“निकल जाओ! मैं कहती हूं निकल जाओ घर से!” सीमा चीखी। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया था। “बिल्कुल शर्म नहीं आती तुम्हें? घर चलाने की औकात नहीं है। बस बातें बनाना आता है। निकल जाओ यहां से!”
राजू सिर झुकाए खड़ा था। उसकी पत्नी सीमा का गुस्सा आज हद पार कर गया था। पिछले कई दिनों से घर में अनाज का एक दाना नहीं था।
“आज अगर बिना कुछ कमाए घर वापस आए, तो घर के अंदर पैर मत रखना। कह देती हूं मैं!” सीमा ने दरवाजा खोलते हुए कहा।
“जाता हूं, जाता हूं,” राजू ने धीरे से कहा। “अगर आज कमाई नहीं हुई, तो घर वापस ही नहीं लौटूंगा।”
“वही अच्छा रहेगा!” सीमा ने दरवाजा बंद कर दिया।
राजू बहुत आलसी था। काम करना उसे बिल्कुल पसंद नहीं था। वह हमेशा काम से बचने के बहाने खोजता रहता था। दुखी मन से वह घर से निकल पड़ा और बिना किसी दिशा के चलता रहा।
“थक गया हूं मैं इस जिंदगी से,” राजू बड़बड़ाया। “आज जिधर पैर जाएंगे, उधर ही चला जाऊंगा।”
दुखी होकर वह चलता रहा। शाम होते-होते राजू एक घने जंगल में पहुंच गया। वहां एक विशाल पीपल का पेड़ था और पास में नदी बह रही थी। रात हो चुकी थी।
“अब क्या करूं?” राजू ने सोचा। “यहीं बैठकर ऋषि-मुनियों की तरह ध्यान करूंगा। शायद देवता प्रकट हो जाएं और मेरी सारी समस्याएं दूर हो जाएं।”
राजू ने आंखें बंद कर लीं और ध्यान लगाने की कोशिश करने लगा। “हे देवता! कहीं हो तो सामने आओ। प्रकट हो जाओ!”
अचानक धूम-धड़ाम, धड़-धड़ की आवाजें आने लगीं। राजू की आंखें खुल गईं और वह कांपने लगा। पीपल के पेड़ से अजीब-अजीब आवाजें आ रही थीं।
दरअसल, उस पेड़ पर काली नाम का एक ब्रह्मदैत्य रहता था। वह एक ब्राह्मण था जो मरने के बाद भूत बन गया था। उसके साथ कई और भूत भी रहते थे।
“आओ, आओ सब लोग!” काली ने जोर से आवाज लगाई। “देखो, यहां एक इंसान आया है। आज हम इसकी हड्डियां चबाएंगे। पूरी रात धूमधाम से पार्टी करेंगे!”
राजू के होश उड़ गए। “हाय राम! मैं तो देवताओं से धन-दौलत मांगने बैठा था, पर यहां तो मुसीबत आ गई। अब तो मेरी खैर नहीं!”
डर से राजू का पूरा शरीर कांपने लगा। उसके दांत किटकिटाने लगे।
“अरे, तू ऐसे कांप-कांप कर क्यों नाच रहा है?” काली ब्रह्मदैत्य ने पूछा।
राजू को अचानक एक तरकीब सूझी। डर को छुपाते हुए उसने कहा, “मैं डर से नहीं नाच रहा। खुशी से नाच रहा हूं!”
“खुशी से? क्यों?” काली ने हैरानी से पूछा।
“क्योंकि हमारे राज्य के राजकुमार बहुत बीमार हैं,” राजू ने चतुराई से कहा। “वैद्य जी ने बताया है कि ब्रह्मदैत्य के कलेजे की करी खाने से ही उनकी बीमारी ठीक होगी। राजा ने घोषणा की है कि जो भी ब्रह्मदैत्य का कलेजा लाएगा, उसे आधा राज्य और राजकुमारी से शादी का इनाम मिलेगा। इसीलिए मैं तुम्हें पकड़ने यहां आया हूं!”
राजू ने अपनी जेब से एक छोटा डिब्बा निकाला और हवा में कुछ मंत्र बड़बड़ाने लगा।
“देखो, मैं तो तुम्हारी जान इस डिब्बे में बंद कर चुका हूं!” राजू ने डिब्बा हिलाते हुए कहा।
“क्या? यह कैसे हो सकता है?” काली घबरा गया।
“नहीं मानते? तो यह देखो!” राजू ने डिब्बे को जोर से हिलाया।
काली ब्रह्मदैत्य डर गया। वह सोचने लगा कि शायद सचमुच यह नाई कोई तांत्रिक है। वह जोर-जोर से रोने लगा और राजू के पैरों में गिर गया।
“सुनो भाई, मुझे बचा लो!” काली रोते हुए बोला। “मैं तुम्हें ढेर सारा धन-दौलत, सोना-चांदी, जो चाहोगे वो दूंगा। बस मेरी जान बख्श दो!”
