गांव के इकलौते किराना दुकानदार मोहनलाल अपनी बेईमानी के लिए मशहूर था। एक दिन राजू उसकी दुकान पर आया और छह किलो चीनी मांगी। बगल में खड़े संतोष ने हैरानी से पूछा, “भाई, छह किलो क्यों? लोग तो पांच किलो लेते हैं।”
राजू मुस्कुराया, “दोस्त, तुम नए लगते हो। मोहनलाल तराजू में चुंबक लगाता है। एक किलो हमेशा कम तौलता है, इसलिए मैं छह किलो मांगता हूं ताकि असली में पांच किलो मिले।”
“तो फिर यहां से क्यों खरीदते हो?” संतोष ने पूछा।
“अगली दुकान दस किलोमीटर दूर है भाई। कौन इतना दूर जाए? यहीं से ले लेना आसान है,” राजू ने जवाब दिया।
मोहनलाल की पूरे गांव में एकमात्र किराने की दुकान थी। लोग समय बचाने के लिए उसके पास आते थे और वह इसका भरपूर फायदा उठाता था। रात को दुकान बंद करते समय मोहनलाल पैसे गिन रहा था। उसके दो नौकर, गफूर और शंकर, सामान संभाल रहे थे।
“मुझे लगता है तुम दोनों ठीक से काम नहीं कर रहे। कल से और मेहनत करो,” मोहनलाल ने डांटा।
अगली सुबह मोहनलाल जलेबी खाने छगनराम के ठेले पर गया। वहां उसने पास के गांव सुखपुर की बात सुनी।
“भैया, सुखपुर के बारे में सुना? वहां कोई दुकान नहीं है। लोग सब कुछ खुद उगाते हैं – अनाज, दाल, सब्जी, फल। पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं,” छगनराम ने बताया।
“वाह! तो बचत होती होगी,” मोहनलाल ने कहा, लेकिन मन में सोचा कि ऐसी जगह उसके लिए बेकार है।
दुकान पहुंचकर मोहनलाल ने भगवान की तस्वीर के सामने अगरबत्ती जलाई और प्रार्थना की, “हे प्रभु, मेरे ग्राहक जेब भरकर आएं और यहीं खाली करके जाएं।”
फिर उसने आधी जली अगरबत्ती बुझा दी। गफूर ने हैरानी से पूछा, “मालिक, बुझा क्यों दी?”
“भगवान ने सुन लिया होगा। रोज पूरी जलाऊंगा तो खर्चा बढ़ेगा। एक अगरबत्ती हफ्ते भर चलाता हूं,” मोहनलाल ने जवाब दिया।
कुछ दिन बाद खबर फैली कि सुखपुर में भयंकर बाढ़ आ गई है। बांध टूटने से पूरा गांव जलमग्न हो गया। लोगों की फसलें बर्बाद हो गईं।
मोहनलाल को मौका नजर आया। वह जोर से हंसा, “यह पैसे कमाने का सुनहरा मौका है! वहां अब सामान की सख्त जरूरत होगी।”
अगले ही दिन मोहनलाल ने सुखपुर में अपनी दुकान लगा दी। उसने हर चीज की कीमत चार गुना बढ़ा दी। बाढ़ का पानी खत्म हो चुका था, लेकिन लोग परेशान थे।
एक महिला ने दो पैकेट बिस्किट मांगे। “अस्सी रुपये,” मोहनलाल ने कहा।
“क्या? अस्सी रुपये? यह तो लूट है!” महिला चीखी।
“लेना हो तो लो, नहीं तो आगे बढ़ो,” मोहनलाल ने बेरुखी से कहा।
मजबूरन महिला ने वह कीमत चुका दी। गांववाले परेशान थे लेकिन लाचार भी।
“यह लालची हमें कितना लूट रहा है! इसकी नरक में सीट पक्की है,” लोग बड़बड़ाते।
कुछ दिन बाद शहर से एक पुलिस इंस्पेक्टर विनोद आया। उसे बाढ़ का जायजा लेने भेजा गया था।
“गांववालों, सरकार ने आपके लिए राहत सामग्री भेजी है। जरूरतमंदों को मुफ्त राशन और आश्रय मिलेगा,” विनोद ने घोषणा की।
“साहब, आप भगवान की तरह आए हैं। यहां एक लालची दुकानदार हमें लूट रहा था। चार गुना दाम ले रहा है,” गांववालों ने शिकायत की।
विनोद मोहनलाल की दुकान पर गया। “एक नमकीन का पैकेट दो,” उसने कहा।
“चालीस रुपये,” मोहनलाल ने कहा।
“लेकिन पैकेट पर तो दस रुपये लिखा है,” विनोद ने देखा।
“यहां मेरे दाम चलते हैं। लेना हो तो लो,” मोहनलाल ने घमंड से कहा।
गफूर बीच में बोला, “मालिक ने तो यही बोलने को कहा था। मैंने तो कागज में लिखकर याद किया है।”
“चुप रह मूर्ख! देख तो सामने कौन है,” मोहनलाल ने डांटा।
विनोद ने खुद को पुलिस इंस्पेक्टर बताया। “तुम पर आरोप है कि बाढ़ पीड़ितों से चार गुना दाम वसूला। शर्म नहीं आई?”
घबराकर मोहनलाल ने दोष नौकरों पर डाला, “साहब, यह सब इन नौकरों ने किया है। मैं तो ईमानदार हूं।”
गफूर चीखा, “मैं तो वही दाम लगाता हूं जो आप कहते हैं!”
“तो दाम तुम लगाते हो। चलो थाने,” विनोद ने कहा।
“नहीं साहब, मैं तो सिर्फ तौलता हूं। दाम सेठ जी बताते हैं,” गफूर डरा।
शंकर बोला, “हां, हम तो बस तराजू में चुंबक लगाते हैं, बस।”
“मूर्ख! चुंबक की बात क्यों बताई?” मोहनलाल चिल्लाया।
गांववाले खुशी से ठहाके लगाने लगे।
मोहनलाल गिड़गिड़ाया, “साहब माफ कर दो। अब दुकानदारी छोड़ दूंगा। खेत में हल चलाऊंगा। मेरे छोटे बच्चे हैं।”
“आपकी तो शादी भी नहीं हुई सेठ जी,” गफूर बोला।
सभी फिर हंसे। विनोद ने कहा, “तुम बहुत लालची हो मोहनलाल। तुम्हारी जगह जेल है। और तुम दोनों नौकर भी साथ चलोगे।”
तीनों को गाड़ी में बैठाकर थाने ले जाया गया। मोहनलाल अपनी बेईमानी और लालच की सजा भुगतने के लिए जेल पहुंच गया।
