बहुत पुराने समय की बात है। नदी के उस पार, पहाड़ की चोटी पर, एक बुजुर्ग महिला रहती थी।
एक दिन वह नदी के किनारे बैठकर लौकी से बने बर्तन से अपनी बाल्टी में पानी भर रही थी। अचानक उसका बर्तन नदी में गिर गया।
उसके “हे भगवान!” कहने से भी पहले, बर्तन नदी की तेज धारा के साथ बह गया।
उसके पास दूसरा बर्तन भी नहीं था। इसलिए अब उसे बर्तन की बहुत जरूरत थी।
उसके घर के पास एक लौकी का पेड़ था। उसकी बेल बहुत फैली हुई थी। वह सीधे उस बेल के पास गई।
जैसे क्रिसमस के पेड़ पर सुंदर-सुंदर खिलौने टंगे होते हैं, वैसे ही बेल पर हरी और चमकदार लौकी के गुच्छे लटक रहे थे।
लेकिन कोई भी लौकी पकी हुई नहीं थी, सभी कच्ची ही थीं।
उस क्षेत्र में एक कहावत बहुत प्रचलित थी, ‘लौकी को पकने से पहले कभी मत तोड़ना, नहीं तो वह तुम्हें भूत की तरह सताएगी।’ लेकिन बुजुर्ग महिला ने उस कहावत की परवाह नहीं की। वह ऐसी अंधविश्वासी बातों में विश्वास नहीं करती थी। उसे केवल बर्तन बनाने के लिए एक लौकी चाहिए थी, और वह भी जल्दी से जल्दी।
इसलिए उसने एक झटके से बेल से एक बड़ी हरी लौकी तोड़ ली। उसने उस लौकी को अपने घर ले आई। लौकी सुखाने के लिए, उसने उसे चूल्हे के पास रखी कुर्सी पर रख दिया।
लौकी को सुखाने के लिए रखकर वह अपना काम करने लगी। तभी एक गड़गड़ाहट की आवाज आई और लौकी कुर्सी से गिरकर आग के पास लुढ़क गई।
बुजुर्ग महिला ने लौकी को उठाया और फिर कुर्सी पर रख दिया। कुछ देर में फिर गड़गड़ाहट की आवाज आई और लौकी फिर जमीन पर गिर गई।
“अगर तुम्हें कुर्सी पर बैठने में तकलीफ हो रही है, तो चूल्हे के ऊपर बैठ जाओ। लेकिन इस तरह आग के पास मत जाओ।” बुजुर्ग महिला ने कहा, और उसने लौकी को उठाकर चूल्हे के ऊपर रख दिया।
लेकिन जब वह मूसल और ओखली से घी निकालने बैठी, तो वह हरी लौकी चूल्हे के ऊपर गड़गड़ाहट की आवाज के साथ इधर-उधर लुढ़कने लगी। उस लौकी को चूल्हे के ऊपर रखे सामान को इधर-उधर धकेलने में बहुत मजा आ रहा था।
उसके बाद लौकी बुजुर्ग महिला की तरफ उछलती हुई आई। वह लौकी बुजुर्ग महिला के सिर पर उछल-कूद करने लगी, एक, दो, तीन, चार, पांच…
यह देखकर वह बुजुर्ग महिला डर से इतनी कूदी कि एक ही बार में वह घर से बाहर कूद गई और चीखती-चिल्लाती सड़क की तरफ दौड़ने लगी। हरी लौकी भी उसके पीछे-पीछे लुढ़कती आ रही थी। वह लौकी बुजुर्ग महिला को मारने की भरसक कोशिश कर रही थी।
दौड़ते-दौड़ते, बुजुर्ग महिला एक चीते के घर के पास पहुंची।
“क्या हुआ? तुम इस तरह क्यों दौड़ रही हो?” चीते ने बुजुर्ग महिला से पूछा।
“हे भगवान!” बुजुर्ग महिला चिल्लाई, “एक हरी लौकी ने मुझे चैन से बैठने नहीं दिया है, वह मुझे भूत की तरह पीछा कर रही है। वह मुझे मारने की फिराक में है।”
“अरे, बात वैसी ही है! आओ, तुम अंदर आ जाओ।” चीते ने कहा, “उस लौकी को तो मैं जानता हूं।”
वह बुजुर्ग महिला कूदकर चीते के घर के अंदर घुसी और वहीं छुप गई। हरी लौकी भी उसके पीछे-पीछे अंदर आ गई।
जब चीते ने उस लौकी पर हमला किया, तो उसने चीते को भी नहीं छोड़ा। उस लौकी ने चीते को भी धम, धम, धम मारा। बेचारे चीते ने बुरी तरह लौकी की मार खाई और परेशान होकर जमीन पर गिर गया।
उसके बाद हरी लौकी ने बुजुर्ग महिला को मारना शुरू कर दिया।
“वहां जाओ! कृपया मुझे जाने दो!” बुजुर्ग महिला चिल्लाई। लेकिन हरी निर्दयी लौकी ने उसे नहीं छोड़ा और उसे मारती रही।
वह वहां से भी भागी। हरी लौकी भी हवा में उड़ती हुई बुजुर्ग महिला का पीछा करती गई। मधुमक्खियों के गुनगुनाने जैसी आवाज आ रही थी।
वह बुजुर्ग महिला भी घबराकर चिल्लाती रही और थकने तक दौड़ती रही।
तभी वह एक लोमड़ी के घर के पास पहुंची। चीतों के झुंड के पीछा करने की तरह वह चिल्लाती रही।
“क्या हुआ? तुम्हें क्या हुआ?” लोमड़ी ने पूछा।
“एक हरी लौकी मेरे पीछे लगी है, मुझे बार-बार मार रही है।”
“अरे बात वैसी ही है, आओ तुम अंदर आ जाओ!” लोमड़ी ने कहा, “उस बदमाश लौकी को तो मैं जानती हूं!”