“तुम मुझे धन दोगे? इसका सबूत क्या है?” राजू ने चालाकी से पूछा।
“सबूत? यह रहा सबूत!” काली ने हाथ घुमाया और पीपल के पेड़ से सोने के सिक्कों से भरे कलश निकालकर राजू के सामने रख दिए।
राजू की आंखें चमक उठीं। इतना सारा सोना देखकर उसे विश्वास नहीं हो रहा था।
“अब तो मेरी पत्नी सीमा मुझ पर कभी गुस्सा नहीं करेगी,” राजू मन ही मन खुश हुआ। “लेकिन यह सब मेरे घर कैसे पहुंचेगा?”
“चिंता मत करो,” काली बोला। “हम सब मिलकर यह सामान तुम्हारे घर पहुंचा देंगे।”
“और मैं कैसे जाऊंगा इतनी दूर?” राजू ने पूछा।
“आप मेरे कंधे पर बैठ जाइए। मैं आपको पहुंचा दूंगा,” काली ने कहा।
इस तरह, ढेर सारा धन-दौलत लेकर और राजू को कंधे पर बिठाकर काली और उसके साथी भूत राजू के घर पहुंच गए।
“तो अब हमें आज्ञा दीजिए,” काली ने कहा।
“रुको, रुको!” राजू बोला। “इतनी दौलत रखूं कहां? मुझे तो एक राजमहल भी चाहिए!”
“नहीं, नहीं! दया करो!” काली रोने लगा। “ठीक है, मैं अभी बना देता हूं।”
काली ने अपनी जादुई शक्तियों से राजू की छोटी झोपड़ी को एक भव्य राजमहल में बदल दिया। सीमा यह सब देखकर दंग रह गई।
“अरे बाप रे! यह क्या हो गया?” सीमा हैरानी से बोली। “तुम सच में अमीर बन गए?”
“हां, प्रिये! अब हम राजाओं की तरह जीवन बिताएंगे!” राजू खुशी से बोला।
“लेकिन इतने बड़े महल की देखभाल कौन करेगा?” सीमा ने पूछा।
राजू ने काली की ओर देखा। काली ने तुरंत कई भूतों को नौकर बनाकर महल में रख दिया। अब राजू और सीमा के पास सब कुछ था – धन, महल, नौकर-चाकर।
लेकिन काम करते-करते काली थक गया था। उसने सोचा कि किसी तरह अपनी जान वापस ले लेनी चाहिए। एक दिन राजू ने गांव के सभी लोगों को दावत पर बुलाया।
उस दिन काली ने एक योजना बनाई। जब रसोई में खाना बन रहा था, तो काली ने एक जंगली बिल्ली को भेजा। बिल्ली एक मछली का सिर लेकर खिड़की से भाग गई।
“अरे, रुक जा बदमाश!” सीमा चिल्लाई और बिल्ली के पीछे भागी। उसके हाथ में चाकू था।
भागते-भागते सीमा की नजर काली पर पड़ी। डर से उसने चाकू फेंक दिया जो सीधे काली की नाक पर लगा। काली की नाक कट कर नीचे गिर गई।
“बाप रे! मर गया!” काली जोर से चिल्लाया। वह फिर से राजू के पैरों में गिर गया। “भाई, हम सबको छोड़ दो! तुम्हें जब जो चाहिए होगा, मैं लाकर दूंगा। बस मेरी जान वापस कर दो!”
राजू को काली पर दया आ गई। उसने डिब्बा खोला और बोला, “ठीक है, जाओ। छोड़ दिया तुम्हें।”
“सच कह रहे हो?” काली ने अविश्वास से पूछा।
“हां, देखो यह रहा तुम्हारा प्रतिबिंब शीशे में। तुम्हारी जान अब आजाद है,” राजू ने शीशा दिखाया।
काली ने बिना कुछ समझे राजू की बात पर विश्वास कर लिया। वह अपने सभी साथियों को लेकर जंगल की ओर भाग गया।
इसके बाद राजू और सीमा अपने राजमहल में बहुत खुशी-खुशी रहने लगे। राजू ने अपनी आलस छोड़ दी और मेहनत करने लगा। उसने समझ लिया कि जीवन में मेहनत और बुद्धिमानी दोनों जरूरी हैं।
बुद्धिमानी और मेहनत से जीवन में सफलता मिलती है। आलस त्यागकर और समझदारी से काम लेने पर मुसीबतें भी अवसर बन जाती हैं।

