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चोरों का षड्यंत्र और दो मित्रों की चतुराई | Hindi Moral Story

Posted on December 21, 2025 by Kahani Ki Duniya

शिवपुर गाँव में धर्मवती नाम की एक वृद्ध महिला रहती थी। वह एक धर्मशाला चलाती थी जहाँ राहगीरों को भोजन और रहने की सुविधा मिलती थी। वह दयालु थी और भूखों को भोजन कराती थी।

एक दिन दो युवक अमित और विक्रम चंदनपुर से विजयनगर की ओर यात्रा कर रहे थे। वे नौकरी की तलाश में जा रहे थे। रास्ते में जंगल आने से पहले अमित बोला, “विक्रम, मैं बहुत थक गया हूँ। यहाँ रुकना खतरनाक है, जंगली जानवर हमला कर सकते हैं।”

विक्रम ने कहा, “हाँ भाई, पास के शिवपुर गाँव में धर्मवती की धर्मशाला है। वहाँ सुरक्षित रह सकते हैं।” थोड़ी और मेहनत करके दोनों मित्र शिवपुर पहुँचे।

धर्मवती ने उन्हें देखकर कहा, “बेटा, तुम बहुत थके लगते हो। आओ, भोजन करो।” उसने स्वादिष्ट खाना परोसा। अमित बोला, “माँ, यह भोजन तो मेरी माँ जैसा बना है।”

भोजन के बाद विक्रम ने कहा, “माँ, हमारे पास कुछ धन है। क्या आप इसे सुरक्षित रख सकती हैं?” धर्मवती ने मुस्कुराते हुए कहा, “बिल्कुल बेटा, सुबह तुम्हें लौटा दूँगी।”

सुबह धर्मवती ने उनके पाँच स्वर्ण मुद्राएँ लौटाईं। अमित ने कहा, “माँ, ये पाँच मुद्राएँ भोजन और आतिथ्य के लिए रखो।” धर्मवती ने आशीर्वाद दिया, “विजयनगर से लौटते समय फिर आना।”

दोनों मित्र विजयनगर की ओर चल दिए।

उसी रात तीन चोर रवि, मोहन और संजय ने राजा के भाई विजयवर्मा के घर डाका डालने की योजना बनाई। रवि बोला, “सावधान रहो, पकड़े गए तो मौत निश्चित है।” वे खजाना लूटने में सफल रहे।

पहरेदारों ने उन्हें देख लिया। “पकड़ो उन्हें!” चिल्लाहट सुनकर तीनों जंगल में भाग गए। रवि बोला, “यह बोरा भारी है। इसे पेड़ पर छुपा देते हैं।” उन्होंने लूट का माल छुपाया और भाग गए।

अगली सुबह वे वापस आए। मोहन ने कहा, “पहरेदार हमें खोज रहे होंगे। यह धन कहीं सुरक्षित रखना होगा।” संजय बोला, “शिवपुर में धर्मवती की धर्मशाला है। वहाँ रख देते हैं।”

रवि ने शर्त रखी, “लेकिन हम तीनों साथ ही लेने आएँगे। कोई अकेला धन नहीं ले सकता।” सभी सहमत हो गए।

शिवपुर पहुँचकर रवि ने धर्मवती से कहा, “माँ, हम व्यापारी हैं। तीन दिन बाद लौटेंगे। यह बोरा सुरक्षित रखो।” धर्मवती बोली, “बेटा, लेकिन एक शर्त है। मैं यह बोरा तभी लौटाऊँगी जब तुम तीनों साथ आओगे।”

“बिल्कुल माँ,” तीनों बोले और चले गए।

पंद्रह दिन बीत गए। धर्मवती सोचने लगी, “तीन दिन में आने वाले थे, पंद्रह दिन हो गए। इस बोरे में क्या होगा? लेकिन नहीं, दूसरों की चीज देखना गलत है।”

इधर अमित और विक्रम को राजदरबार में नौकरी मिल गई। विक्रम बोला, “दस दिन की छुट्टी है। गाँव चलें और धर्मवती माँ से भी मिलते चलें।” अमित खुशी से बोला, “हाँ भाई, उसका वादा याद है।”

उधर तीनों चोरों ने सोचा कि अब धन लेना सुरक्षित है। रवि बोला, “संजय, तू अकेला जा और धन ले आ। हम बाहर इंतजार करते हैं।”