परेशान होकर तेजी से दौड़ती बुजुर्ग महिला लोमड़ी के घर के अंदर घुसी। लेकिन हरी लौकी ने उसका पीछा वहां भी नहीं छोड़ा।
लोमड़ी लौकी से लड़ने के लिए उस पर झपटी। लौकी ने भी पलटकर लोमड़ी को जोर से टक्कर मारी। लौकी ने लोमड़ी को गिराने के बाद फिर बुजुर्ग महिला की तरफ लपकी।
“दूर जाओ! मेरे पास मत आओ!” वह चिल्लाई और लोमड़ी के घर से बाहर निकलकर फिर दौड़ने लगी। हरी लौकी ने उसका पीछा नहीं छोड़ा।
वह बुजुर्ग महिला रास्ते-रास्ते दौड़ती रही। लौकी भी उसका पीछा करती रही और उसे मारने की भरसक कोशिश करती रही।
अपनी जान बचाने के लिए वह बुजुर्ग औरत गिरती-पड़ती चिल्लाती दौड़ती रही। दौड़ते-दौड़ते वह एक छोटे लड़के के घर के पास पहुंची।
“यहां क्या हो रहा है?” लड़के ने पूछा।
“बहुत कुछ हो रहा है। मैं बड़ी मुसीबत में हूं। एक हरी लौकी मुझे भूत की तरह पीछा कर रही है और मुझे मार रही है।”
“आंटी, कृपया आप अंदर आ जाइए। उस हरी लौकी को तो मैं जानता हूं!” लड़के ने बुजुर्ग महिला से कहा।
वह लड़का छोटा था लेकिन बहुत चालाक और फुर्तीला था। बुजुर्ग महिला के अंदर जाने के बाद वह दरवाजे के पीछे छुप गया। हरी लौकी ने दरवाजे से अंदर झांका। बुजुर्ग महिला को मारने के लिए वह लौकी लुढ़कती हुई अंदर आई। ठीक उसी समय लड़का दरवाजे के पीछे से निकलकर चिल्लाया, “ऐ हरी लौकी, मुझसे बचकर भाग।”
इतना कहकर लड़का कूदकर लौकी के ऊपर बैठ गया और लौकी को बुरी तरह कुचल दिया।
लौकी चकनाचूर हो गई। लौकी की हार पर लड़के और बुजुर्ग महिला, दोनों ने जोर-जोर से तालियां बजानी शुरू कीं।
बुजुर्ग महिला ने कुचली हुई लौकी के टुकड़ों को झाड़ू से इकट्ठा किया और चूल्हे में जलाने के लिए डाल दिया।
वे टुकड़े जलते समय वहां ऐसी आतिशबाजी हुई, जो न पहले किसी ने देखी थी न बाद में कोई देखने वाला है।
लौकी के सभी टुकड़े जलकर धमाके की आवाज के साथ नष्ट हो गए। वह लौकी भयानक रूप से चिल्लाई और हरे धुएं में हमेशा के लिए वहां से गायब हो गई।
“बेटा, तुमने उस हरी लौकी के साथ जो किया वह सही किया। अब मेरे साथ आओ, हम स्वादिष्ट भोजन बनाकर जीत का जश्न मनाएंगे।”
चीता और लोमड़ी भी बुजुर्ग महिला के घर आए। उसने सभी को बिस्कुट दिए जिसमें घर का बना घी था। सबने खूब खाया। भोजन इतना स्वादिष्ट था कि सभी उंगलियां चाटते रह गए।
उसके बाद बुजुर्ग महिला ने लौकी का बर्तन बनाने के लिए कोई कच्ची लौकी नहीं तोड़ी। उसने लौकी को पकने दिया। ‘पकने से पहले लौकी कभी मत तोड़ो, नहीं तो यह तुम्हें भूत की तरह सताएगी।’ यह कहावत उसने अच्छी तरह समझ ली।

