दयालु किसान रामू और ममता भरा खरगोश बन्नी
गांव के बाहर एक छोटी सी झोपड़ी में रामू नाम का एक गरीब किसान रहता था। उसके पास कुछ बीघा जमीन थी जिसमें वह मेहनत से खेती करता था। इस साल उसने अपने पूरे खेत में आलू बोए थे। रामू हर सुबह और शाम अपने खेत में जाकर फसल की देखभाल करता। वह पौधों को पानी देता, खरपतवार निकालता और प्यार से अपनी फसल को देखता। आलू के पौधे हरे-भरे हो गए थे और जल्द ही फसल तैयार होने वाली थी।
एक सुबह जब रामू अपने खेत में पहुंचा तो उसे कुछ अजीब नजर आया। मिट्टी में छोटे-छोटे पंजों के निशान थे। कुछ आलू के पौधे उखड़े हुए थे और आलू गायब थे। रामू चौंक गया। उसने सोचा शायद कोई जानवर उसकी मेहनत बर्बाद कर रहा है। अगले दिन फिर वही हुआ। और कुछ पौधे उखड़े मिले। रामू परेशान हो गया क्योंकि यह उसकी पूरे साल की कमाई थी।
तीसरे दिन रामू ने ठान लिया कि वह चोर को पकड़ कर रहेगा। शाम को जब अंधेरा होने लगा तो वह खेत के किनारे लकड़ियों के ढेर के पीछे छिप गया। उसने एक मोटा डंडा भी अपने पास रख लिया। वह चुपचाप नजर रखने लगा। घंटे बीत गए। ठंडी हवा चल रही थी और रामू को झपकी आने लगी थी। तभी अचानक कुछ हलचल हुई।
चांदनी रात में रामू ने देखा कि एक छोटा भूरे रंग का खरगोश फुदकता हुआ खेत में आया। उसके लंबे कान और छोटी सी पूंछ थी। खरगोश का नाम बन्नी था। बन्नी ने इधर-उधर देखा और फिर आलू के एक पौधे के पास पहुंच गया। उसने अपने छोटे पंजों से मिट्टी खोदनी शुरू की और एक आलू निकाल लिया। फिर उसने आलू को मुंह में पकड़ा और फुदकता हुआ खेत से बाहर चला गया।
रामू चुपचाप उठा और दबे पांव बन्नी के पीछे चलने लगा। बन्नी एक पगडंडी से होता हुआ जंगल की तरफ गया। झाड़ियों के बीच से वह एक पुराने पेड़ के पास पहुंचा। वहां जड़ों के नीचे एक छोटा सा बिल था। बन्नी उस बिल में घुस गया।
रामू धीरे से बिल के पास पहुंचा। उसने झुक कर अंदर झांका। मद्धिम रोशनी में उसे दिखाई दिया कि बिल के अंदर एक बूढ़ी खरगोशनी लेटी हुई थी। उसका नाम चम्पा था। चम्पा बहुत कमजोर और बीमार लग रही थी। उसकी आंखें धुंधली थीं और वह हिल भी नहीं पा रही थी। बन्नी ने प्यार से आलू अपनी मां के पास रखा। चम्पा ने धीरे से आलू को सूंघा और बन्नी के सिर को चाटा।
रामू का दिल भर आया। उसे समझ में आ गया कि यह छोटा खरगोश चोरी नहीं कर रहा था बल्कि अपनी बीमार मां को बचाने की कोशिश कर रहा था। बन्नी का कोई और सहारा नहीं था। रामू चुपचाप वापस अपनी झोपड़ी में लौट आया। उस रात उसे नींद नहीं आई। वह सोचता रहा कि कैसे एक छोटा बच्चा अपनी मां के लिए इतना कुछ कर रहा है।
अगले दिन सुबह आसमान में काले बादल छा गए। तेज हवाएं चलने लगीं। दोपहर तक जोरदार बारिश शुरू हो गई। आंधी और बारिश इतनी तेज थी कि पेड़ हिलने लगे। रामू को अचानक बन्नी और चम्पा का ध्यान आया। वह सोचने लगा कि इस बारिश में उनका क्या होगा। बिल में पानी भर जाएगा।
रामू बिना सोचे समझे एक टोकरी उठाकर भागा। बारिश में भीगते हुए वह उस पेड़ के पास पहुंचा जहां बिल था। उसकी आशंका सही थी। मिट्टी बह रही थी और बिल में पानी घुस रहा था। बन्नी अपनी मां को बचाने की कोशिश कर रहा था लेकिन वह बहुत छोटा था।
रामू ने झट से अपने हाथों से मिट्टी हटाई और दोनों खरगोशों को सावधानी से उठा लिया। चम्पा ठंड से कांप रही थी। रामू ने उन्हें अपने कुर्ते में छिपाया और तेजी से अपनी झोपड़ी की तरफ भागा। झोपड़ी में पहुंचकर उसने चूल्हे के पास एक पुराना कंबल बिछाया और दोनों खरगोशों को वहां लिटा दिया।
रामू ने बन्नी और चम्पा की देखभाल शुरू कर दी। उसने चम्पा को गुनगुना दूध पिलाया और कुछ कोमल घास खिलाई। बन्नी को भी खाना दिया। धीरे-धीरे चम्पा को ताकत मिलने लगी। रामू रोज उनकी सेवा करता। वह अपने खाने में से बचा कर उन्हें देता।
कुछ हफ्तों बाद चम्पा पूरी तरह से स्वस्थ हो गई। उसके बाल फिर से चमकने लगे और वह चलने फिरने लगी। और एक दिन खुशी की बात हुई। चम्पा ने तीन छोटे-छोटे प्यारे खरगोश के बच्चों को जन्म दिया। फुर्र, गुल्लू और तितली नाम के तीनों बच्चे बहुत नटखट थे। वे झोपड़ी में इधर-उधर कूदते और बन्नी के साथ खेलते।
रामू बहुत खुश था। अब उसका घर सूना नहीं रहा। बन्नी और उसका पूरा परिवार रामू के साथ रहने लगा। खरगोश खेत में से खरपतवार खा जाते थे जिससे फसल अच्छी होती थी। रामू ने अपने खेत के एक कोने में उनके लिए गाजर और पत्तागोभी भी उगाना शुरू कर दिया। गांव वाले रामू की दयालुता की कहानी सुनकर बहुत प्रभावित हुए। वे कहते थे कि रामू ने सच्ची इंसानियत का सबूत दिया है।
समय बीतता गया और रामू का खेत पहले से भी ज्यादा फल-फूल गया। लोग कहते थे कि जब दिल में दया हो तो भगवान भी साथ देते हैं। रामू और बन्नी का परिवार हमेशा साथ रहा और खुशी-खुशी जीवन बिताया।
दया और करुणा से बड़ा कोई धर्म नहीं। जब हम दूसरों की मुसीबत में मदद करते हैं तो हमारा जीवन भी खुशियों से भर जाता है।

