रात का वक्त था। गांव की सीमा पर झाड़ियों और टूटे रास्तों के बीच वो सूखा कुआं खड़ा था जिसके पास सालों से किसी ने झांका भी नहीं था। उसी कुएं के पास पिछले चार दिनों से रोज एक इंसान जाता रहा है। हाथ में टॉर्च और आंखों में एक चमक।
आज विधि की पांचवी रात है। आज के बाद सब बदल जाएगा।
उसने चारों तरफ देखा। हवा थमी हुई थी। फिर वो रस्सी के सहारे धीरे-धीरे कुएं के अंदर उतरने लगा। नीचे उतरते ही आवाज दब गई और ऐसा लगा जैसे कुआं उसे निगल रहा हो। इस रात उसने दिया नहीं जलाया और टॉर्च भी बंद रखी। अंधेरे में ही बैठा रहा। पहली बार उसने मंत्र पूरा पढ़ा। जैसे ही आखिरी शब्द निकला कुएं की जमीन ठंडी हो गई और नीचे से एक आवाज आई। मांग मिथुन की आवाज भाटी। पैसा ताकत आसान जिंदगी।
उसके बाद कुआं खामोश हो गया।
यह अंधकूप विधि थी। इस विधि से जो जागता है वो वरदान नहीं देता। वो सौदा करता है। इस सौदे में कुछ चीजें मांगी जाती हैं और जो मांगी जाती हैं तो वह ली जाती हैं।
मिथुन और राजन बचपन से साथ पढ़े थे। राजन किताबों में डूबा रहता। मिथुन खिड़की से बाहर झांकता। परीक्षा में मिथुन नए-नए तरीके से कॉपी करता।
मिथुन हर बार नकल से पास नहीं होगा।
अरे यार दिमाग का सही उपयोग शॉर्टकट निकालना है।
समय बीतता गया। राजन की सरकारी नौकरी लगी। शादी हो गई। जिंदगी सदी हुई सी हो गई। मिथुन कभी नौकरी करता, कभी छोड़ देता।
नौकरी गुलामी है। जुगाड़ से पैसे कमाने में मजा है।
धीरे-धीरे मिथुन शराब पीने लगा। पैसे उड़ाने लगा। कभी मां से, रिश्तेदारों से तो कभी दोस्तों से। एक दिन अचानक उसकी मां गुजर गई। रिश्तेदारों ने भी मुंह फेर लिया। दोस्त भी दूर हो गए। सिर्फ राजन बचा। राजन हर बार उसे पैसे देता। कभी सवाल नहीं करता। एक दिन राजन खुद मिथुन के घर आया।
सच बता यह पैसे कहां जाते हैं?
मिथुन मुस्कुराया।
अंधकूप क्रिया कर रहा हूं।
राजन चौंक गया।
यह सब ढोंग है मिथुन। अखबार में कहानियां छपी हैं। लोग अमीर हो गए हैं इस क्रिया से।
राजन कुछ देर तक मिथुन को देखता रहा और गहरी सांस ली।
तू आज भी नहीं बदला रे। बचपन से तू ऐसा ही है। बस हर चीज का जुगाड़ ढूंढता रहता है।
मिथुन जोर से हंस पड़ा। वो हंसी थोड़ी ज्यादा तेज थी जैसे वो राजन को नहीं खुद को यकीन दिला रहा हो।
अरे राजन बाबू जो बदल जाए वो इंसान ही कैसा मैं तो बस हमेशा आसान रास्ता निकाल लेता हूं। अरे छोड़ ये सब तूने कुछ बनाया तो नहीं होगा। चल मैं तुझे खाना खिलाता हूं।
दोनों घर से निकले। पास के पुराने होटल में जाकर बैठे। खाना आते-आते बातें अपने आप पीछे चली गई। स्कूल के दिन वो सपने जो तब बहुत आसान लगते थे। खाना खत्म होते-होते मिथुन फिर उसी विषय पर लौट आया।
राजन यह अंधकूप क्रिया कोई नई चीज नहीं है। यह सदियों पुरानी विधि है।
फिर वही? अरे सुन तो सही। यह क्रिया सूखे कुएं में की जाती है। बस 5 दिन और इंसान की सारी इच्छाएं पूरी।
राजन चुपचाप सुनता रहा। कुछ ही दिनों में सब ठीक हो जाता है। पैसों की दिक्कत, काम की टेंशन सब खत्म। एक बार ये क्रिया कर ली ना, फिर मैं तुझे पार्टी दूंगा और अपनी गाड़ी में घुमाऊंगा।
राजन ने भौही चढ़ाई।
तुझे यह सब किसने बताया?
