बिलासपुर गांव की सुबहें धीरे-धीरे खुलती थीं। उस गांव में संत रामदास रहते थे। सफेद धोती-कुर्ता, लंबी दाढ़ी और माथे पर तिलक लगाए रहते। गांववाले उन्हें भगवान मानते थे। हर दशहरे पर पूरा गांव उनकी खिचड़ी के लिए इकट्ठा होता।
लोग प्रेम से कहते, “संत जी की जय हो! आपकी खिचड़ी का इंतजार रहता है।”
संत मुस्कुराते, “बन गई बेटा।”
एक दिन गांव में खबर फैली कि विक्रम नामक लड़का गायब हो गया। उसकी मां रोती हुई संत के पास आई।
“संत जी, मेरा बेटा नहीं मिल रहा!”
संत ने शांति से कहा, “घबराओ मत। आखिरी बार कहां देखा?”
“खेत में, उसके बाद गायब हो गया।”
संत ने आंखें बंद कीं और कहा, “जंगल में ढूंढो, शायद वहीं हो।”
गांववाले जंगल गए पर विक्रम नहीं मिला। कुछ दिनों बाद और लोग गायब होने लगे। डर का माहौल छा गया। पंचायत बुलाई गई।
मुखिया ने कहा, “समस्या गंभीर है। हमें सतर्क रहना होगा।”
संत रोज मंदिर जाते और लोगों को आशीर्वाद देते। ऐसे में अर्जुन, कृष्ण, राज और बुन्नू नाम के चार दोस्त मिले।
अर्जुन बोला, “यार, लोगों का ऐसे गायब होना गड़बड़ लग रहा है।”
कृष्ण ने कहा, “पुलिस भी नहीं ढूंढ पाई। क्या करें?”
राज ने मजाक में कहा, “जंगल में जाकर ढूंढें क्या?”
बुन्नू गंभीर होकर बोला, “हां, हमें सच जानना चाहिए।”
रात को चारों जंगल की ओर निकले। अंधेरा, सन्नाटा और डर का माहौल था। झाड़ियों से आवाज आई।
“देखो, वहां कुछ है!” अर्जुन चीखा।
चारों आगे बढ़े और देखा – चांदनी में एक आधा इंसान, आधा जानवर जैसा प्राणी खड़ा था। उसके मुंह से खून टपक रहा था।
बुन्नू चिल्लाया, “भागो!”
अगली सुबह उन्होंने गांववालों को बताया। संत को बुलाया गया।
कृष्ण ने कहा, “संत जी, जंगल में एक दानव है। आधा इंसान, आधा जानवर।”
संत ने गंभीरता से कहा, “वो वापस आ गया। बहुत साल पहले उसे बांध दिया गया था। अब मुक्त हो गया है।”
कुछ दिन बाद चारों दोस्त संत की कुटिया गए। दरवाजा खुला था। अंदर अजीब बदबू थी।
राज बोला, “ये बदबू क्यों है? जैसे कुछ सड़ रहा हो।”
दीवारों पर खून के धब्बे थे। तभी संत आए।
“यहां क्यों आए बेटा?” संत ने पूछा।
अर्जुन ने कहा, “दानव को भगाने का उपाय बताइए।”
संत ने आंखें बंद कीं, “उपाय है पर कठिन। दानव शुद्धता से डरता है। गाय का दूध, गंगाजल और पीपल की पत्तियां उसे कमजोर करती हैं।”
रात को चारों मिश्रण लेकर जंगल गए। दानव दिखा और मिश्रण देखकर भाग गया।
अगले दिन अर्जुन सोच रहा था, “कुछ अजीब है। संत की कुटिया और जंगल की बदबू एक जैसी है।”
कृष्ण बोला, “हां! और दानव हमें देखकर क्यों भागा?”
राज ने कहा, “संत पर नजर रखनी होगी।”
रात में चारों संत का पीछा करने लगे। संत जंगल में गए और खिचड़ी बनाने लगे। पास में विक्रम बैठा था – बूढ़ा और कमजोर।
बुन्नू फुसफुसाया, “विक्रम जीवित है! संत ही लोगों को गायब कर रहा था!”
संत ने खिचड़ी विक्रम को खिलाई। वो तड़पा और मर गया। संत तरोताजा हो गया।
“ये इंसान नहीं है!” अर्जुन चीखा।
अगली रात वो फिर गए पर संत ने देख लिया। दानव ने बुन्नू को पकड़ लिया।
“छोड़ दो उसे!” अर्जुन चिल्लाया।
संत बोला, “शांत रहो। ये शंकर है, मेरा गुलाम।”
दानव इंसान बन गया – वो शंकर था।
संत ने धमकी दी, “दशहरे की रात कोई गांववाला लाओ, वरना बुन्नू मर जाएगा।”
तीनों मान गए पर योजना बनाने लगे। उन्होंने संत की किताब चुराई। उसमें लिखा था – “शक्ति रक्त से बढ़ती है। मृत्यु के लिए शुद्ध दूध और आत्माओं की मदद चाहिए।”
अर्जुन समझ गया, “हमें आत्माओं को बुलाना होगा।”
दशहरे के दिन उन्होंने हांडी पलटी और पवित्र दूध डाला। मंत्र पढ़े।
अचानक सैकड़ों आत्माएं उभरीं – वो सब मरे हुए गांववाले थे।
संत आया और चीखा, “तुम लोग मुझे छू नहीं सकते! मैं अमर हूं!”
“नहीं, तुम्हारा अंत आ गया!” आत्माओं ने कहा।
आत्माओं ने संत और शंकर को जकड़ लिया। संत तड़पा और राख बनकर उड़ गया।
बुन्नू जमीन पर गिरा और धीरे-धीरे उठा, “मैं बच गया!”
शंकर इंसान बन गया। अर्जुन ने पूछा, “तुम दानव कैसे बने?”
“संत ने मुझे गुलाम बनाया था। तुम्हारी वजह से मुक्ति मिली।”
मुखिया बोला, “अंत भला तो सब भला! तुमने गांव बचाया।”
चारों दोस्त हंसे और घर लौट गए। बिलासपुर फिर से सुरक्षित हो गया।
“बाहरी दिखावा सत्य नहीं होता। सच्चाई और साहस से ही बुराई का अंत होता है। विश्वास करने से पहले तर्क और सतर्कता जरूरी है।”

