सुंदरपुर गांव में राजू नाम का एक अनाथ लकड़हारा रहता था। गांववाले उसे भोला कहकर चिढ़ाते थे। एक दिन राजू जंगल जा रहा था तो उसका मित्र मोहन दौड़कर आया।
“अरे राजू! मैं भी तो लकड़हारा हूं। हम साथ क्यों नहीं जाते?” मोहन ने पूछा।
“भाई, मैं जल्दी उठ जाता हूं। तुम देर से उठते हो,” राजू ने सीधे स्वर में कहा।
दोनों जंगल पहुंचे। राजू मेहनत से लकड़ी काटने लगा पर मोहन आलसी था। मोहन ने कहा, “राजू भाई, मेरी मदद करोगे?”
राजू मुस्कुराया और मोहन की लकड़ियां भी काट दीं। मोहन मन में सोचने लगा – “कितना मूर्ख है यह!”
बाजार में एक ग्राहक सुरेश आया। मोहन ने कहा, “20 रुपये में ले जाओ।”
सुरेश बोला, “नहीं, मैं राजू से खरीदूंगा।” वह जानता था कि राजू ईमानदार है।
राजू से पूछने पर राजू ने कहा, “20 रुपये दूंगा।”
“भाई, अभी पास पैसे नहीं हैं। कल 25 रुपये दूंगा,” सुरेश ने कहा।
राजू बोला, “कोई बात नहीं। कल 20 ही देना।”
सुरेश खुश होकर चला गया। मोहन मन में हंसा – “कितना भोला है!”
अगले दिन सुरेश गुस्से में आया। “तुम्हारी लकड़ियां गीली थीं! धुआं भर गया घर में!”
राजू ने कहा, “पर कल बारिश नहीं हुई थी।”
“चल भाग यहां से!” सुरेश चिल्लाया।
राजू उदास होकर बैठ गया। मोहन फिर हंसा।
गांव की चौपाल में मुखिया और उसकी बेटी रीता के सामने मोहन राजू का मजाक उड़ा रहा था। “सबसे बड़ा मूर्ख राजू है!”
बुजुर्ग गंगा दादी ने टोका, “मोहन, राजू का मजाक मत उड़ाओ।”
रीता बोली, “राजू को तो कोई भी बेवकूफ बना सकता है।”
तभी राजू आया। रीता ने झूठ बोला, “राजू, हमारी बकरी खो गई है।”
राजू तुरंत बोला, “मैं ढूंढकर लाता हूं!” और चला गया।
रीता हंसी, “देखा! कितना भोला है। बकरी तो घर पर ही है।”
राजू थककर लौटा तो रीता ने सच बताया और हंसकर कहा, “तुमसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं!”
गंगा दादी ने राजू से कहा, “तू कब चतुर बनेगा?”
राजू मुस्कुराया, “दादी, ये गांववाले ही मेरे माता-पिता हैं। इन्होंने मुझे पाला है। इनका एहसान है मुझ पर।”
अगले दिन जंगल में काम करते समय एक अजीब पक्षी आया। उसकी लाल आंखें थीं।
पक्षी इंसानी आवाज में बोला, “मैं तुम्हें अमीर बना दूंगा। लाल पेड़ की एक डाली काटकर दो।”
राजू डरा, “कोई जादूगर लगता है।”
पर मोहन लालची था। “मैं काम कर दूंगा।”
पक्षी ने मोहन को लाल पेड़ तक पहुंचाया। मोहन ने डाली काटी। तुरंत सोने के सिक्कों का ढेर दिखा।
मोहन खुश हुआ, “राजू मूर्ख है! अच्छा हुआ यहां नहीं आया।”
पक्षी ने कहा, “अब कभी जंगल में मत आना।”
मोहन गांव लौटकर सबको बताया। सब कहने लगे, “राजू की मूर्खता से वह अमीर बनने का मौका गंवा गया।”
अगले दिन राजू अकेले जंगल गया। एक चुहिया आई और रोने लगी।
चुहिया इंसानी आवाज में बोली, “मेरी मदद करो राजू!”
राजू डरा पर चुहिया की आवाज में दर्द था।
चुहिया ने बताया, “मैं कोई राक्षस हूं जिसे किसी ने चुहिया बना दिया। कल तुम्हारे दोस्त ने एक राक्षस को आजाद कर दिया है!”
राजू समझ गया। चुहिया गायब हो गई।
अगले दिन एक साधु मिला। राजू ने सब बताया।
साधु बोला, “हां, वह राक्षस आजाद हो गया। तुम्हें उसे रोकना होगा।”
साधु ने राजू की कुल्हाड़ी पर जादू किया। “यह अब जादुई है। आंखें बंद करो।”
राजू की आंखें खुलीं तो वह राक्षस की गुफा में था। वहां चुहिया बंदी थी।
राक्षस चिल्लाया, “तू वही मूर्ख है!”
राजू गुस्से में बोला, “यही मूर्ख तेरा अंत करेगा!”
उसने जादुई कुल्हाड़ी से राक्षस को मारा। राक्षस जलकर राख हो गया।
चुहिया तुरंत एक सुंदर राजकुमारी बन गई। “तुमने मेरी जान बचाई! क्या तुम मुझसे शादी करोगे?”
राजू शरमाया, “मैं तो गरीब लकड़हारा हूं।”
“नहीं,” राजकुमारी बोली, “तुम्हारा दिल सोने जैसा शुद्ध है।”
साधु के साथ गांव लौटकर सबने राजू की वीरता की कहानी सुनी। राक्षस के मरते ही मोहन के सिक्के मिट्टी बन गए।
साधु बोला, “जिसे तुम मूर्ख समझते थे, वही सबसे बुद्धिमान और वीर निकला।”
राजू और राजकुमारी का विवाह हुआ। वह राजकुमार बन गया।
सच्चाई, ईमानदारी और दयालुता ही असली बुद्धिमत्ता है। जो व्यक्ति दूसरों की मदद करता है, अंत में वही सफल होता है ।

