गांव के बाजार में सुमित्रा देवी अपने छोटे बेटे राज को गोद में लिए रो रही थी। उसके पति का हाल ही में देहांत हो गया था। पड़ोसी विक्रम काका ने उसे सांत्वना दी।
“सुमित्रा, रोने से कुछ नहीं होगा। तुम्हारे हाथों में अन्नपूर्णा माता का वरदान है। तुम्हारा बनाया खाना जो एक बार खाता है, बार-बार खाने आता है।”
“लेकिन विक्रम काका, यहां तो पहले से ही रघुवीर सेठ का बड़ा होटल है। कौन हमारे पास आएगा?” सुमित्रा ने चिंतित स्वर में पूछा।
“तुम बस शुरुआत करो। बाकी सब मैं संभाल लूंगा,” विक्रम काका ने आश्वासन दिया।
विक्रम काका की सलाह पर सुमित्रा ने अपनी खाली पड़ी जमीन पर एक छोटा होटल खोल दिया। होटल का नाम रखा – “माँ अन्नपूर्णा भोजनालय।”
दूसरी ओर, रघुवीर सेठ को जब यह खबर मिली तो वह क्रोधित हो गया। उसने अपने छोटे भाई मनोज को बुलाया।
“मनोज, देखा तुमने? तुम्हारी भाभी ने हमारे सामने ही होटल खोल दिया। लेकिन चिंता मत करो, मैं इसे खोलने से पहले ही बंद करवा दूंगा।”
रघुवीर सेठ ने योजना बनाई। उसने विक्रम काका से कहा, “व्यापार में कोई रिश्तेदारी नहीं चलती। लेकिन शुरुआत में ग्राहक खींचने के लिए कुछ तड़क-भड़क चाहिए।”
“तो क्या करें?” विक्रम काका ने पूछा।
“कल उद्घाटन के दिन मुफ्त भोजन की घोषणा करो। लोग खिंचे चले आएंगे,” रघुवीर ने सुझाया।
अगले दिन की घोषणा पूरे गांव में फैल गई। रघुवीर सेठ के होटल में एक ग्राहक ने कहा, “क्या सुना आपने? नए होटल में कल मुफ्त भोजन मिल रहा है।”
रघुवीर सेठ गुस्से से बोला, “जाना है तो जाओ। लेकिन याद रखना, वहां का खाना सबसे घटिया मिलेगा।”
रात को रघुवीर सेठ ने अपने मित्र दीनानाथ को बुलाया। “दीनानाथ, मेरी एक मदद करो। गांव के सबसे बड़े पेटू गणेश और गोपाल को लेकर आओ। मुफ्त का खाना सुनकर वे इतना खाएंगे कि सारा खाना खत्म हो जाएगा। सबके सामने उनकी नाक कट जाएगी।”
दीनानाथ मुस्कुराया, “बढ़िया योजना है सेठ जी।”
उद्घाटन के दिन सुबह से ही भीड़ जमा होने लगी। सुमित्रा और विक्रम काका ने पूरी मेहनत से खाना तैयार किया था। लोग आते गए और स्वादिष्ट खाना खाकर खुश होते गए।
“क्या बात है! इतना लजीज खाना तो कभी नहीं खाया,” एक ग्राहक ने कहा।
“मैं तो अब रोज यहीं आऊंगा,” दूसरे ने घोषणा की।
तभी गणेश और गोपाल आए। दोनों विशालकाय व्यक्ति थे। दीनानाथ ने उन्हें समझाया था, “बहुत भूख लगी होगी। जाओ, जी भरकर खाओ।”
दोनों खाना खाने लगे। वे बिना रुके खाते जा रहे थे। धीरे-धीरे खाना कम होने लगा। विक्रम काका परेशान हो गए। सुमित्रा ने चिंतित होकर पूछा, “काका, अब क्या होगा? और लोगों के लिए खाना नहीं बचेगा।”
तभी विक्रम काका को एक युक्ति सूझी। उन्होंने रसोई से दो बड़ी खाली हांडियां निकालीं और उनके चारों ओर केले के पत्ते लगा दिए। फिर जोर से घोषणा की।
“आइए आइए! विशेष मेहमानों के लिए गरमागरम दम बिरयानी तैयार है। लेकिन एक शर्त है – यह दोनों हांडियां पूरी खत्म करनी होंगी। नहीं तो गांव छोड़कर भागना पड़ेगा।”
गणेश और गोपाल ललचा गए। उन्होंने हांडियां खोलीं तो अंदर कुछ नहीं था – बिल्कुल खाली! सारे लोग हंसने लगे।
विक्रम काका ने सबके सामने कहा, “भाइयो, यह सब रघुवीर सेठ की साजिश थी। उन्होंने इन दोनों को भेजा था हमारा नुकसान करने। लेकिन सच्चाई हमेशा जीतती है।”
दीनानाथ शर्मिंदा होकर बोला, “माफ करना सुमित्रा जी। हमने गलती की।”
सभी ग्राहक नाराज हो गए। एक ने कहा, “जो दूसरों का बुरा चाहता है, उसका खुद का सर्वनाश होता है।”
“हम अब रघुवीर सेठ के होटल में नहीं जाएंगे। यहीं खाएंगे,” दूसरे ने घोषणा की।
रघुवीर सेठ की सारी योजना धरी की धरी रह गई। उसका अपना व्यापार चौपट होने लगा।
सुमित्रा का होटल धीरे-धीरे बहुत मशहूर हो गया। पूरे गांव के लोग वहां खाने आने लगे। उसकी मेहनत और ईमानदारी ने रंग लाया।
विक्रम काका ने मुस्कुराते हुए कहा, “देखा सुमित्रा, मैंने कहा था न कि तुम्हारा होटल जरूर चलेगा।”
सुमित्रा ने आभार से भरकर कहा, “आपके बिना यह संभव नहीं था, काका।”
छोटा राज अब खुशी-खुशी अपनी माँ के होटल में दौड़ता रहता था। सुमित्रा की आंखों में संतोष के आंसू थे। उसने कठिन समय में हार नहीं मानी और सच्चाई के साथ आगे बढ़ी।
रघुवीर सेठ को अपनी गलती का एहसास हुआ। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। गांव वालों ने उसे सबक सिखा दिया था।
नैतिक शिक्षा: जो दूसरों का बुरा चाहता है, उसका खुद का सर्वनाश होता है। ईमानदारी और मेहनत से किया गया काम हमेशा सफल होता है। धोखे और छल-कपट का अंत बुरा ही होता है।

