धनपुर गांव की सीमा पर मालती अपने बेटे अर्जुन के साथ रहती थी। मालती ने अकेले ही जीवन भर संघर्ष करके अपने बेटे को पाला था। पति का साया अर्जुन के जन्म के बाद ही सिर से उठ गया था। अब अर्जुन बड़ा हो चुका था और शहर में अच्छी नौकरी करता था।
“बेटा उठ जा, दफ्तर जाने में देर हो जाएगी,” मालती ने प्यार से अर्जुन को जगाया।
“हां मां,” अर्जुन ने आंखें मलते हुए कहा।
“चाय तैयार है, जल्दी से पी ले। मैं तेरा नाश्ता बना देती हूं।”
नाश्ते की मेज पर बैठते ही अर्जुन बोला, “मां, इतना घी मत डालो। जल्दी खत्म हो जाता है।”
“घी से ताकत आती है बेटा। तू है कि घी से परहेज करता है,” मालती ने प्यार से कहा।
“परहेज नहीं है मां, बस महंगाई बहुत बढ़ गई है। सामान बचाकर चलाना पड़ता है,” अर्जुन ने समझाया।
“पता नहीं कहां से इतना कंजूस बेटा मिल गया मुझे,” मालती ने मन ही मन सोचा।
शाम को जब अर्जुन दफ्तर से लौटा तो रात हो चुकी थी। मालती दरवाजे पर खड़ी इंतजार कर रही थी।
“इतनी देर क्यों हो गई बेटा?” मालती ने चिंतित स्वर में पूछा।
“मुनीम जी की शादी की सालगिरह थी मां। उन्होंने सबको खाने पर रोक लिया। मैं सोचा एक दिन घर का खाना बच जाएगा,” अर्जुन ने कहा।
मालती की आंखों में आंसू आ गए। “तू किस पर गया है बेटा?” उसने दुखी मन से सोचा।
“मां, अब यह मोमबत्ती बुझा दो। क्यों फालतू जला रही हो?” अर्जुन ने कहा।
अंधेरे में अचानक अर्जुन को कुछ लगा।
“बेटा! कहीं चोट तो नहीं लगी? मैं रोशनी करती हूं,” मालती घबरा गई।
“नहीं मां, मोमबत्ती मत जलाना। जल्दी खत्म हो जाएगी,” अर्जुन ने रोका।
अर्जुन की बढ़ती कंजूसी से मालती परेशान थी। एक दिन पंडित जी एक रिश्ता लेकर आए। मालती ने सोचा शायद शादी के बाद अर्जुन सुधर जाए।
शादी के बाद अर्जुन की पत्नी नैना घर आई। पहली रात जब वे बातें कर रहे थे, नैना ने कहा, “अब मोमबत्ती बुझा दें?”