मिथुन ने जेब से अखबार का एक पुराना पन्ना निकाला।
मैंने जेल के न्यूज़पेपर में पढ़ा है। कई लोगों की कहानियां छपी हैं। सब अमीर हो गए। सबकी किस्मत बदल गई। मैं रोज अखबार लेता हूं। उसमें पूरी विधि भी छपी है। बहुत आसान है।
हर बार की तरह इस बार भी तूने कोई नया टोटका निकाल लिया है। तू कभी नहीं सुधरेगा रे मिथुन। मिथुन ने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराता रहा। कुछ देर बाद दोनों होटल से निकले और अपने-अपने रास्ते चले गए। कुछ ही दिनों में मिथुन गांव की सीमा पर उस सूखे कुएं के पास जाने लगा। उसने झाड़ियां काटी। मलबा हटाया। पीठ पर झोला और हाथ में टॉर्च। यहां वहां देखता हुआ वो धीरे-धीरे कुएं के अंदर उतरने लगा। कुएं के अंदर जाकर उसने एक पुराना दिया, थोड़ी काली मिट्टी और एक अखबार का फटा हुआ पन्ना बाहर निकाला। वो कुएं के तल में बैठ गया और दिया जलाया। फिर उसने चारों तरफ मिट्टी फैलाई। फिर अखबार के उस पन्ने को बढ़ने लगा। जो नीचे है उसे नाम नहीं दिया जाता।
मिथुन को उस रात कुछ नहीं हुआ। बस जाते वक्त उसे लगा कुएं की दीवारें थोड़ी और पास आ गई हैं। मिथुन ने पहले ही दिन विधि का सारा सामान कुएं में रख दिया था। मिथुन कुएं के तल पर बैठा दिया जलाया और उसने झोले से लोहे की तीन कीलें, नींबू और जली हुई लकड़ी की राख निकाली। मिथुन ने राख से जमीन पर एक गोल घेरा बनाया। बीच में नींबू रखे और कीलें दीवार में ठोक दी। हर कील के साथ कुएं में गूंज बढ़ती गई। उस रात उसे पहली बार लगा जैसे कोई नीचे से उसे देख रहा है। तीसरी रात उसने एक काली चुनरी, तेल की शीशी और वही अधूरा मंत्र बाहर निकाला। और जैसे ही उसने मंत्र दोहराया, कुएं के अंदर से आवाज आई। कोई शब्द नहीं बस एक भारी सांस। मिथुन का शरीर जम गया लेकिन उसने क्रिया नहीं रोकी। उस रात जाते समय उसने साफ सुना। फिर राणा
चौथी रात कुआं जली हुई लकड़ी की बदबू से भरा था। मिथुन के हाथ कांप रहे थे। फिर भी वो नीचे उतरा। उस रात उसने पहली बार जोर से बोला, “मुझे चाहिए। कुएं के अंदर कुछ हिला जैसे जमीन के नीचे कुछ करवट ले रहा हो। मिथुन को लगा अब पीछे हटना नामुमकिन है। पांचवी रात इस रात उसने दिया नहीं जलाया और टॉर्च भी बंद रखी। अंधेरे में ही बैठा रहा। पहली बार उसने मंत्र पूरा पढ़ा। जैसे ही आखिरी शब्द निकला, कुएं की जमीन ठंडी हो गई और नीचे से एक आवाज आई। मांग।
मिथुन की आवाज फटी।
पैसा ताकत आसान जिंदगी।
उसके बाद कुआं खामोश हो गया। अंधकूप विधि पूरी होने के बाद ज्यादा वक्त नहीं लगा। अगले ही हफ्ते से मिथुन की जिंदगी ऐसे पलटने लगी। जैसे किसी ने अचानक किस्मत का पन्ना पलट दिया हो। पहले हफ्ते ही उसने जुए में हाथ आजमाया। वो जो हमेशा हारता था उस दिन लगातार जीतता गया। एक दांव फिर दूसरा, फिर तीसरा। लोग हैरान थे। मिथुन खुद भी हैरान था। कुछ ही दिनों बाद एक लॉटरी का टिकट लगा। फिर दूसरी, फिर तीसरी, इतना पैसा जिसे उसने