सूरज की पहली किरण जब शांत और हरे-भरे उस गांव की गलियों पर पड़ती तो चिड़ियों की चहचहाट के साथ एक हल्की सी मीठी महक हवा में घुल जाती। उसी गांव में एक सादा सा लेकिन मेहनती परिवार रहता था। विकास हर सुबह अपनी टोकरी में ताजे खट्टे-मीठे जामुन भरकर गांव के हर कोने में बेचने जाता। उसके जामुन इतने रसीले होते कि लोग दूर-दराज के गांवों से उन्हें खरीदने आते थे।
“अरे विकास भाई, यह जामुन तुम कहां से लाते हो? ऐसा स्वाद तो आज तक किसी के भी जामुन में नहीं मिला,” लोग अक्सर पूछते।
“बस भैया, भगवान की देन है और थोड़ा सा भाग्य,” विकास मुस्कुराते हुए जवाब देता। पर सच्चाई वो किसी को नहीं बताता था।
शाम होते ही जब वह घर लौटता, प्रिया दरवाजे पर खड़ी उसका इंतजार कर रही होती। “आ गए जी?” प्रिया ने मुस्कुराते हुए पूछा।
“हां प्रिया, आज तो सारे जामुन दोपहर से पहले ही बिक गए।”
“सच? कितने पैसे आए?”
विकास ने मुस्कुरा कर थैली से पैसे निकालकर उसे दिए। “इतने कि कल तेरे लिए वो गुलाबी साड़ी ले आऊं जो तू पिछले मेले में देख रही थी।”
प्रिया शर्मा गई। “पहले खुद के लिए कुछ ले आओ। हर बार मेरे लिए ही क्यों?”
रात को दोनों खाना खाकर चारपाई पर लेटे। चांदनी कमरे में हल्की रोशनी बिखेर रही थी। प्रिया की आंख लग चुकी थी, लेकिन विकास की नजरें छत पर टिकी थीं। वह धीमे से फुसफुसाया, “चिंकू, शुक्रिया तुम्हारा। अगर तू ना होता तो ये जामुन भी ना होते।” और फिर वह मुस्कुराते हुए सो गया।
यह बात दो साल पुरानी है जब विकास की जिंदगी संघर्षों से भरी थी। गांव में कोई काम नहीं देता था। खेत भी नहीं थे। बस सुबह से शाम तक जंगल जाकर लकड़ियां तोड़ना ही उसका सहारा था।
एक दिन जंगल में लकड़ियां तोड़ते-तोड़ते वह थककर एक चट्टान पर बैठ गया। तभी उसकी नजर एक अजीब पेड़ पर पड़ी। वह जामुन का पेड़ था और उसके जामुन दूर से ही चमकते हुए रसीले लग रहे थे।
“वाह, कितने ताजे लग रहे हैं यह जामुन। थोड़ा खा लेता हूं,” विकास बोला।
वह पेड़ के पास गया और जमीन पर गिरे कुछ जामुन उठाकर खाने लगा। तभी अचानक पेड़ से एक बंदर छलांग लगाकर नीचे उतरा और जोर से चिल्लाया, “ए इंसान! तू कौन है? मेरे जामुन क्यों खा रहा है?”
विकास चौंक गया। उसके हाथ से जामुन गिर पड़े। “अरे तू… तू तो बोलता है? बंदर कैसे बोल सकता है?”
बंदर गुस्से में लेकिन उदास आवाज में बोला, “मैं एक श्रापित बंदर हूं। सालों से इस पेड़ से बंधा हूं।”
विकास ने हैरानी से पूछा, “क्यों? क्या हुआ था?”
“एक दिन मैंने एक बच्चे के हाथ से जामुन छीन लिए थे। वो मेरे पीछे भागा और गिर पड़ा। वहीं एक साधु ने यह सब देखा और मुझे श्राप दे दिया – अब तू इसी जामुन के पेड़ से बंधा रहेगा जब तक कोई इंसान इन जामुनों को दुनिया के साथ बांटकर लोगों को आनंद ना दे।”
विकास सोच में पड़ गया। फिर बोला, “तो इसका मतलब अगर मैं यह जामुन गांव में ले जाकर लोगों को खिलाऊं तो तुम आजाद हो सकते हो?”