“हां, अंधेरे में भी बात हो सकती है। मोमबत्ती बचेगी,” अर्जुन ने कहा।
“पूरे गांव में बिजली है, तुम्हारे घर में क्यों नहीं?” नैना ने हैरान होकर पूछा।
“बिजली का बिल बहुत आता है नैना। मोमबत्ती से काम चल जाता है,” अर्जुन ने समझाया।
“बिना पंखे के मच्छर खाए जाते हैं। मेरे घर से कूलर मंगवा लूंगी,” नैना ने कहा।
“उसका बिल भी ज्यादा आएगा। क्यों फिजूल खर्चा?” अर्जुन ने मना किया।
मालती भी बोल पड़ी, “बेटा सही कह रही है। हमें भी आराम मिलेगा।”
“मां, मुझे देर हो रही है। मैं चलता हूं,” अर्जुन ने टाल दिया।
दोपहर को अर्जुन ने लौटकर कहा, “मां, आज से दस दिन हम बाहर खाना खाएंगे।”
“कौन सा होटल चल रहा है? मैं तैयार हो जाती हूं,” नैना खुश हो गई।
“अरे, कोई होटल नहीं। रामदास जी के पिता का देहांत हो गया। वे १२० साल जीए। उनकी आखिरी इच्छा थी कि दस दिन तक मंदिर में गरीबों को खाना खिलाया जाए। हम वहां जाकर खाएंगे,” अर्जुन ने बताया।
नैना का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। “तुम्हारे जैसे कंजूस इंसान से शादी करके मेरी किस्मत फूट गई। मैं कल अपने घर जा रही हूं।”
अगली सुबह नैना सामान लेकर जाने लगी।
“कहां जा रही है बेटा?” मालती ने रोकना चाहा।
“मां जी, मैं और नहीं रह सकती यहां। माफ़ करना,” नैना रोते हुए चली गई।
अर्जुन जब दफ्तर से आया तो मालती ने बताया, “नैना चली गई। तुझे तलाक चाहिए उसे। तेरी कंजूसी की वजह से।”
कुछ दिन बाद एक व्यापारी घर आया। उसके हाथ में एक बड़ा संदूक था।
“यह संदूक श्री विक्रम सिंह जी की संपत्ति है। मैंने उनसे व्यापार के लिए पैसे लिए थे। आज मेरा व्यापार फल-फूल रहा है। यह उनके हिस्से का सोना और धन है,” व्यापारी ने बताया।
“स्वर्गीय विक्रम सिंह मेरे पिता थे। उन्हें गुजरे ३५ साल हो गए,” मालती ने कहा।
“तब तो मैं यह नहीं दे सकता। उन्होंने कहा था यह धन सिर्फ उनकी संतान की संतान को मिलेगा,” व्यापारी बोला।
“मेरी शादी हो गई है,” अर्जुन ने कहा।
“लेकिन बच्चा नहीं है ना? जब हो जाए तो खबर देना। यह रहा मेरा पता,” व्यापारी चला गया।
लालच में अर्जुन ने तुरंत नैना को वापस ले आया। उसने घर में बिजली लगवाई, पंखा और कूलर लाया। समय बीता और नैना ने एक बेटे को जन्म दिया। अर्जुन खुश था कि अब खजाना मिलेगा।
उसने व्यापारी को चिट्ठी लिखी। जवाब आया कि विक्रम सिंह की वसीयत के अनुसार जब तक पोता १८ साल का न हो, संपत्ति नहीं मिलेगी।
“यह क्या मजाक है?” अर्जुन गुस्से में बोला।
“बेटा, तेरे पिता अपनी बात के पक्के थे। थोड़ा इंतजार कर ले,” मालती ने समझाया।
साल बीतते गए। अर्जुन का बेटा १७ साल का हो गया। तभी एक दिन मालती अचानक बीमार पड़ गई।
“मां जी! आंखें खोलो!” अर्जुन चिल्लाया, लेकिन मालती हमेशा के लिए सो गई।
एक साल बाद जब अर्जुन का बेटा १८ का हुआ, वही संदूक घर के बाहर रखा मिला। संदूक में एक चिट्ठी थी:
“बेटा, मुझे माफ करना। तुझे कंजूसी से दूर करने के लिए मैंने यह नाटक रचा था। असली संपत्ति परिवार होता है। धन जरूरत पूरी करता है, कमी नहीं। जब तक तू यह पढ़ेगा, मैं नहीं रहूंगी। आज सारा धन लाकर भी तू मुझे वापस नहीं ला सकता। इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है। – तेरी मां”
अर्जुन फूट-फूटकर रोने लगा। “मां, मुझे समझने में बहुत देर हो गई। काश मैं आपके जीते जी आपको सुकून दे पाता। माफ कर दो मां।” धन कमाना जरूरी है, लेकिन जरूरत के समय खर्च न करना मूर्खता है। परिवार की खुशियां और रिश्ते किसी भी धन से बड़े होते हैं। कंजूसी इंसान को अकेला कर देती है।