कभी एक साथ देखा भी नहीं था। और अजीब बात यह थी कि मिथुन ने मेहनत कुछ भी नहीं की थी। पैसा खुद चलकर उसके पास आ रहा था। फिर बड़े काम मिलने लगे। कोई जमीन बिकवाना चाहता था। किसी की पुरानी हवेली का सौदा था। किसी की कब्जे की जमीन खाली करवानी थी। जहां दूसरे लोग महीनों अटक जाते। वहां मिथुन दो बातों में काम निपटा देता। और हर सौदे के बाद पैसा मिलता। ढेर सारा पैसा। कुछ ही महीनों में उसने नया घर बनवा लिया। पुराना टपकती छत वाला मकान अब सिर्फ याद बन चुका था। नया घर, ऊंची दीवारें, चमचमाता फर्श और ऐसी छत जो ऊपर देखकर दिखाई भी ना दे। फिर एक दिन नई गाड़ी खरीद ली। उसी गाड़ी में बैठकर मिथुन राजन के घर पहुंचा। इंजन की आवाज सुनकर राजन बाहर आया।
देखा? कहा था ना? सब हो जाएगा।
राजन मुस्कुराया। वो खुश था। सच में खुश। लेकिन दिल के किसी कोने में एक अजीब सी घबराहट थी। राजन उसे घर के अंदर ले गया। चाय बनाई। यह पहली बार था जब मिथुन राजन के घर आया था। चाय पीते-पीते मिथुन ने कहा।
राजन तू और भाभी संडे को मेरे घर खाना खाने आओगे? कोई बहाना नहीं चलेगा।
राजन ने मुस्कुरा कर हां कर दी। संडे को राजन और उसकी पत्नी काजल मिथुन के घर पहुंचे। गाड़ी गेट के अंदर घुसे तो राजन की आंखें खुली रह गई। उसके मन में एक ही बात आई।
कहां वो पुराना घर और कहां यह आलीशान महल?
घर में कदम रखते ही नौकरों ने खातिरदारी शुरू कर दी। पानी, शरबत, फल। हर चीज बिना पूछे सामने तभी मिथुन कमरे से बाहर आया। राजन उसके लिए मिठाइयों का डब्बा लाया था।
अरे यह सब लाने की क्या जरूरत थी? तू तो मेरा भाई है।
मिथुन ने नौकरों को हुक्म दिया।
राजन और भाभी को जो चाहे वो खिलाओ। किसी भी चीज की कमी नहीं होनी चाहिए।
थोड़ी देर में ढेर सारी डिशेस आ गई। तीनों मजे से खाना खाने लगे। हंसी, पुरानी बातें और सुकून पर राजन के मन में एक सवाल अब भी अटका था।
मिथुन, यह सब कैसे हुआ? वो क्रिया। मिथुन ने खाना रखते हुए कहा,
उसी की वजह से तो सब हुआ। मैंने कहा था ना एक बार वो क्रिया कर लूं तो सब सही हो जाएगा।
फिर हंसकर बोला,
देख आज पार्टी भी मिल रही है।
खाना खत्म हुआ। मिथुन ने खुद राजन और काजल को गाड़ी में बैठाकर उनके घर छोड़ा। राजन गाड़ी में बैठकर पीछे मुड़कर उस आलीशान घर को देखता रहा। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। लेकिन दिल में एक अजीब सी बेचैनी क्योंकि जिस तरक्की में मेहनत ना हो उसमें अक्सर कोई और कीमत चुकानी पड़ती है और मिथुन वो कीमत अभी जानता नहीं था। कुछ महीनों तक सब कुछ ठीक चलता रहा। मिथुन ने सोचना ही छोड़ दिया कि यह सब क्यों हो रहा है। लेकिन अंधकूप विधि के कुछ महीने बाद हवा बदलने लगी। सबसे पहले एक सौदे में गड़बड़ हुई। मिथुन ने एक पुरानी हवेली बिकवाई थी। कागज पूरे सही से देखे बिना। बाद में पता चला कि ज़मीन किसी और के नाम से दर्ज थी। असल मालिक ने हवेली के नए मालिक को धमकाया। हवेली के नए मालिक