कावेरी की नींद अचानक खुल गई — जैसे किसी ने उसे धकेल कर जगा दिया हो। वो हड़बड़ाकर उठी और चारों तरफ नजर दौड़ाई। कमरे में सन्नाटा था। पर्दे हवा में हिल रहे थे और बालकनी के काँच के दरवाजे पर हल्की-हल्की दस्तक हो रही थी।
कावेरी ने धीरे-धीरे उठकर बालकनी का दरवाजा खोला। बाहर कोई नहीं था। रात का अँधेरा और दूर तक फैली सड़क — बस इतना ही। वो राहत की साँस लेने ही वाली थी कि उसकी नजर नीचे पार्किंग में खड़ी काली एसयूवी पर पड़ी। वही गाड़ी — अर्जुन की गाड़ी।
कावेरी बस उसे टकटकी लगाए देखती रही। तभी उसके फोन की स्क्रीन जगमगाई।
“नीचे आओ। गाड़ी में हूँ।”
नंबर अर्जुन का था। वही अर्जुन जो तीन हफ्ते पहले इसी गाड़ी में बैठकर अपनी जान ले चुका था।
कावेरी के हाथ काँपने लगे। “ये क्या मज़ाक है? कौन हो तुम?”
जवाब आया: “जल्दी आओ।”
बिना सोचे वो नीचे उतर गई। गाड़ी के पास पहुँची — खिड़की के शीशे पर अपना अक्स देखते हुए उसने अंदर झाँका। खाली थी। तभी पीछे से आवाज आई।
“मेम साहब, इतनी रात को अकेले बाहर?”
रामदीन काका खड़े थे — सोसाइटी के बुजुर्ग केयरटेकर। उन्होंने धीरे से कहा, “साहब जैसे गए हैं वैसे, उनकी यादें भी ऐसे ही आती-जाती रहेंगी। आपको खुद को संभालना होगा।”
कावेरी ने फोन चेक किया — कोई मैसेज नहीं। कोई कॉल लॉग नहीं। जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।
पर उसने मैसेज देखा था। उसे यकीन था।
वो गाड़ी के अंदर घुसी और कम्पार्टमेंट खोला। अर्जुन का फोन वहीं रखा था — और साथ में वो पिस्तौल भी, जिसका ज़िक्र करना पुलिस वाले भी टालते थे।
अर्जुन के फोन में कोई मैसेज नहीं था। पर उसमें तस्वीरें थीं। एक अनजान लड़की की — किसी लाइब्रेरी में। नाम बोर्ड पर लिखा था: सिटी सेंट्रल लाइब्रेरी।
अगली शाम कावेरी उस लाइब्रेरी के काउंटर पर खड़ी थी।
“मैं कावेरी हूँ। अर्जुन शर्मा की पत्नी।”
रेवा — वो लाइब्रेरियन जो फोटो में थी — थोड़ी सहमी। पर जब कावेरी ने सब बताया तो रेवा ने माना कि अर्जुन यहाँ आता था। एक बार वो उसके घर भी गई थी — उसकी इच्छा से।
“वो बहुत अच्छे थे। पर उस रात… वो अजीब हो गए। किस करते-करते उन्होंने मेरा गला दबाना शुरू कर दिया। जब मैंने रोका तो वो बस बड़बड़ाते रहे — ‘कुछ काम नहीं कर रहा। मैं इसे रोक नहीं पा रहा।’ फिर उन्होंने मुझे घर छोड़ा और कहा — ‘अब मुझे पता है क्या करना है। मुझे यह अभी खत्म करना होगा।'”
कावेरी समझ गई — वो गिल्ट में नहीं गया था। कुछ और था।
उसने रेवा को अपने साथ चलने को कहा। कारण था — अर्जुन के फोन में एक और तस्वीर थी, जो रेवा के अलावा कोई नहीं पहचान सकता था।
गाड़ी में बैठते ही कावेरी ने कम्पार्टमेंट से एक मुड़ा हुआ कागज निकाला।
“यह अर्जुन का सुसाइड नोट है। पढ़ो।”
रेवा ने पढ़ा। उसकी आँखें फैल गईं।
