गढ़ चिरौली के घने जंगल में एक दिन अचानक खलबली मच गई। शिकारियों का एक समूह जंगल में घुस आया था और सभी जानवर अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। शिकारियों का सरदार चिल्लाया, “किसी भी जानवर को बचकर नहीं जाने देना!”
जानवरों को पकड़ते समय अचानक शिकारियों को एक विशाल एनाकोंडा दिखाई दिया। सरदार की आंखें चमक उठीं, “अरे, यह तो एनाकोंडा है! अगर इसे पकड़ लिया तो किसी और जानवर की जरूरत नहीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसके मुंहमांगे दाम मिलते हैं।”
सभी शिकारी मिलकर उस शक्तिशाली एनाकोंडा को पकड़ने की कोशिश करने लगे। लेकिन वह बहुत ताकतवर था। एक शिकारी बोला, “यह तो बहुत मजबूत है। इसे ट्रैंक्विलाइज़र से बेहोश कर देते हैं।”
शिकारियों ने बेहोशी की दवा भरी गोली दागी, जिससे एनाकोंडा घायल हो गया। लेकिन वह फिर भी लड़ता रहा और अंततः दूसरे जंगल की ओर भागने में सफल हो गया। शिकारी थककर बैठ गए, “बड़ी मुश्किल से जान बची। इसे बाद में देख लेंगे।”
घायल एनाकोंडा एक गुफा में पहुंचा और सोचा, “यह गुफा ठीक है। कुछ दिन यहीं आराम कर लेता हूं।” उसका नाम वीरबल था और वह अपनी बहादुरी के लिए प्रसिद्ध था।
उसी समय, दूसरे जंगल में राजा केशरी सिंह अपनी सभा में बैठे थे। मंत्री बलवान ने कहा, “महाराज, पिछले कई दिनों से हमारे जंगल से रोज दो जानवर गायब हो रहे हैं। पता नहीं कौन उन्हें ले जाता है।”
केशरी सिंह गंभीर हो गए, “लगता है कोई खूंखार शिकारी हमारे जंगल में घुस आया है। बलवान, तुरंत पता लगाओ।”
अगले दिन चतुरा लोमड़ी दौड़ती हुई आई, “महाराज, मैंने गुफा में एक विशाल एनाकोंडा देखा है। शायद वही हत्यारा है।”
केशरी सिंह बोले, “यह गंभीर मामला है। हमें उसे पकड़ना होगा।” सभी जानवरों ने मिलकर योजना बनाई और गुफा के द्वार को एक भारी चट्टान से बंद कर दिया।
लेकिन अगले दिन भी एक हिरणी रोती हुई आई, “महाराज, मेरे पति गायब हो गए हैं!” फिर एक बकरी आई और उसने भी यही शिकायत की।
केशरी सिंह समझ गए कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने गुफा खोलकर अंदर जाने का फैसला किया। अंदर जाकर उन्होंने देखा कि एनाकोंडा घायल पड़ा था।
“मेरा नाम वीरबल है महाराज। मैं घायल हूं। कृपया मेरी मदद करें,” एनाकोंडा ने कहा।
“तू ही तो हमारे जानवरों को मार रहा है!” केशरी सिंह गुर्राए।
“नहीं महाराज, मैंने किसी को नहीं मारा। मैं तो खुद अपने दुश्मनों से बचकर यहां आया हूं। क्रूरसिंह नाम के एनाकोंडा और उसके साथियों ने मुझे धोखे से मारने की कोशिश की थी।”
केशरी सिंह को वीरबल की बात पर विश्वास हो गया। उन्होंने डॉक्टर हाथी को बुलाकर वीरबल का इलाज शुरू करवा दिया।
कई दिन बीत गए, लेकिन जानवरों का गायब होना जारी रहा। एक दिन सभा के दौरान एक भयंकर एनाकोंडा वहां प्रकट हुआ।
“मेरा नाम क्रूरसिंह है,” उसने दहाड़ते हुए कहा, “मैं अपने दुश्मन की तलाश में यहां आया था, लेकिन इतना भोजन देखकर अब यहीं रहूंगा। हां, मैं ही रोज दो जानवरों को मार रहा हूं।”
“यहां से चले जाओ!” केशरी सिंह ने कहा।
“नहीं जाऊंगा। अगर रोज एक जानवर मुझे मिल जाए तो मैं शिकार बंद कर दूंगा। वरना रोज पांच जानवरों को मारूंगा,” क्रूरसिंह ने धमकी दी।
सभी जानवर डर गए। चतुरा लोमड़ी ने सुझाव दिया, “महाराज, वीरबल को क्रूरसिंह से लड़ा दिया जाए।”
“लेकिन वीरबल अभी घायल है। उसे ठीक होने में चार दिन लगेंगे,” बलवान ने कहा।
केशरी सिंह ने फैसला किया, “पर्ची डालेंगे। जिसकी निकलेगी, वही जाएगा।”
पहली पर्ची केशरी सिंह की अपनी जाति की निकली। सब दंग रह गए। तभी सुनहरी बकरी बोली, “नहीं महाराज, मैं जाऊंगी।”
लेकिन एक बूढ़े शेर गौरव सिंह ने कहा, “नहीं, मैं बूढ़ा हो चुका हूं। जंगल को मेरी नहीं, आप सबकी जरूरत है। मैं जाऊंगा।”
अगले दिन क्रूरसिंह आया और गौरव सिंह को मारकर खा गया। इसी तरह चार दिन बीत गए और चार जानवरों की बलि चढ़ गई।
पांचवें दिन वीरबल पूरी तरह ठीक हो चुका था। जब क्रूरसिंह आया तो केशरी सिंह ने कहा, “आज तुझे एक बड़ा शिकार मिलेगा।”
गुफा से वीरबल बाहर आया। क्रूरसिंह उसे देखकर चौंक गया, “तू यहां?”
“हां, उस दिन मैं अकेला था इसलिए भागना पड़ा। आज हम दोनों अकेले हैं। आज तुझे अपने किए की सजा मिलेगी,” वीरबल ने कहा।
दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। वीरबल ने अपनी ताकत और बुद्धिमानी से क्रूरसिंह को हरा दिया और मार डाला। सभी जानवर खुशी से नाचने लगे।
केशरी सिंह ने घोषणा की, “आज से वीरबल हमारे जंगल का रक्षा मंत्री है!”
सभी जानवर चिल्लाए, “वीरबल की जय! केशरी सिंह की जय!”
इस तरह वीरबल और केशरी सिंह ने मिलकर जंगल को क्रूरसिंह के आतंक से बचा लिया और सभी जानवर फिर से सुख-शांति से रहने लगे। साहस और एकता से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है। सच्चाई हमेशा जीतती है और मदद करने वालों को हमेशा सम्मान मिलता है।
