शाम का समय था। तारा माँ ने रसोई में खाना तैयार किया था। मेज पर सब्जियों की तली हुई डिश और चावल सजे थे। उन्होंने अपने बेटे अर्जुन को खाने के लिए बुलाया।
“अर्जुन बेटा, खाना तैयार है। आओ खा लो,” तारा माँ ने प्यार से कहा।
अर्जुन मेज पर आया और खाने को देखकर मुँह बना लिया। “यह क्या है माँ? फिर से सब्जियाँ और चावल? कौन खाता है ये सब्जियाँ? मुझे तो बर्गर खाना है!”
तारा माँ ने धैर्य से समझाया, “बेटा, आज घर में यही सामान था। कल मैं तुम्हारे लिए बर्गर बना दूँगी। आज यह खा लो।”
लेकिन अर्जुन ने जिद पकड़ ली। “नहीं माँ! मुझे यह नहीं खाना। काश हमारे पास कुछ और स्वादिष्ट होता।”
तारा माँ ने गहरी साँस ली। “अर्जुन, क्या तुम्हें लगता है कि तुम सही व्यवहार कर रहे हो?”
अर्जुन ने अपने खिलौने की ओर देखा। “माँ, देखो न, मेरी यह गाड़ी भी अब अच्छी नहीं लगती। इसका पेंट उतर गया है। यह तो कचरे जैसी लग रही है। क्या हम कल नई गाड़ी खरीद सकते हैं?”
अब तारा माँ को गुस्सा आ गया। “बस करो अर्जुन! तुम बहुत नाशुक्रे हो रहे हो। क्या तुम्हें पता है? दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जो दिनों तक बिना खाना खाए रहते हैं। बहुत से लोगों के पास रहने के लिए छत नहीं है। बहुत सारे लोगों के पास पहनने के लिए कपड़े भी नहीं हैं। तुम्हारे पास तो सब कुछ है, फिर भी तुम शिकायत करते रहते हो। जो तुम्हारे पास है, उसके लिए आभारी रहो।”
अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सिर झुका लिया। “आप सही कह रही हैं, माँ।”
तारा माँ ने उसे गले लगाया। “आओ, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाती हूँ।”
बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव में विक्रम नाम का एक बुजुर्ग रहता था। वह हमेशा नाखुश रहता और हर चीज के बारे में शिकायत करता था। मौसम हो, सेहत हो या आस-पास के लोग – कुछ भी उसे खुश नहीं कर पाता था।
एक दिन विक्रम दादा एक पेड़ के नीचे बैठे थे और मौसम के बारे में शिकायत कर रहे थे। “आह! आज धूप इतनी तेज क्यों है? बरदाश्त ही नहीं होती।”
एक राहगीर ने कहा, “अरे विक्रम दादा, आभारी रहिए कि कई दिनों की बारिश के बाद आखिरकार सूरज निकला है।”
अगले दिन विक्रम दादा उसी पेड़ के नीचे बैठे अपनी कमजोरी के बारे में शिकायत कर रहे थे। “देखो मेरी इन पतली बाहों को! काश मैं पहले जैसा मजबूत होता!”
