दिसंबर की कड़ाके की ठंड थी। रामपुर गांव बर्फ की चादर में लिपटा हुआ था। इस खूबसूरत गांव में गरीबी और संघर्ष का बोझ उठाते लोग रहते थे।
विक्रम और अजय दो मजदूर दोस्त आग के पास बैठे सेठ गोपाल के बुलावे की बात कर रहे थे। ठंडी हवा में उनकी सांसें धुएं की तरह उड़ रही थीं।
“क्या लगता है सेठ क्यों बुला रहे होंगे?” विक्रम ने पूछा।
“चलो वहां जाकर पता चलेगा,” अजय ने जवाब दिया।
सेठ गोपाल के घर पहुंचकर उन्हें बुरी खबर मिली। “ठंड बढ़ रही है। कल से काम बंद। मैं शहर जा रहा हूं,” सेठ ने ठंडे लहजे में कहा।
“सेठ जी, आप ही तो हमारा सहारा हैं। हम गरीबों का क्या होगा?” विक्रम ने गिड़गिड़ाते हुए कहा।
सेठ चुप रहे। दोनों मजदूर उदास मन से घर लौट आए। विक्रम की पत्नी अनीता और दो छोटे बच्चे घर पर इंतजार कर रहे थे।
“क्या हुआ? आपका चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है?” अनीता ने पूछा।
“सेठ ने काम से निकाल दिया। अब घर कैसे चलेगा?” विक्रम की आवाज में बेबसी थी।
अनीता की आंखों में डर उतर आया। रोज की कमाई से ही उनका घर चलता था।
कुछ दिन बाद, विक्रम ने साहूकार राजेश से कर्ज लेकर अपने बंजर खेत में सब्जियां उगाने का फैसला किया।
“आप उससे कर्ज क्यों ले आए? यह अपनी मौत को न्योता देना है,” अनीता घबरा गई।
“और क्या करता? भूखे तो नहीं मर सकते,” विक्रम ने कहा।
एक महीने की मेहनत के बाद उनकी सूखी जमीन फिर हरी हो गई। लेकिन महीने के आखिरी दिन साहूकार राजेश सूद का पैसा लेने आ गया।
“कल पूरा पैसा चाहिए, नहीं तो तुम्हारी जमीन मेरी हो जाएगी,” राजेश ने धमकी दी।
अनीता ने कंबल के लिए बचाए हुए पैसे निकाले। “यह दे देंगे तो कंबल कहां से लाएंगे? गुड्डी की तबीयत बिगड़ती जा रही है।”
“सब्जियां बेचकर कंबल का इंतजाम कर लूंगा,” विक्रम ने फैसला लिया।
विक्रम ने साहूकार को पैसे दे दिए, लेकिन वह कम थे। “फसल के बाद बाकी दूंगा,” विक्रम ने वादा किया।
उसी रात जोरदार बारिश शुरू हो गई। चार दिन तक आसमान बरसता रहा। पूरा गांव घरों में कैद हो गया।
“हमारी सब्जियां खराब हो जाएंगी,” अनीता ने चिंता जताई।
“भगवान करे सब ठीक हो,” विक्रम ने कहा।
ठंड इतनी बढ़ गई थी कि एक कंबल से काम नहीं चल रहा था। सुनीता ने चूल्हा जलाया और सब उसके पास सिमट गए।
जब बारिश रुकी तो विक्रम खेत पर गया। सारी फसल बर्बाद हो चुकी थी। उसका सारा पसीना पानी में बह गया।
“सब खत्म हो गया। साहूकार के पैसे कहां से दूंगा?” विक्रम टूट गया।
अगले दिन साहूकार राजेश आया। “मेरे पैसे दो अभी के अभी।”
“माफ करें, फसल बर्बाद हो गई। थोड़ा समय दीजिए,” विक्रम ने हाथ जोड़े।
“मुझे बहाने नहीं चाहिए। आज से यह घर और खेत मेरे हुए। पैसे लेकर आना तो वापस ले लेना,” राजेश ने निर्दयता से कहा।
“इतनी ठंड में मैं परिवार को लेकर कहां जाऊंगा?” विक्रम रो पड़ा।
लेकिन साहूकार ने एक नहीं सुनी। विक्रम, अनीता और उनके बच्चे कड़ाके की ठंड में बेघर हो गए।
तेज बारिश फिर शुरू हो गई। विक्रम ने एक पुराने पेड़ के खोखले में रात बिताई। सुबह होते ही वे रहने की जगह ढूंढने निकले।
गांव के किनारे उन्हें एक पुरानी झोपड़ी मिली। वे अंदर चले गए और आग जला ली।
तभी झोपड़ी का मालिक बलराम काका आया। विक्रम ने उन्हें पूरी कहानी सुनाई।
“कितना बेदर्द इंसान है वह साहूकार। फिक्र मत करो बेटा, जितने दिन चाहो यहां रहो। गरीब का दर्द मैं समझता हूं,” बलराम काका ने दिल से कहा।
“हम आपका भी ख्याल रखेंगे काका,” विक्रम ने आभार जताया।
कई दिन बीते। धीरे-धीरे सूरज निकलने लगा। विक्रम ने बलराम काका के उपले बेचने का काम संभाल लिया। फिर उसे खेतों में मजदूरी मिल गई।
विक्रम की मेहनत रंग लाई। कई महीनों के संघर्ष के बाद उसने पैसे जमा किए और साहूकार से अपना घर और खेत वापस छुड़ा लिया।
जिस घर से रोते हुए निकला था, उसी में वह खुशी-खुशी वापस लौट आया। संघर्ष ने उसे सिखाया कि मेहनत और सच्ची नीयत कभी बेकार नहीं जाती।
मेहनत, ईमानदारी और सच्ची नीयत से किया गया संघर्ष कभी बेकार नहीं जाता। मुसीबत में भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और दूसरों की मदद करने से जीवन में सुख और शांति मिलती है।

