गर्मी की छुट्टियों में दादाजी राजेंद्र प्रसाद के बड़े से घर में बच्चों की मस्ती का कोई ठिकाना नहीं था। पूरा घर बच्चों की किलकारियों से गूंज रहा था। बंटी, वीर, पिंकी और छोटी सारिका सुबह से शाम तक खेलते रहते थे। दादाजी की सफेद दाढ़ी और दयालु आँखें देखकर सभी बच्चे उनसे बहुत प्यार करते थे। वे हमेशा अपने मोटे चश्मे के पीछे से बच्चों को ममता भरी नजरों से देखते रहते थे।
उस दिन भी सभी बच्चे बगीचे में खेल रहे थे। दादाजी बरामदे में अपनी कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। उनकी सफेद कुर्ता-पायजामा धूप में चमक रही थी। तभी अचानक तेज हवा का झोंका आया। पेड़ों की डालियाँ जोर से हिलने लगीं। बच्चे डर गए और भागकर दादाजी के पास आ गए। लेकिन सारिका थोड़ी दूर रह गई थी।
“दादाजी! दादाजी!” सारिका चीखी। वह अपनी लाल फ्रॉक में बहुत प्यारी लग रही थी। उसके दो छोटे चोटियाँ हवा में लहरा रहे थे। तभी एक और तेज हवा का झोंका आया और सारिका का हल्का शरीर हवा में उठने लगा। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे उठा रही हो।
“बचाओ! बचाओ!” सारिका रोने लगी। बाकी बच्चे भी डर से चिल्लाने लगे। पर दादाजी ने तुरंत अपनी छड़ी उठाई और तेजी से सारिका की तरफ दौड़े। उन्होंने सारिका का हाथ पकड़ लिया और उसे सुरक्षित जमीन पर उतार दिया।
“दादाजी, यह क्या हो रहा है?” पिंकी ने अपनी नीली फ्रॉक के पल्लू से आँसू पोंछते हुए पूछा। उसकी लंबी चोटी कंधे पर लटक रही थी।
दादाजी ने अपना माथा खुजाया। उनका चेहरा गंभीर हो गया। “यह तो बहुत अजीब बात है। मुझे लगता है यहाँ कुछ रहस्यमय हो रहा है।”
तभी सारिका की माँ मीना देवी दौड़ती हुई आईं। उनके चेहरे पर परेशानी की लकीरें स्पष्ट थीं। उनकी हरी साड़ी हवा में लहरा रही थी और माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं।
“दादाजी! दादाजी!” मीना देवी रोते हुए बोलीं। “आज तो मेरी बच्ची सारिका को किसी ने पकड़कर कबूतर बना के उड़ा दिया। कोई भूत है यहाँ! मैं बहुत डर गई हूँ।”
“रोना बंद कीजिए मैडम,” दादाजी ने शांत स्वर में कहा। उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया और आत्मविश्वास से बोले, “आप बिल्कुल सही जगह आई हैं। क्योंकि अब दादाजी खुद इस बात की इन्वेस्टिगेशन करेंगे। हम इस रहस्य को जरूर सुलझाएंगे।”
वीर ने तुरंत अपना हाथ उठाया। वह अपनी पीली टी-शर्ट और नीली जींस में बहुत स्मार्ट लग रहा था। उसके काले घुंघराले बाल हवा में उड़ रहे थे। “मैं भी आपके साथ चलता हूँ दादाजी। मैं सारिका को भूतों से छुड़वाऊंगा। मैं बिल्कुल नहीं डरता!”
पिंकी भी उत्साह से बोली, “हाँ दादाजी, हम सब मिलकर सारिका को बचाएंगे।”
लेकिन बंटी को अपनी ही बहादुरी पर बहुत भरोसा था। वह अपनी नारंगी टी-शर्ट और काली शॉर्ट्स में खड़ा होकर सीना तानते हुए बोला। उसके छोटे-छोटे बाल और गोल चेहरा उसे बहुत क्यूट बना रहे थे। “नहीं-नहीं! मुझे किसी की मदद नहीं चाहिए। मैं तो अकेला जाकर ही सारिका को वापस ले आऊंगा। मैं सबसे बहादुर हूँ!”
दादाजी मुस्कुराए। “बंटी बेटा, बहादुरी अकेले लड़ने में नहीं, बल्कि साथ मिलकर काम करने में है।”
पर बंटी नहीं माना। “नहीं दादाजी, मैं अकेले ही जाऊंगा। आप देखना, मैं सारिका को जरूर बचाऊंगा।”
“ठीक है,” दादाजी ने कहा। “चलो चलो, सब चलते हैं। किसी को डरने की जरूरत नहीं है। पर साथ रहेंगे तो बेहतर होगा।”
सभी उस पुराने कुएँ की तरफ चले जहाँ से अजीब आवाजें आ रही थीं। रास्ता काफी डरावना था। पेड़ों की छायाएँ जमीन पर अजीब आकार बना रही थीं। बंटी आगे-आगे जा रहा था, पर अंदर ही अंदर वह भी डर रहा था।
तभी फिर से तेज हवा का झोंका आया। सारिका फिर से उठने लगी। बंटी ने उसे पकड़ने की कोशिश की, पर वह अकेला था। उसका हाथ फिसल गया। सारिका और ऊपर उठने लगी।
“बचाओ! बचाओ!” सारिका चीखी।
बंटी घबरा गया। “दादाजी! वीर! पिंकी! मदद करो!”
सभी दौड़े आए। दादाजी, वीर और पिंकी ने मिलकर एक बड़ी चादर फैलाई। सारिका उसमें गिरी और बच गई।
दादाजी ने जांच की तो पता चला कि पुराने कुएँ के पास एक बड़ा पंखा छिपा था जो तेज हवा पैदा कर रहा था। यह गाँव के शरारती लड़कों की शरारत थी।
बंटी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसकी आँखों में आँसू आ गए। “दादाजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं गलत था। अकेले में मैं कुछ नहीं कर पाया। सबकी मदद से ही सारिका बची।”
दादाजी ने बंटी को गले लगाया। “बेटा, यही तो सीख है जिंदगी की। हम अकेले कभी भी बड़ी मुसीबतों का सामना नहीं कर सकते। साथ मिलकर काम करने से ही हम सफल होते हैं। असली बहादुरी मदद मांगने और साथ देने में है।”
सभी बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और खुशी-खुशी घर लौट आए। उस दिन से बंटी ने हमेशा दोस्तों के साथ मिलकर काम करना सीख लिया।