वही राहगीर फिर बोला, “विक्रम दादा, शुक्रगुजार रहिए। दुनिया में ऐसे लोग हैं जो पानी पीने जैसे रोज के काम भी खुद नहीं कर सकते।”
विक्रम दादा चिढ़ गए। “भाग जाओ यहाँ से! मुझे तुम्हारी सलाह की जरूरत नहीं।”
और इस तरह विक्रम दादा हर रोज किसी न किसी बात की शिकायत करते रहे। एक दिन आदित्य नाम का एक समझदार लड़का उनके पास आया।
“विक्रम दादा, आप हमेशा इतने उदास क्यों रहते हैं?” आदित्य ने पूछा।
“मेरे पास खुश होने के लिए कुछ नहीं है, बेटा। सब कुछ बुरा है,” विक्रम दादा ने जवाब दिया।
आदित्य थोड़ी देर सोचता रहा, फिर बोला, “दादाजी, मुझे आपको एक सबक सिखाने दीजिए।”
“सच? देखते हैं तुम मुझे कैसे खुश कर सकते हो!” विक्रम दादा ने व्यंग्य से कहा।
आदित्य विक्रम दादा को पास के पार्क में ले गया। वहाँ एक बेंच पर दोनों बैठ गए। फिर आदित्य ने कहा, “दादाजी, अपनी आँखें बंद कीजिए और उन सभी चीजों के बारे में सोचिए जिनके लिए आप आभारी हैं।”
“आओ दादाजी, आँखें बंद कीजिए। गहरी साँस लीजिए और सोचिए। मुझे बताइए वे सभी चीजें जिनके लिए आप कृतज्ञ हैं।”
“जिन चीजों के लिए मैं कृतज्ञ हूँ? मुझे सोचने दो…”
विक्रम दादा पहले तो हिचकिचाए, लेकिन फिर सोचना शुरू किया। उन्होंने अपने परिवार के बारे में सोचा, अपने घर के बारे में, अपने दोस्तों के बारे में। उन्होंने अपनी मेज पर मौजूद खाने के बारे में सोचा, अपने शरीर पर मौजूद कपड़ों के बारे में सोचा। उन्होंने सूरज, तारों और प्रकृति की सुंदरता के बारे में सोचा।
जब विक्रम दादा ने आँखें खोलीं, तो उन्हें दुनिया अलग नजर आई। उन्हें कृतज्ञता और खुशी का एहसास हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था।
“ओह! मुझे बहुत समय बाद इतना अच्छा महसूस हुआ है!” विक्रम दादा ने कहा।
“देखिए, आपके पास आभारी होने के लिए कितना कुछ है! यह सब नजरिए की बात है,” आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा।
“धन्यवाद, प्यारे बच्चे। तुम बहुत दयालु हो।”
विक्रम दादा को अपने नाशुक्रेपन पर शर्म आई। उन्होंने अपनी आदतें बदलने का वादा किया।
उस दिन से विक्रम दादा ने जीवन की छोटी-छोटी चीजों की कद्र करने का प्रयास किया। उन्होंने जो कुछ उनके पास था, उसके लिए आभारी रहना शुरू किया।
“आह! देखो आज सूरज कितना सुंदर है!” वे खुशी से कहते।
समय बीतने के साथ विक्रम दादा अधिक खुश और संतुष्ट होते गए। अब वे हर चीज और हर किसी के बारे में शिकायत नहीं करते थे। वे अधिक मुस्कुराते थे और हर नए दिन के लिए आभारी रहते थे।
“नमस्ते दादाजी! आज कैसे हैं आप?” एक दिन किसी ने पूछा।
“आओ बेटा, आओ। मैं इस धरती का सबसे खुश इंसान हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद!” विक्रम दादा ने खुशी से जवाब दिया।
“मुझे बहुत खुशी हुई यह सुनकर!”
आदित्य विक्रम दादा से मिलने आता रहा और दोनों ने साथ में कई खुशहाल दिन बिताए। आदित्य ने दादाजी को कई और मूल्यवान सबक सिखाए और विक्रम दादा उसके दादाजी जैसे बन गए।
कहानी खत्म होने पर तारा माँ ने पूछा, “तो अर्जुन, अब समझे कि आभारी होने से क्या फर्क पड़ता है?”
“हाँ माँ, अब मैं समझ गया। खुशी नजरिए की बात है,” अर्जुन ने कहा।
“बिल्कुल सही! हमें हमेशा उसके लिए आभारी रहना चाहिए जो हमारे पास है। उस पर ध्यान देना चाहिए जो हमारे पास नहीं है, उस पर नहीं। हमें जीवन की छोटी-छोटी चीजों की कद्र करनी चाहिए और उन लोगों के लिए हमेशा शुक्रगुजार रहना चाहिए जो हमसे प्यार करते हैं।”
अर्जुन ने माँ को गले लगाया। “धन्यवाद माँ, मैं अब से आभारी रहूँगा।”
उस दिन से अर्जुन ने अपना नजरिया बदल दिया और हर चीज की कद्र करना सीख लिया। हमें जीवन में जो कुछ भी मिला है, उसके लिए सदैव कृतज्ञ रहना चाहिए। खुशी हमारे नजरिए में छिपी है। छोटी-छोटी चीजों की कद्र करें और शिकायत करने के बजाय आभार व्यक्त करें।

