तारानगर राज्य में राजा विक्रम का शासन था। वहीं एक गांव में रहता था अर्जुन नाम का मोची, जो अपनी बीमार मां शांति के साथ रहता था।
एक दिन अर्जुन ने अपनी मां से कहा, “मां, आज मैं दवाई लेकर आऊंगा। चिंता मत करो।”
शांति ने कहा, “बेटा, तेरा काम तो चल नहीं रहा। पैसे कहां से लाएगा?”
अर्जुन दुकान पर बैठा। तभी एक व्यक्ति की चप्पल टूट गई। अर्जुन ने कहा, “मैं ठीक कर दूंगा।”
“नहीं भाई, नई ही ले लूंगा। अब मरम्मत करवाना तो गरीबी की निशानी है,” वह बोला और चला गया।
पूरे दिन सिर्फ दो ग्राहक आए। अर्जुन दवाई लेकर घर पहुंचा। घर में खाना नहीं था। तभी पड़ोसी दीनू ने बचा हुआ खाना फेंकते हुए कहा, “लो मोची, यही खा लो।”
अर्जुन चुपचाप खा गया, पर दिल टूट गया।
अगली सुबह बाजार में हलचल थी। व्यापारी गजराज चिल्ला रहा था, “आओ आओ! यह यंत्र जूते को पल में नया बना देता है। अब मोची की जरूरत नहीं!”
अर्जुन सन्न रह गया। उसने गजराज से विनती की, “यह मत करो, मेरा धंधा खत्म हो जाएगा।”
“तेरा धंधा? तू तो पहले भी कंगाल था। भाग यहां से!” गजराज ने धक्का दे दिया।
लोग हंसने लगे, “अब क्या करेगा यह? भीख मांगेगा!”
अर्जुन भारी मन से घर पहुंचा। मां ने पूछा, “क्या हुआ बेटा?”
“मां, मेरा काम खत्म हो गया। वह यंत्र सब बर्बाद कर देगा।”
शांति रो पड़ी, “हे भगवान, अब क्या होगा?”
तभी दीनू फिर आया और ताना मारा, “सुना? तेरा धंधा ही डूब गया! कितना मनहूस है!”
अगले दिन अर्जुन की बहन प्रिया और उसके पति आए। दहलीज पर रखी सुई उसके पति के पैर में चुभ गई। वह गिर गया और सिर फूट गया।
प्रिया चिल्लाई, “मनहूस! तेरे घर आते ही मेरे पति को चोट लगी। मैं यहां नहीं रुकूंगी!”
मां भी गुस्से में बोली, “हां, तू मनहूस है। तेरी वजह से मेरे दामाद को चोट लगी। अपनी शक्ल मत दिखा!”
अर्जुन पूरी तरह टूट गया। वह घर से निकल गया और जंगल में भटकता रहा। एक पुराने कुएं के पास पहुंचकर रोने लगा।
“हे भगवान, मुझे क्यों बनाया? क्यों है मेरी किस्मत ऐसी?”
तभी उसका पैर फिसला और वह कुएं में गिर गया। नीचे पानी में एक हरा मेंढक था।
अर्जुन बोला, “अब बस कर दे भगवान!”
तभी मेंढक बोला, “शांत हो जाओ। मैं एक श्रापित परी हूं। मुझे छू लो।”
अर्जुन ने डरते-डरते मेंढक को छुआ। एक चमक हुई और सुंदर परी प्रकट हो गई।
“तुमने मुझे मुक्त किया! मांगो, क्या चाहिए?”
“देवी, मुझे महल नहीं चाहिए। बस इतना चाहता हूं कि मां का इलाज कर सकूं और अपने काम से पैसे कमा सकूं।”
परी मुस्कुराई, “तुम सच्चे हो। आज से जिस जूते को तुम छुओगे, वह नया हो जाएगा। और एक ऐसा ग्राहक आएगा जो तुम्हारी किस्मत बदल देगा।”
अर्जुन खुशी से घर पहुंचा और मां को बताया। पर मां को विश्वास नहीं हुआ। “तू पागल हो गया है। परी-वरी कुछ नहीं होती।”
अगली सुबह अर्जुन बाजार में दुकान लगाकर बैठ गया। एक मुसाफिर आया, “भाई, जूता ठीक कर दो।”
अर्जुन ने जूता छुआ और वह चमकने लगा। पल में नया हो गया।
मुसाफिर हैरान रह गया, “यह चमत्कार है! लो पैसे।”
उधर राजमहल में राजकुमारी अनन्या की शीशे की चप्पल टूट गई थी। वह अपनी दिवंगत मां की निशानी थी।
राजा विक्रम ने घोषणा की, “जो इसे जोड़ेगा, उसे मुंहमांगा इनाम मिलेगा।”
यह खबर अर्जुन तक पहुंची। वह महल पहुंचा तो पहरेदारों ने रोका, “मनहूस को अंदर मत जाने दो!”
राजकुमारी ने खिड़की से देखा, “उसे आने दो। मैं मनहूस में विश्वास नहीं करती।”
अर्जुन ने चप्पल छुई। चमकदार रोशनी फैली और चप्पल नई हो गई।
सब हैरान रह गए। राजा बोले, “मांगो, क्या चाहिए?”
“महाराज, बस मेरा पारिश्रमिक दे दीजिए।”
“तुम्हारी सादगी देखकर मैं प्रभावित हूं। मेरे अधीन एक छोटा राज्य है, वह तुम्हें देता हूं।”
तभी परी प्रकट हुई, “विनय, यही वह ग्राहक थी जो तुम्हारी किस्मत बदल गई।”
राजकुमारी आगे बढ़ी, “अर्जुन, तुम्हारी ईमानदारी और विनम्रता से मैं प्रभावित हूं। मैं तुमसे विवाह करना चाहती हूं।”
राजपुरोहित बोला, “मैं आपत्ति करता हूं! एक मोची राजकुमारी का वर कैसे हो सकता है?”
राजकुमारी ने कहा, “पुरोहित जी, उनकी परीक्षा लीजिए।”
पुरोहित ने तीन कठिन प्रश्न पूछे – अकाल में प्राथमिकता, न्याय और कर्तव्य के बारे में।
अर्जुन ने हर प्रश्न का बुद्धिमानी से उत्तर दिया।
पुरोहित ने कहा, “महाराज, यह युवक राजकाज के योग्य है। मैं आपत्ति वापस लेता हूं।”
महल तालियों से गूंज उठा। कुछ दिनों बाद भव्य विवाह हुआ। मां शांति को राजमाता का सम्मान मिला।
जो कल मनहूस कहलाता था, वह आज पूरे राज्य का राजा बन गया। सत्कर्म, विनम्रता और ईमानदारी ने उसकी किस्मत बदल दी।
सच्चाई, मेहनत और विनम्रता से ही व्यक्ति की असली पहचान बनती है। किस्मत वही बदलती है जो अपने कर्म पर विश्वास रखता है।