ने सारा इल्जाम सीधा मिथुन पर डाल दिया। हवेली के मालिक ने मिथुन का कॉलर पकड़ा। आखिरकार मिथुन को अपने ही पैसों से नुकसान भरना पड़ा। पहली बार उसके हाथ से पैसा पीछे की तरफ गया। फिर जुए में हार शुरू हो गई। जो हाथ कभी खाली नहीं जाता था। अब हर बार डूबने लगा। लॉटरी अब लगती ही नहीं थी। जमीन के सौदे आखिरी वक्त पर टूटने लगे। लोगों के फोन आने बंद हो गए। लोग उससे नजरें चुराने लगे। मिथुन को कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने वही किया जो वो हमेशा करता था। भागने की कोशिश। लेकिन इस बार किस्मत से नहीं किसी और से रातें बदलने लगी। अब वह सुकून से सो नहीं पाता था। हर रात एक ही सपना। वो किसी अंधेरी गुफा में फंसा है। चारों तरफ नमी, सीलन और अंधेरा वो बाहर निकलने की कोशिश करता, लेकिन रास्ता नहीं मिलता। सांस भूलने लगती। सीना पत्थर की तरह भारी और तभी वो हड़बड़ाकर नींद से जाग जाता। पसीने से भीगा हुआ। कभी-कभी उसे लगता कि घर में कोई है। कोई कोने में खड़ा उसे घूर रहा है और कुछ मांग रहा है। लेकिन क्या है वो नहीं समझ पाता। पैसे खत्म होने लगे। मिथुन ने अपनी गाड़ी बेच दी ताकि घर में चूल्हा जल सके। जिस गाड़ी में वो कभी शान से बैठता था। आज वही उसके हाथ से चली गई और फिर एक रात उसे लगा जैसे कोई उसका गला दबा रहा है। सांस रुक नहीं रही थी। आंखें फटी हुई थी। वो बिस्तर पर छटपटाता रहा। लेकिन कमरे में कोई नहीं था। अगली सुबह वो टूट चुका था। डरा हुआ खाली। उसे समझ आ गया था कि यह कुछ अजीब है। उसी दिन वो रोते हुए राजन के पास पहुंचा।
राजन मुझसे गलती हो गई। मुझे बचा ले।
राजन ने पूरी बात सुनी। एक शब्द भी नहीं टोका। राजन ने अपनी पत्नी काजल से बात की। काजल के गांव में एक तांत्रिक बाबा थे। बाबा गोरखनाथ। राजन ने उन्हें मिथुन की कहानी बताई और मदद मांगी। दो दिन बाद राजन बाबा गोरखनाथ को मिथुन के घर ले आया। बाबा ने घर में कदम रखते ही आसपास देखा। हवा सूंघी, आंखें बंद की। फिर मिथुन से बोले,
तूने किस जगह से क्रिया की थी? मिथुन ने कांपते हाथों से गांव की सीमा के सूखे कुएं की तरफ इशारा किया। बाबा ने एक ही बात कही।
वहां चलना होगा। अगली शाम दोनों सूखे कुएं के पास खड़े थे। हवा में सड़ी हुई मिट्टी और पुराने लोहे जैसी गंध थी। बाबा गोरखनाथ कुछ पल चुपचाप कुएं को देखते रहे। फिर उन्होंने आंखें बंद की और जमीन पर हाथ रख दिया। अचानक उनके चेहरे का रंग बदल गया। उन्होंने आंखें खोली और सीधे मिथुन की तरफ देखा। तूने अंधकूप विधि की है। लेकिन अधूरी समझ के साथ मिथुन कांपने लगा।
बाबा सब कुछ अखबार में जैसा लिखा था वैसा ही किया था।
बाबा ने धीमी आवाज में कहा। अखबारों में सच पूरा नहीं लिखा जाता बेटा। उन्होंने कुएं की तरफ इशारा किया। इस क्रिया से तूने एक शैतान को जगाया है। ऐसा शैतान जो बिना मांगे इच्छाएं पूरी करता है। राजन की सांस अटक गई।
फिर यह सब क्यों हो रहा है बाबा?