बंदर ने उदास हंसी के साथ कहा, “अब तक तो कोई नहीं आया जो ऐसा करे।”
“मैं करूंगा। और अगर तुम सच में आजाद हो गए तो मैं हर साल यहां से जामुन ले जाऊंगा।”
“अगर तू मुझे आजाद करवा दे तो मैं तेरा चिंकू बन जाऊंगा। तेरा सबसे वफादार दोस्त।”
विकास ने पास की एक टोकरी उठाई, कुछ जामुन भरे और वापस गांव की ओर चल पड़ा। तब से विकास जामुन बेचने का काम कर रहा था।
अगली सुबह विकास रोज की तरह जल्दी नहीं उठा। प्रिया ने पास आकर उसके माथे को छुआ। “विकास जी, सब ठीक तो है? आज तो बहुत देर हो गई।”
विकास ने थके स्वर में कहा, “थोड़ा बुखार सा लग रहा है प्रिया। शरीर उठ ही नहीं रहा।”
प्रिया चिंतित हो गई। “तो आप आराम कीजिए। मैं अभी आपके लिए हल्का सा खाना बना देती हूं।”
“पर प्रिया, जामुन… मैंने रात को ढेर सारे जामुन लाए हैं। आज ना बेचे तो सब खराब हो जाएंगे।”
“तो मैं जाकर बेच देती हूं,” प्रिया ने हिम्मत से कहा।
“नहीं प्रिया, तुम कैसे बेचोगी? यह काम आसान नहीं है।”
“अगर आपकी मेहनत को बचाना है तो हिम्मत तो करनी पड़ेगी।”
“ठीक है। बस टोकरी को अच्छी तरह सजाकर रखना। और हां, एक टोकरी के पांच सौ रुपये मांगना। कम ना लेना।”
प्रिया ने एक छोटा सा टेबल निकाला और उस पर जामुन की टोकरी सजा दी। कुछ ही देर में एक आदमी आया। “बहन जी, यह टोकरी कितने की है?”
“पूरी टोकरी पांच सौ रुपये की है,” प्रिया थोड़ी घबराते हुए बोली।
आदमी ने मुस्कुराते हुए जेब से पांच सौ का नोट निकाला। “ठीक है, पूरा ले जाता हूं।”
प्रिया दौड़ती हुई घर पहुंची। “विकास जी, एक आदमी आया और पूरी टोकरी पांच सौ में लेकर चला गया।”
विकास की आंखों में चमक आ गई। “सच? प्रिया, तुमने तो कमाल कर दिया। आज से मैं भी तुम्हारी पार्टनर हूं।”
धीरे-धीरे उनका व्यापार बढ़ता गया। एक दिन प्रिया ने सुझाव दिया, “विकास जी, अगर हम अब एक टोकरी की बजाय ज्यादा जामुन लाएं और किसी एक जगह बड़ा ठेला लगा दें तो कमाई और भी अच्छी हो सकती है।”
“तुम बिल्कुल सही कह रही हो प्रिया। कल से ज्यादा जामुन लाता हूं। अपना जामुन वाला ठेला लगाएंगे।”
अगले दिन दोनों ने मिलकर गांव के चौराहे पर ठेला सजाया। जैसे ही उन्होंने जामुन सजाए, लोग एकत्र होने लगे। शाम तक सभी जामुन बिक गए।
ठेला अब रोज लगने लगा और उनकी कमाई भी बढ़ती गई। विकास और प्रिया का जीवन अब खुशहाल था। मेहनत और ईमानदारी से भरा। हर रात सोते समय विकास आसमान की ओर देखता और धीमे से कहता, “धन्यवाद चिंकू। अगर तू ना होता तो हम आज यहां ना होते।”
मेहनत, ईमानदारी और दूसरों की मदद करने से ही सच्ची खुशहाली मिलती है। जीवन में सफलता तभी आती है जब हम अपनी सफलता को दूसरों के साथ बांटते हैं।