संजय धर्मशाला पहुँचा। धर्मवती बोली, “बेटा, तुम अकेले हो। मैंने कहा था तीनों साथ आओ तभी बोरा मिलेगा।”

संजय चिल्लाया, “माँ, वे बाहर हैं! खिड़की से देख लो।” धर्मवती ने देखा, दोनों वाकई बाहर खड़े थे। उसने पूछा, “तुम दोनों, क्या मैं इसे बोरा दे दूँ?” रवि और मोहन बोले, “हाँ माँ, दे दो।”

धर्मवती ने बोरा दे दिया। संजय दूसरे दरवाजे से भाग निकला।

रवि और मोहन अंदर दौड़े आए। “बूढ़ी औरत, संजय कहाँ भागा? हमारा धन कहाँ है?”

धर्मवती घबरा गई, “मैंने तो तुम्हारी अनुमति से दिया था!”

“तूने धोखा किया है। चल, पंचायत में।” दोनों उसे घसीटकर ले गए।

उसी समय अमित और विक्रम गाँव पहुँचे। अमित बोला, “देखो, वो धर्मवती माँ है! पंचायत में क्यों?”

दोनों चिंतित होकर पंचायत के पास गए। सरपंच ने धर्मवती को फटकार लगाई, “तुमने शर्त तोड़ी। दो हजार स्वर्ण मुद्राएँ चुकाओ या दो साल जेल जाओ।”

अमित और विक्रम यह सुनकर क्रोधित हो गए। विक्रम आगे बढ़ा, “सरपंच जी, यह फैसला गलत है।”

सरपंच गरजा, “गलत? साबित करो नहीं तो तुम्हें सजा होगी!”

अमित बोला, “महोदय, धर्मवती माँ की उम्र ज्यादा है और स्मृति कमजोर है। बोरा अभी भी उनके पास है। वे भूल गई हैं।”

सरपंच ने पूछा, “तुम्हें कैसे पता?”

विक्रम बोला, “उन्होंने हमें बोरा दिखाया था इन तीनों के आने से पहले। हमसे कहा था कि तीनों को दे देना। हमने वह बोरा सुरक्षित रखा है।”

सरपंच बोला, “तो बोरा लौटा दो।”

अमित ने कहा, “जरूर, लेकिन शर्त के अनुसार। तीनों को साथ लाएँ, तब धर्मवती के हाथों बोरा मिलेगा।”

सरपंच मुस्कुराया, “शाबाश! बिल्कुल सही।” फिर उसने पूछा, “रुको, इस बोरे में है क्या? तुम लोग कौन हो?”

विक्रम ने साहस से कहा, “सरपंच जी, एक रात पहले राजा के भाई विजयवर्मा के यहाँ डाका पड़ा था। ये तीनों वही चोर हैं। तीसरा चोर धन लेकर भाग गया। अब ये बेचारी धर्मवती माँ को फँसा रहे हैं। आप इनसे पूछ लीजिए।”

सरपंच ने गुस्से से चोरों की ओर देखा। “सच है यह?”

दोनों चोरों के चेहरे पीले पड़ गए। वे काँपने लगे।

“इन्हें जेल में डालो! तीसरे को भी पकड़ो!” सरपंच ने आदेश दिया।

धर्मवती की आँखों में आँसू आ गए। “बेटा, तुम नहीं होते तो मैं जेल चली जाती। मैं तुम्हारी ऋणी हूँ।”

अमित मुस्कुराया, “माँ, जिस हाथ ने हमें खिलाया, उसे खतरे से बचाना हमारा कर्तव्य था।”

विक्रम हँसकर बोला, “अब बस, माँ। हम भूखे हैं। स्वादिष्ट खाना बनाओ!”

धर्मवती खुशी से बोली, “चलो, तुम्हारे लिए सबसे बढ़िया खाना बनाती हूँ।”

अमित और विक्रम ने अपनी बुद्धिमत्ता से एक निर्दोष बुजुर्ग महिला को बचा लिया। उन्होंने साबित किया कि दयालुता और बुद्धिमत्ता मिलकर किसी भी अन्याय को हरा सकते हैं।

“जो हमारी भलाई करे, उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। बुद्धिमत्ता और साहस से हर अन्याय को हराया जा सकता है।”

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Category: Bedtime Stories, Fairy Tales, Inspirational Stories, Magic & Fantasy, Moral Stories, Stories

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