आधी रात हो चुकी थी और आसपास घना अंधेरा छाया था। एक टूटे हुए खंडार के बीच हवन कुंड की आग सुलग रही थी और उसके सामने बैठा था अघोरम जो था गांव का सबसे सिद्ध पुजारी। उसके सामने एक मूर्ति रखी थी जिसका शरीर इंसान का था। सिर किसी भैंस जैसा था और पेट में आग की भट्टी थी।
ओम झर झर मोलकाय नमः ओम झर झर मोलकाय नमः ओम झर झर मोलकाय नमः जैसे ही अघोरम ने मंत्र पूरा करके हवन कुंड में राख डाली और एक छोटे से शिशु को सामने रखी मूर्ति के पेट की ओर उछाल दिया। जैसे ही बालक उस भट्टी में पहुंचा, एकाएक वहां से आग की लपटें धकने लगी और मूर्ति की आंखों से तेज लाल प्रकाश निकलता नजर आने लगा और यह नजारा देख अघोरम जोर-जोर से हंसने लगा।
तुम जाग उठे मोलकदेव।
तुम जाग उठे। अब सब मंगल ही मंगल होगा।
जंगल के अंधेरे को मूर्ति के पेट की आग ने रोशन कर दिया था। अगली सुबह सारे गांव में खबर फैल गई।
सुना भैया कल रात अघोरम ने मोलकदियों को जगा दिया है। बलि स्वीकार हो गई है। लगता है अब यह फसलों की आग सूखा खत्म हो जाएगा।
अरे यह किसी और के बस का काम था भी नहीं। यह सिर्फ अघोरम ही कर सकते हैं। तभी तो वह गांव के सबसे सिद्ध पुजारी माने जाते हैं।
मूलक की सेवा में तनिक भी गलती हो जाए तो जान पर बन आती है। लेकिन अघोरम बाबा के रहते हमारे गांव का कभी अमंगल हो ही नहीं सकता।
हां, लेकिन अब वही होगा जिसके लिए सारे गांव का दिल थर-थर कांपता है। हर अमावस को बलि देनी होगी।
अघोरा मोलक का सेवक था। कहते थे यह सिद्धि उन्हें विरासत में मिली थी। अगर मूलक देवता खुश हो जाए तो गांव में हरियाली होती थी। फसलें दो गुना लहलहाती थी। लोग बीमारियों से दूर रहते थे और घर में खुशियां लौट आती थी। और अगर देवता नाराज हो जाए तो सूखा, तरह-तरह की बीमारियां और भुखमरी से गांव वाले बेहाल हो जाते थे।
इसलिए अघोरम हर साल अपनी जान पर खेलकर वह हवन करता था। क्योंकि मूलक के भोग में हुई एक गलती मतलब साधक की बलि।
नहीं मैं भूखी मरने को तैयार हूं बीमारी भी झेल लूंगी लेकिन अपने बच्चे की बलि नहीं दूंगी। फसल में आग लगी तो लगी मेरा बच्चा इसकी भरपाई क्यों करेगा।
बात को समझो सरला ये तुम्हारे बच्चे की बलि नहीं है ये तो पूरे कबीले की रक्षा के लिए मुलक का प्रसाद बनेगा। गांव की रक्षा के लिए उसे सालों सालों तक याद रखा जाएगा।
हर दिन पहला निवाला तेरे बेटे के नाम का निकालेंगे गांव वाले।
मैंने कह दिया ना मैं अपने बच्चे की बलि नहीं देने दूंगी। चाहे तो मेरी जान ले लो।
नहीं बलि तो बस एक बालक की ही होगी। देवता को चाहिए निर्मल मन। निष्पाप आत्मा और इस धरती पर बच्चों से ज्यादा पवित्र कौन है?
समय मत गवाओ। जो समय पर मूलक को भोग ना मिला तो उसका कहर टूटेगा पूरे गांव पर।
अच्छा तो तुम ऐसा करो अपने बेटे को भोग चढ़ा दो उस देवता को। गांव के लिए इतना तो कर ही सकते हो।
सरला की बात सुनकर अघोरम को बहुत गुस्सा आता है। लेकिन वो कुछ कहता इसके पहले ही सरपंच चिल्ला पड़ता है।
अगर अघोरम के वंशज को कुछ हो गया तो आने वाले समय में हमें मूलक देवता के क्रोध से कौन बचाएगा? मूर्ख औरत तू पहली नहीं है जिसने अपने बच्चे की बलि दी है। इस बरस मूलक देवता ने तेरे लड़के को चुना है। इसलिए अपने आप को भाग्यशाली समझ और हट हमारे रास्ते से।
सरला एक विधवा असहाय औरत थी। वो रोती बिलखती रह गई और गांव वाले उसके बच्चे को उससे छीन कर ले गए। उसे खंडार की ही एक काल कोठरी में रखा गया।

