाज़ा खुला — काजल रस्सियों से बंधी थी, उसने अपने नाखूनों से चेहरा नोच-नोचकर लहूलुहान कर लिया था।
“मार डालूँगी! किसी भी नई दुल्हन को बर्दाश्त नहीं करूँगी!” काजल ने एक झटके में रस्सियाँ तोड़ दीं और दीवार पर उल्टा चढ़ने लगी — जैसे कोई इंसान नहीं, कोई और हो।
मेघा हाथ जोड़कर रोई — “उसे छोड़ दो! वो यहाँ से चली जाएगी। उसे नहीं पता था!”
विक्रम घुटनों पर बैठ गया — “माफ़ कर दो। मेरी पत्नी को कुछ मत करो।” लेकिन काजल के हाथ एक नुकीली चीज़ पर पड़ गए। एक भयानक हँसी के साथ… सब खत्म हो गया।
विक्रम टूट चुका था। रामशरण ने उसे गले लगाया और बोले — “बेटा, इसके पीछे रूपा की कहानी है।”
बरसों पहले इसी गाँव में रूपा नाम की खूबसूरत लड़की रहती थी। वो गाँव के अर्जुन से प्यार करती थी। दोनों होली के बाद शादी करने वाले थे। लेकिन गाँव का सूरज — जो मन ही मन रूपा को चाहता था — उसने उनके प्यार की बात रूपा के घर वालों तक पहुँचा दी। रूपा घर में बंद हो गई।
होली के दिन, जब रूपा अकेली बैठी थी, सूरज टोली लेकर आया। रूपा ने उसे थप्पड़ मार दिया। बदले में सूरज ने गुलाल में ज़हर मिलाया और पीछे से रूपा के चेहरे पर लगा दिया। रूपा बेहोश हो गई। सूरज ने उसे पानी के टब में धकेल दिया — और रूपा की जान चली गई। अपनी अधूरी इच्छाओं के साथ, अपने प्यार के साथ।
सूरज भी कुछ दिन बाद मरा। लेकिन रूपा की आत्मा नहीं गई। “हमने कितने पंडितों को बुलाया। पर जब तक रूपा खुद मुक्ति न चाहे — वो मुक्त नहीं होगी।”
होली बीती। गाँव फिर सामान्य हो गया। विक्रम अपनी काजल को खोने का दर्द लिए शहर लौट गया।
वो सरप्राइज़ — जो काजल खुशी-खुशी लेकर आई थी — उसकी ज़िंदगी की सबसे काली याद बन गई।
और सूरजपुर में… हर साल की तरह… होली का इंतज़ार फिर शुरू हो गया — डर के साथ।