“उस कमरे में कोई है, पर वो तुम्हारे पीछे नहीं आएगा।”
तब कावेरी ने उसे अपनी कहानी सुनाई। चार साल पहले का वो एक्सीडेंट — जब उसका दिल 13 मिनट के लिए रुक गया था। जब वो एक अँधेरे कमरे की चौखट पर खड़ी थी। वापस आई थी — ज़िंदा।
“उसके बाद से मुझे अजीब सपने आते हैं। आवाज़ें सुनाई देती हैं।”
रेवा ने कहा, “मुझे भी। उस रात के बाद से।”
तभी रेवा ने एक बात बताई जो उसने पहले छुपाई थी — कावेरी के घर में एक अजीब प्रेजेंस महसूस हुई थी। जैसे कोई और भी हो।
“मुझे पुल के उस पार का वो घर याद है जहाँ अर्जुन ने मुझे लिया था। पर वो तुम्हारा घर नहीं था।”
कावेरी ने गाड़ी पुल की तरफ मोड़ दी।
जंगल के अंदर एक जला हुआ घर था — और वो कावेरी के घर जैसा ही दिखता था। हूबहू, बस उल्टा।
बीचोबीच छत से एक लाल लकड़ी की गुड़िया लटक रही थी।
घर लौटकर कावेरी ने अर्जुन की स्टडी में वो किताब ढूँढी जो रेवा ने बताई थी — अघोर शास्त्र।
पाठ सात: मृत्यु को भ्रमित करने की विधि।
जब कोई मनुष्य असामान्य रूप से मृत्यु से बच निकले, तो मृत्यु उसे भूलती नहीं। वो लौटती है। लेकिन यदि साधक उसी घर जैसा एक उल्टा घर बनाए, और एक मिलती-जुलती आत्मा की बलि देकर उसे वहाँ दफनाए — तो मृत्यु भ्रमित हो जाती है।
लाल गुड़िया उस बलि की जगह का निशान होती है।
कावेरी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
रामदीन काका ने बताया — अर्जुन के साथ छह महीने पहले एक और लड़की गई थी। उस जंगल वाले घर में।
वो वही लड़की थी — जिसकी फोटो कावेरी ने अर्जुन के फोन में देखी थी। जो रेवा नहीं थी।
कावेरी फिर उस घर में गई। गुड़िया के ठीक नीचे तहखाने का दरवाजा था। उसने खोला — और अंदर…
वो लड़की। सड़ी हुई लाश।
तभी फोन बजा। अर्जुन।
“श्रुति… माफ करना।”
“सिद्धार्थ — माने अर्जुन — तुम थक गए थे मुझे बचाते-बचाते?”
“हाँ। चार साल तक लड़ता रहा। उससे। जो उस अँधेरे कमरे में है। जिसे तुमने उस दिन धोखा दिया था।”
“यह मेरी मौत से खत्म होगा?”
“हाँ।”
कावेरी ने कम्पार्टमेंट खोला। पिस्तौल उठाई।
पर रुकी।
“उस कमरे में कोई है — पर वो तुम्हारे पीछे नहीं आएगा।”
यह अर्जुन ने लिखा था। यह आवाज़ जो “हाँ” कह रही थी — वो अर्जुन नहीं था।
“कौन हो तुम?”
“वही — जिसे तुमने चार साल पहले धोखा दिया था।”
कावेरी ने पिस्तौल नीचे रखी। शांत स्वर में बोली —
“मौत किसी की किस्मत नहीं होती। अर्जुन ने मुझे बचाने के लिए अपनी जान दी। उसके उस बलिदान को मैं व्यर्थ नहीं जाने दूँगी। जब तक जीना लिखा है — जिऊँगी।”
उसी पल वो धुआँ कहीं गायब हो गया। कावेरी की आँखें खुलीं — वो गाड़ी में थी, पिस्तौल हाथ में। खिड़की पर रामदीन काका हाथ मार रहे थे।
उसने पिस्तौल कम्पार्टमेंट में रखी। सुसाइड नोट उठाया। गाड़ी से बाहर निकली।
रात ठंडी थी — पर पहली बार उसे डर नहीं लगा।

