बंजरियापुर गाँव में विजय नाम का एक मेहनती किसान अपनी पत्नी कमला के साथ रहता था। गाँव में पानी की भारी कमी थी, लेकिन विजय हार नहीं मानता था। एक दिन उसे एक रहस्यमयी सपना आया।
सपने में एक साधु ने कहा, “विजय, तुम्हारे खेत के पास पुराने कुएँ में तुम्हारी किस्मत छिपी है। आज रात वहाँ आ जाओ।” डर के बावजूद विजय रात को कुएँ पर पहुँचा। साधु की आवाज ने उसे कुएँ में कूदने को कहा। आँखें बंद करके विजय ने छलांग लगाई और एक घने जंगल में गिरा।
वहाँ साधु ने बताया, “विजय बेटा, तुम्हारे खेत के पास वृक्ष के नीचे खजाने का नक्शा दबा है। उसे खोदो।” अगली सुबह विजय और कमला ने खुदाई की और एक पुराना नक्शा मिला। नक्शे में लिखा था कि जंगल के मंदिर में खजाना है, लेकिन चाबी एक जादुई तालाब में कमल के फूल में छिपी है।
जब वे तालाब पहुँचे, तो देखा कि पानी में गिरने पर सब कुछ जल जाता था। तभी उन्हें एक घायल साधु मिला। विजय ने उसकी सेवा की। प्रसन्न होकर साधु ने उन्हें दिव्य शक्ति दी। विजय ने तालाब में जाकर चाबी प्राप्त की।
अगले दिन वे मंदिर पहुँचे और चाबी से दरवाजा खोला। अंदर सिर्फ एक खाली गुफा थी। निराश होकर जाते समय विजय को नीले पानी की एक चमकती बोतल दिखी। उसे उठाकर वे घर लौट आए।
अगली सुबह विजय ने सोचा, “इस बेकार दवाई को खेत में फैला देता हूँ।” उसने पूरे खेत में वह नीला पानी छिड़क दिया। रात भर में चमत्कार हो गया! सारे बंजर खेत हरे-भरे अनाज से लहलहा उठे।
गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। लोग विजय को चतुर किसान कहने लगे। यह खबर राजा विक्रमादित्य तक पहुँची। राजा ने विजय को राजमहल बुलाया और कहा, “तुमने अद्भुत काम किया। अब तुम राजमहल के लिए अनाज उगाओगे और अच्छा व्यापार करोगे।”
विजय समझ गया कि साधु ने उसे असली खजाना दिया था – फसल का खजाना। किसानों के लिए उनकी मेहनत और फसल ही सबसे बड़ा धन है। विजय की चतुराई और मेहनत से पूरे राज्य में खुशहाली आ गई।
असली खजाना सोना-चाँदी नहीं, बल्कि मेहनत, ईमानदारी और सेवाभाव है। किसान की फसल ही सबसे बड़ा धन है।

