हरित वन में सभी जानवर और पक्षी अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। रोहन हाथी अपनी पीठ पर लकड़ियों का गट्ठर लादे जा रहा था। तभी चंचल हिरन उसके पास आया।
“अरे रोहन, तुम हाथी होकर यह मजदूरी क्यों कर रहे हो?” चंचल ने मजाक में कहा।
“बरसात नजदीक है, मुझे मजबूत घर बनाना है,” रोहन ने समझाया।
“अरे, दो महीने बाद की चिंता अभी से? जो होगा देखा जाएगा,” चंचल हंसता हुआ आगे बढ़ गया।
आगे उसे मिन्नी खरगोश मिली जो गाजरें लिए जा रही थी।
“मिन्नी, इतनी गाजरें किसलिए?” चंचल ने पूछा।
“बरसात में घर से निकलना मुश्किल होगा, इसलिए पहले से खाना जमा कर रही हूं,” मिन्नी बोली।
“सब पागल हो गए हैं क्या?” चंचल बुदबुदाया और अपनी गुफा में सो गया।
अगली सुबह चंचल ने सोचा कि अगर रोहन की मदद करूं तो वह मेरे साथ घूमने चलेगा। दोनों लकड़ियां लेने गए। लौटते समय चंचल की कमर टूट रही थी। रोहन के घर पहुंचकर वह भाग निकला, “बाप रे! मर गया था। एक बार और ले जाता तो जान निकल जाती।”
फिर वह मिन्नी की मदद करने गया। गाजर तोड़ते समय किसान ने उन्हें देख लिया और डंडे से मारा। दोनों भागे। मिन्नी ने चंचल को समझाया, “तुम्हें भी अपनी तैयारी करनी चाहिए।”
“मेरी गुफा ऊंचाई पर है, पानी पहुंच ही नहीं सकता। खाने की चिंता बाद में देखूंगा,” चंचल लापरवाही से बोला।
दो महीने बाद भयंकर बरसात शुरू हुई। जंगल में चारों ओर पानी भर गया। चंचल अपनी गुफा में मुस्कुरा रहा था, “मेरी गुफा सबसे ऊपर है, पानी कैसे आएगा?”
तभी पीछे से पानी की आवाज आई। चंचल ने देखा तो पानी का बहाव गुफा के अंदर से आ रहा था। “यह कैसे संभव है?” वह चिल्लाया।
दरअसल, गुफा का दूसरा मुंह नदी की तरफ खुलता था। बारिश से नदी का जलस्तर बढ़ा और पानी गुफा में घुस गया। चंचल भागकर बाहर आया। अब उसकी गुफा झरने में बदल चुकी थी।
ठंडी हवाओं और बारिश में भीगते हुए चंचल की तबीयत खराब होने लगी। भूख से बेहाल होकर वह कई जानवरों के पास गया पर किसी ने मदद नहीं की।
अंततः वह मिन्नी के पास पहुंचा। “मिन्नी, मेरी गुफा में पानी भर गया और मेरे पास खाने को कुछ नहीं।”
“चंचल, जब मैं खाना जमा कर रही थी तो तुमने मेरी मदद की थी। मैं तुम्हें भूखा कैसे रख सकती हूं?” मिन्नी ने गाजरें दीं।
तभी रोहन आया, “चंचल, तुमने मेरे घर की लकड़ियां लाने में मदद की थी। तुम मेरे घर में रह सकते हो।”
चंचल की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। रोहन के मजबूत घर में दोनों आराम से रहने लगे। चंचल ने प्रण लिया कि अगले साल बरसात से पहले वह पूरी तैयारी करेगा और आलस छोड़ देगा।
उसी वन में काला कौवा रहता था जो दूसरों को ठगकर खाना खाता था। एक दिन उसने टीनू चिड़िया से झूठ बोला, “तुम्हारी मां के पंख टूट गए हैं।” टीनू घबराकर उड़ गई और काले ने उसका सेब खा लिया।
ऐसे ही वह सभी को छलता रहा। एक दिन उसने मेहनती चींटी को दाना ढोते देखा।
“आधा बचाकर क्यों रखती हो?” काले ने पूछा।
“बुरे समय के लिए,” चींटी ने जवाब दिया।
“बेकार की सोच है!” काला हंसकर उड़ गया।
फिर भयंकर तूफान आया। काले का घोंसला बह गया। वह टीनू के पास गया पर उसने दरवाजा बंद कर दिया, “तुमने मुझे झूठ बोलकर परेशान किया था, अब भुगतो।”
काला हारकर चींटी के पास पहुंचा जो पत्ते से गुफा में पानी रोक रही थी।
“मैं भी रुक सकता हूं?” काले ने पूछा।
“बिल्कुल! अंदर काफी खाना है,” चींटी ने कहा।
काले का दिल पिघल गया। उसने घंटों मेहनत कर पत्थर लाकर गुफा के सामने दीवार बना दी। पानी रुक गया।
दोनों ने साथ खाना खाया। काले ने महसूस किया, “मेहनत का खाना कितना स्वादिष्ट है!”
उसने सीख लिया कि मेहनत और दूसरों की मदद करना जरूरी है। तभी मुसीबत में साथ मिलता है।
मेहनत और दूसरों की मदद करने से ही जीवन सफल होता है। आलस और चालाकी से सिर्फ मुसीबत मिलती है।