बाबा की आवाज और भारी हो गई। क्योंकि हर महीने में एक मुहूर्त आता है अमावस्या का। उस रात शैतान को रक्त की बलि देनी होती है। मिथुन के पैर लड़खड़ा गए।
बलि ये बात मुझे किसी ने नहीं बताई।
बाबा ने सीधे उसकी आंखों में देखा। तूने उसे जगाया और उसे भूखा छोड़ दिया। कल महालय अमावस्या की रात है। मिथुन की हालत और बिगड़ गई।
बाबा मैं अकेला नहीं जा सकता। आप भी साथ चलिए।
बाबा ने थोड़ा सोचा। फिर जमीन पर कुछ रेखाएं बनाई। अपने शरीर पर राख लगाई और मंत्र जाप शुरू किया। कुछ देर बाद बाबा ने आंखें खोली। चलो लेकिन याद रखना सारी विधि तुम्हें अकेले ही करनी होगी। अमावस्या की रात मिथुन काला मुर्गा लेकर कुएं के अंदर उतरा। बाबा उसके पीछे उतरने लगे। कुएं के अंदर अब भी वही गोल निशान थे जो पहली विधि में बने थे। मिथुन ने सामान जमाया, दिया जलाया। वही मंत्र फिर से पढ़ने लगा। उसकी आवाज कांप रही थी। फिर उसने मुर्गे की गर्दन काट दी। रक्त जमीन पर गिरा। मुर्गा वहीं रख दिया। अचानक मुर्गा जमीन में धंस गया। रक्त पलक झपकते ही सूख गया। कुएं की जमीन कांपने लगी और दरारें पड़ने लगी और फिर एक तेज खून की पिचकारी जमीन से उछली। मिथुन के शरीर पर खून के छींटे पड़े और उसी पल एक भारी खुरदरी आवाज चारों तरफ गूंज उठी। मैंने तुझे सब कुछ दिया। पर तू कभी मुझसे मिलने नहीं आया। कभी मेरी बलि नहीं दी।
मिथुन जमीन पर गिर पड़ा।
बाबा बचा लो मुझे। वो हाथ जोड़ने लगा।
मैं हर अमावस्या आऊंगा। हर बार बलि दूंगा।
जमीन और खुल गई। पिछली बलि का क्या? मैं महीनों से भूखा हूं। अचानक काले हाथ जमीन से निकले। आज मैं खुद अपना हिस्सा लूंगा।
मिथुन चीख भी नहीं पाया। जमीन ने उसे एक झटके में खींच लिया। कुआं फिर से शांत हो गया। कोई आवाज नहीं, कोई हलचल नहीं। बाबा गोरखनाथ चुपचाप बाहर निकले और राजन के पास गए।
काली क्रियाओं का नियम है। अगर शैतान का अपमान हुआ तो वह अपना बदला खुद लेता है।
राजन जानता था मिथुन की मौत का दोष किसी और पर नहीं है। उसने अधूरा ज्ञान लेकर अंधेरे से सौदा किया था।
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